2 साल में खेती से बाहर होंगी 8 पुरानी गन्ना किस्में: शरदकालीन बुवाई से पहले जान लें कौन सी किस्म अब नहीं लगानी

शाहजहांपुर/लखनऊ। बीज गन्ना खरीदने की तैयारी कर रहे किसानों के लिए इस बार अक्टूबर की बुवाई से पहले एक अहम फैसला सामने आया है। उत्तर प्रदेश बीज गन्ना एवं गन्ना किस्म स्वीकृति उप समिति की 29 सितंबर को गन्ना आयुक्त की अध्यक्षता में हुई बैठक में आठ पुरानी और अलोकप्रिय गन्ना किस्मों को अगले दो वर्षों में चरणबद्ध तरीके से खेती से बाहर करने का निर्णय लिया गया है। इन किस्मों को औपचारिक रूप से ‘अनुपयुक्त’ घोषित कर दिया गया है।
यानी जो किसान शरदकालीन बुवाई में इन्हीं पुराने बीजों को लगाने की सोच रहे हैं, उन्हें अब अपनी योजना बदलनी होगी। समिति के फैसले के बाद दो साल के भीतर इन किस्मों का प्रमाणित बीज गन्ना मिलना बंद हो जाएगा और विभागीय नर्सरियों व योजनाओं से भी ये किस्में धीरे-धीरे बाहर कर दी जाएंगी।
कौन सी 8 किस्में बाहर होंगी — पूरी सूची
बैठक में जिन छह गन्ना किस्मों को अलोकप्रिय, नगण्य क्षेत्रफल वाली और पुरानी बताते हुए अनुपयुक्त घोषित किया गया है, वे हैं — को.शा.95255, को.शा.97264, को.शा.96275, को.शा.97261, को.से.96436 और को.शा.98231। इन छह किस्मों को अगले दो वर्षों में चरणबद्ध तरीके से हटाया जाएगा।
इसके अलावा दो और किस्मों — को.शा.96246 और को.शा.98231 — को अस्वीकृत करने की प्रक्रिया भी शुरू करने का निर्णय लिया गया है। इस तरह कुल आठ पुरानी किस्में खेती की मुख्यधारा से बाहर होने जा रही हैं।
क्यों हटाई जा रही हैं ये पुरानी किस्में
गन्ना विभाग के प्रेस नोट के अनुसार इन किस्मों को हटाने की वजह साफ है — ये किस्में अब अलोकप्रिय हो चुकी हैं और इनका रकबा नगण्य रह गया है। पुरानी किस्मों की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि समय के साथ इनकी उपज क्षमता घटती जाती है और रोगों के प्रति इनकी संवेदनशीलता बढ़ जाती है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बड़े हिस्से में लाल सड़न रोग ने पुरानी किस्मों को बुरी तरह प्रभावित किया है। ऐसे में वैज्ञानिकों का मानना है कि रोगरोधी नई किस्मों की ओर बढ़ना सबसे सस्ता और टिकाऊ उपाय है: न अतिरिक्त दवा का खर्च, न खेती की विधि बदलनी पड़ती है — बस अधिकृत स्रोत से स्वस्थ बीज गन्ना लेना होता है।
किसान पर क्या असर पड़ेगा
यह फैसला अक्टूबर की शरदकालीन बुवाई के ठीक पहले आया है, इसलिए इसका सीधा असर इसी सीजन के बीज चयन पर पड़ेगा। ‘अनुपयुक्त’ घोषित होने का मतलब है कि इन किस्मों के प्रमाणित बीज की उपलब्धता धीरे-धीरे खत्म होगी। गन्ना समितियों और विभागीय नर्सरियों में इन किस्मों का बीज अब प्राथमिकता से नहीं मिलेगा।
ध्यान रहे — यह रोक एक झटके में नहीं, दो साल में चरणबद्ध तरीके से लागू होगी। यानी जिन किसानों के पास इन किस्मों की पेड़ी खड़ी है, उन्हें घबराने की जरूरत नहीं है। सट्टे और पर्ची के हिसाब से मिलें गन्ना लेती रहेंगी। लेकिन नई बुवाई में इन किस्मों को लगाना अब समझदारी नहीं होगी, क्योंकि दो साल बाद इनका प्रमाणित बीज मिलना मुश्किल हो जाएगा।
इनकी जगह 12 नई किस्में — जानिए पूरे विकल्प
उसी बैठक में किसानों के लिए 12 नई किस्मों के विकल्प भी मंजूर किए गए हैं — चार किस्में उत्तर प्रदेश के शोध केंद्रों की और आठ किस्में केंद्र सरकार से नोटिफाइड।
शाहजहांपुर और लखनऊ की चार नई किस्में:
- को.शा.23232 (अगेती): औसत उपज 95.56 टन प्रति हेक्टेयर — मानक किस्म को.0238 से 9.44 प्रतिशत अधिक। नवंबर, जनवरी और मार्च में पोल प्रतिशत क्रमशः 13.10, 13.77 और 14.31। लाल सड़न रोग के प्रति रोगरोधी; पेड़ी की उपज 80.57 टन प्रति हेक्टेयर।
- को.लख.21201 (अगेती): औसत उपज 86.57 टन प्रति हेक्टेयर, पोल 13.94 प्रतिशत (को.0238 के 13.71 से अधिक)। लाल सड़न के प्रति उच्च प्रतिरोधक क्षमता। पूरे उत्तर प्रदेश के लिए अनुमोदित।
- को.शा.19235 (मध्यम-देर): औसत उपज 87.58 टन प्रति हेक्टेयर — मानक किस्म को.शा.767 (77.20 टन) से 11.81 प्रतिशत अधिक।
- को.शा.18232 (मध्यम-देर): औसत उपज 92.38 टन प्रति हेक्टेयर — को.शा.767 से 26.51 प्रतिशत अधिक। पेड़ी की उपज 82.06 टन प्रति हेक्टेयर।
केंद्र सरकार से नोटिफाइड आठ किस्में: को.16030, को.17018, को.पी.18122, को.पी.11438, को.लख.16466, को.पी.17215, को.पी.18109 और को.पी.18213। इनमें को.पी.16437, को.पी.11438 और को.लख.16466 अगेती किस्में हैं। को.पी.16437 और को.पी.11438 पूरे उत्तर प्रदेश के लिए हैं, जबकि कुछ अन्य किस्मों को पश्चिमी और मध्य उत्तर प्रदेश के लिए अपनाया गया है।
नई किस्मों की उपज और लाल सड़न से बचाव पर विस्तार से यहां पढ़ें
अक्टूबर की बुवाई से पहले किसान ये 5 बातें ध्यान रखें
- बीज अधिकृत स्रोत से ही लें: गन्ना समिति, विभागीय नर्सरी या प्रमाणित बीज उत्पादक से ही बीज गन्ना खरीदें। बिना स्रोत वाले बीज में रोग का खतरा सबसे ज्यादा होता है।
- किस्म का नाम पर्ची पर लिखवाएं: बीज खरीदते समय किस्म का नाम और लॉट की जानकारी जरूर लें — यही बाद में किसी विवाद से बचाएगा।
- रोगरोधी नई किस्मों को प्राथमिकता दें: लाल सड़न प्रभावित इलाकों में रोगरोधी किस्में पुरानी किस्मों से बेहतर विकल्प हैं।
- सट्टे में किस्म सही दर्ज कराएं: समिति में सट्टा बंधवाते समय खेत में लगी असली किस्म ही दर्ज कराएं — गलत किस्म दर्ज होने पर पर्ची और भुगतान में दिक्कत आ सकती है।
- पुरानी किस्म की पेड़ी का रखरखाव करें: जिन खेतों में बाहर होने वाली किस्मों की पेड़ी है, वहां कटाई समय पर करें ताकि मिल को गन्ना देने में कोई बाधा न आए।
पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: क्या बाहर होने वाली किस्मों का गन्ना मिलें अब नहीं लेंगी? उत्तर: नहीं। हटाने की प्रक्रिया दो साल में चरणबद्ध तरीके से होगी। पर्ची और सट्टे के हिसाब से मिलें गन्ना लेती रहेंगी। यह फैसला नई बुवाई के बीज चयन पर लागू होता है।
प्रश्न 2: को.0238 किस्म का क्या होगा? क्या वह भी बाहर हो रही है? उत्तर: नहीं। इस फैसले में को.0238 का नाम नहीं है। बाहर होने वाली आठ किस्में को.शा.95255, को.शा.97264, को.शा.96275, को.शा.97261, को.से.96436, को.शा.98231, को.शा.96246 और को.शा.98231 हैं।
प्रश्न 3: नई किस्मों का बीज कहां से मिलेगा? उत्तर: गन्ना समितियों, विभागीय बीज नर्सरियों और अधिकृत बीज उत्पादकों से। बुवाई से पहले अपनी समिति के सचिव से बीज की उपलब्धता की जानकारी ले लें।
प्रश्न 4: ‘अनुपयुक्त’ घोषित होने का मतलब क्या है? उत्तर: विभाग अब इन किस्मों को खेती के लिए उपयुक्त नहीं मानता — इनका रकबा नगण्य है और ये अलोकप्रिय हो चुकी हैं। दो साल में इनका प्रमाणित बीज और विभागीय समर्थन चरणबद्ध तरीके से बंद हो जाएगा।
प्रश्न 5: क्या इन किस्मों पर योजनाओं का लाभ बंद हो जाएगा? उत्तर: विभागीय योजनाओं में प्राथमिकता नई अनुमोदित किस्मों को मिलेगी। दो साल की अवधि के बाद बाहर की गई किस्मों पर योजना-लाभ मिलना मुश्किल होगा, इसलिए समय रहते किस्म बदलना ही समझदारी है।
स्रोत: किसान तक (1 अक्टूबर 2026), कृषक जगत (2 अक्टूबर 2026), ट्रैक्टर जंक्शन, प्रभात खबर — उत्तर प्रदेश बीज गन्ना एवं गन्ना किस्म स्वीकृति उप समिति की 29 सितंबर 2026 की बैठक के प्रेस नोट के आधार पर।
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