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गन्ना मूल्य ₹575 प्रति क्विंटल की मांग तेज: किसान सभा ने रमेश चंद समिति के पुनर्गठन की उठाई मांग, जानें यूपी के किसानों पर क्या असर

Aamir Raza Aamir Raza • Oct 17, 2026 • 6 min read
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गन्ना मूल्य ₹575 प्रति क्विंटल की मांग तेज: किसान सभा ने रमेश चंद समिति के पुनर्गठन की उठाई मांग, जानें यूपी के किसानों पर क्या असर
अंतिम अपडेट: October 17, 2026 4:31 PM IST — यह आर्टिकल नियमित रूप से अपडेट किया जाता है।

दिल्ली से एक ऐसी खबर आई है जो उत्तर प्रदेश के गन्ना किसान की जेब से सीधे जुड़ती है। अखिल भारतीय किसान सभा ने गन्ने का कानूनी रूप से गारंटीकृत मूल्य कम से कम ₹575 प्रति क्विंटल तय करने की मांग की है और केंद्र सरकार द्वारा गन्ना किसानों की मांगों पर विचार के लिए गठित समिति के पुनर्गठन की भी मांग उठाई है। संगठन का कहना है कि समिति की मौजूदा संरचना में किसानों की आवाज का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है। (कृषक जगत, 17 अक्टूबर 2026; ग्लोबल एग्रीकल्चर, 16 अक्टूबर 2026)

समय की अहमियत इसलिए है क्योंकि देश का पेराई सत्र 1 अक्टूबर से शुरू हो चुका है, लेकिन समिति को सिफारिशें सौंपने की कोई समयसीमा नहीं दी गई है। उत्तर प्रदेश के करीब 48 लाख गन्ना किसान परिवारों के लिए इस बहस का मतलब सीधा है — प्रदेश में 122 चीनी मिलें चलती हैं और एसएपी को लेकर किसान संगठन पहले से आंदोलनरत हैं। (अमर उजाला, 17 अक्टूबर 2026; अग्रिइंसाइट)

₹575 की मांग और समिति के पुनर्गठन का आह्वान

अखिल भारतीय किसान सभा की मांगों में दो बिंदु सबसे ऊपर हैं। पहला — गन्ने का मूल्य कानूनी रूप से गारंटीकृत हो और वह कम से कम ₹575 प्रति क्विंटल हो। दूसरा — गन्ना किसानों की मांगों और चीनी के न्यूनतम विक्रय मूल्य पर विचार के लिए गठित केंद्रीय समिति का पुनर्गठन किया जाए। संगठन ने महाराष्ट्र और कर्नाटक में आंदोलनरत गन्ना उत्पादकों का समर्थन करते हुए कहा है कि किसानों के दबाव के बिना यह समिति बनी ही नहीं होती। (कृषक जगत, 17 अक्टूबर 2026)

पुनर्गठन की मांग का तर्क है कि समिति में गन्ना उत्पादक संगठनों, गन्ना उत्पादक राज्य सरकारों और स्वतंत्र अर्थशास्त्रियों को शामिल किया जाए। (ग्लोबल एग्रीकल्चर, 16 अक्टूबर 2026)

समिति की संरचना पर सवाल क्यों उठ रहे हैं

केंद्र ने यह समिति नीति आयोग के पूर्व सदस्य प्रो. रमेश चंद की अध्यक्षता में गठित की है। उनके अलावा समिति में तीन अधिकारी हैं — कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के कृषि आयुक्त, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग के संयुक्त सचिव (चीनी) और उपभोक्ता मामले विभाग के संयुक्त सचिव (विधिक माप विज्ञान)। (इकोनॉमिक टाइम्स, 14 अक्टूबर 2026)

किसान सभा ने इस संरचना पर तीन आपत्तियां उठाई हैं — किसान संगठनों का कोई प्रतिनिधित्व नहीं, गन्ना उत्पादक राज्य सरकारों और स्वतंत्र अर्थशास्त्रियों को जगह नहीं, और प्रो. रमेश चंद की नियुक्ति पर आपत्ति, जिसके लिए उनके पूर्व में तीन कृषि कानूनों के समर्थन का हवाला दिया गया है। (कृषक जगत, 17 अक्टूबर 2026)

हिंदू बिज़नेस लाइन की 15 अक्टूबर की रिपोर्ट ने इस आलोचना की पुष्टि करने वाला अहम तथ्य सामने रखा — सरकारी आदेश के मुताबिक समिति किसानों, मिलों, राज्य सरकारों और विशेषज्ञों से केवल परामर्श करेगी, यानी ये पक्ष सदस्य नहीं हैं। समिति को रिपोर्ट सौंपने की कोई अंतिम तिथि भी नहीं दी गई है; आदेश में सिर्फ “जितनी जल्दी संभव हो” सिफारिशें देने को कहा गया है। (हिंदू बिज़नेस लाइन, 15 अक्टूबर 2026)

विचारार्थ विषय: भाव को मिलों की व्यवहार्यता से जोड़ने पर एतराज

समिति के विचारार्थ विषयों पर भी किसान सभा ने सवाल उठाए हैं। सरकारी आदेश के अनुसार समिति किसानों को मिलने वाले पारिश्रमिक मूल्य में वृद्धि की मांग, चीनी के एक्स-मिल न्यूनतम विक्रय मूल्य में संशोधन, चीनी रिकवरी के परीक्षण-रिपोर्टिंग तंत्र की पारदर्शी समीक्षा, मिलों में गन्ने के वजन की पद्धतियों की जांच और मशीनी कटाई वाले गन्ने के वजन में कटौती के आकलन जैसे बिंदुओं की जांच करेगी। (चिनीमंडी/पीआईबी सारांश; हिंदू बिज़नेस लाइन, 15 अक्टूबर 2026)

किसान सभा का कहना है कि किसानों के मूल्य को मिलों की वित्तीय व्यवहार्यता से जोड़ने से गन्ना मूल्य निर्धारण में मिल मालिकों के हितों को प्राथमिकता मिलने की आशंका है। संगठन की मांग है कि मूल्य निर्धारण का आधार किसानों की लागत और मेहनत हो। (कृषक जगत, 17 अक्टूबर 2026)

चीनी के न्यूनतम विक्रय मूल्य का मुद्दा भी बहस के केंद्र में है। यह मूल्य पहली बार जून 2018 में ₹29 प्रति किलो तय हुआ था, जब गन्ने का एफआरपी ₹255 प्रति क्विंटल था। 2018-19 में एफआरपी बढ़कर ₹275 हुआ तो न्यूनतम विक्रय मूल्य भी बढ़ाकर ₹31 प्रति किलो कर दिया गया — लेकिन उसके बाद से इसमें कोई संशोधन नहीं हुआ, यानी करीब सात साल से यह ₹31 पर अटका है। (एशियानेट न्यूज़/एएनआई, 14 अक्टूबर 2026; हिंदू बिज़नेस लाइन, 15 अक्टूबर 2026)

एफआरपी बनाम एसएपी: यूपी के किसान के लिए असली गणित

उत्तर प्रदेश के किसान के लिए इस बहस का सबसे सीधा पहलू एफआरपी और एसएपी का गणित है। केंद्र ने पेराई सत्र 2026-27 के लिए गन्ने का उचित एवं लाभकारी मूल्य (एफआरपी) ₹365 प्रति क्विंटल तय किया है, जो 10.25 प्रतिशत बेस रिकवरी पर लागू होगा — 2025-26 के ₹355 से ₹10 अधिक। रिकवरी 10.25 प्रतिशत से ऊपर हर 0.1 प्रतिशत पर ₹3.56 का प्रीमियम मिलेगा, और 9.5 प्रतिशत से कम रिकवरी पर कोई कटौती नहीं होगी (न्यूनतम ₹338.3 प्रति क्विंटल)। (हिंदू बिज़नेस लाइन; बिज़नेस स्टैंडर्ड)

उत्तर प्रदेश में गन्ना केंद्र के एफआरपी के ऊपर राज्य के राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) पर बिकता है। 2025-26 के लिए यूपी का एसएपी ₹400 प्रति क्विंटल (अगेती) और ₹390 प्रति क्विंटल (सामान्य) था। इसी पृष्ठभूमि में किसान संगठन एसएपी बढ़ाने की मांग तेज कर रहे हैं — बुलंदशहर में भारतीय किसान यूनियन (अराजनैतिक) ने 16 अक्टूबर को कलक्ट्रेट पर प्रदर्शन कर एसएपी ₹500 प्रति क्विंटल करने की मांग रखी, जबकि एक अन्य संगठन ने स्याना तहसील का घेराव कर ₹600 प्रति क्विंटल तक की मांग उठाई। (अमर उजाला, 17 अक्टूबर 2026)

समय का दबाव भी कम नहीं है — महाराष्ट्र में मिलों ने 15 अक्टूबर से पेराई शुरू कर दी है, जबकि पश्चिमी यूपी में मिलें 20 अक्टूबर के आसपास पेराई शुरू करने की तैयारी में हैं। कर्नाटक के गन्ना उत्पादक संगठन कम से कम ₹550 प्रति क्विंटल समर्थन मूल्य मांग चुके हैं। बिना समयसीमा वाली समिति की सिफारिशें कब आएंगी, यही किसानों का सबसे बड़ा सवाल है। (इकोनॉमिक टाइम्स; अग्रिइंसाइट)

जवाब जानिए

₹575 प्रति क्विंटल की मांग का मतलब क्या है? अखिल भारतीय किसान सभा ने मांग की है कि गन्ने का मूल्य कानूनी रूप से गारंटीकृत हो और वह कम से कम ₹575 प्रति क्विंटल तय किया जाए। (कृषक जगत; ग्लोबल एग्रीकल्चर)

रमेश चंद समिति में कौन-कौन शामिल है? अध्यक्ष प्रो. रमेश चंद (नीति आयोग के पूर्व सदस्य) हैं; इसके अलावा कृषि आयुक्त, संयुक्त सचिव (चीनी) और संयुक्त सचिव (विधिक माप विज्ञान) सदस्य हैं। किसान संगठन और राज्य सरकारें सदस्य नहीं हैं। (इकोनॉमिक टाइम्स, 14 अक्टूबर 2026)

किसान सभा को समिति से क्या दिक्कत है? संगठन का कहना है कि समिति में किसान संगठनों, गन्ना उत्पादक राज्य सरकारों और स्वतंत्र अर्थशास्त्रियों का प्रतिनिधित्व नहीं है, और भाव को मिलों की वित्तीय व्यवहार्यता से जोड़ने पर मिल मालिकों के हित को तरजीह मिलने की आशंका है। (कृषक जगत, 17 अक्टूबर 2026)

2026-27 का एफआरपी कितना तय है? केंद्र ने 2026-27 सत्र के लिए एफआरपी ₹365 प्रति क्विंटल तय किया है (10.25 प्रतिशत बेस रिकवरी पर)। यह पिछले सत्र के ₹355 से ₹10 अधिक है। (हिंदू बिज़नेस लाइन; बिज़नेस स्टैंडर्ड)

यूपी के किसानों पर इसका क्या असर होगा? यूपी में 122 चीनी मिलें हैं और करीब 48 लाख किसान परिवार गन्ने पर निर्भर हैं; किसान संगठन ₹500-600 प्रति क्विंटल एसएपी की मांग कर रहे हैं। समिति की सिफारिशों से एफआरपी या चीनी के न्यूनतम मूल्य में बदलाव होता है तो उसका असर यूपी के भाव और भुगतान दोनों पर पड़ेगा। (अमर उजाला; अग्रिइंसाइट)

स्रोत: कृषक जगत, ग्लोबल एग्रीकल्चर, हिंदू बिज़नेस लाइन, इकोनॉमिक टाइम्स, एशियानेट न्यूज़ (एएनआई), बिज़नेस स्टैंडर्ड, अमर उजाला, अग्रिइंसाइट।

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Aamir Raza
लेखक एवं मुख्य संपादक

Aamir Raza

संस्थापक एवं प्रधान संपादक — CaneUp.xyz। उत्तर प्रदेश गन्ना उद्योग, पर्ची कैलेंडर, SAP/MSP मूल्य नीति, ई-गन्ना पोर्टल और किसान अधिकारों पर 10+ वर्षों का जमीनी अनुभव।

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