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बलरामपुर चीनी के लखीमपुर बायो-प्लास्टिक प्लांट को मिले बड़े कमर्शियल ऑर्डर — गन्ने से बनेगा इको-पैकेजिंग

Randhir Patil Randhir Patil Sep 1, 2026 3 min read
बलरामपुर चीनी के लखीमपुर बायो-प्लास्टिक प्लांट को मिले बड़े कमर्शियल ऑर्डर — गन्ने से बनेगा इको-पैकेजिंग
अंतिम अपडेट: September 1, 2026 6:45 PM IST — यह आर्टिकल नियमित रूप से अपडेट किया जाता है।

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लखीमपुर खीरी / लखनऊ: भारत के चीनी उद्योग के इतिहास में हरित क्रांति का नया अध्याय लिखते हुए देश के पहले एकीकृत शुगर-टू-बायोपॉलिमर प्रोजेक्ट ‘बलरामपुर बायोयुग’ (Balrampur Bioyug) को नवंबर 2026 में होने वाले अपने कमर्शियल उत्पादन से पहले ही देश के प्रमुख एफएमसीजी (FMCG) समूहों, ई-कॉमर्स दिग्गजों और अंतरराष्ट्रीय पैकेजिंग कंसोर्टियम्स से बड़े पैमाने पर अग्रिम आपूर्ति समझौते (Off-Take Agreements) प्राप्त हो गए हैं। लखीमपुर खीरी जिले के कुंभी में ₹3,080 करोड़ के भारी निवेश से स्थापित यह अत्याधुनिक प्लांट गन्ने के सीधे रस और शीरे से शत-प्रतिशत बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक (Polylactic Acid - PLA) का उत्पादन करेगा।

बलरामपुर चीनी मिल्स लिमिटेड के प्रबंध निदेशक विवेक सरावगी ने आज लखनऊ में एक उद्योग सम्मेलन के दौरान बताया कि कुंभी प्लांट का प्री-कमीशनिंग ट्रायल और पॉलीमेराइजेशन रिएक्टर टेस्टिंग 95% पूरी हो चुकी है। यह संयंत्र प्रति वर्ष 80,000 मीट्रिक टन पीएलए बायो-प्लास्टिक का निर्माण करेगा, जिससे भारत की पारंपरिक पेट्रोलियम-आधारित प्लास्टिक पर निर्भरता में भारी कमी आएगी।

गन्ने से बने पीएलए प्लास्टिक की क्या है खासियत?

कुंभी बायो-प्लास्टिक संयंत्र के मुख्य प्रौद्योगिकी अधिकारी (CTO) ने बताया कि गन्ने के रस में मौजूद सुक्रोज को पहले विशेष किण्वन (Fermentation) प्रक्रिया द्वारा शुद्ध लैक्टिक एसिड में बदला जाता है, जिसके बाद हाई-वैक्यूम पॉलीमराइजेशन से उच्च गुणवत्ता वाले पीएलए दाने (Resin Granules) तैयार होते हैं:

  1. 100% कंपोस्टेबल: यह प्लास्टिक उपयोग के बाद मिट्टी या इंडस्ट्रियल कंपोस्ट में 90 से 180 दिनों के भीतर पूरी तरह प्राकृतिक कार्बनिक खाद और पानी में बदल जाता है।
  2. शून्य टॉक्सिसिटी: इसमें कोई हानिकारक रसायन या माइक्रो-प्लास्टिक अवशेष नहीं होता, जो इसे फूड पैकेजिंग, दूध की बोतलों, स्ट्रा, कप-प्लेट और मेडिकल डिस्पोजेबल्स के लिए सबसे सुरक्षित बनाता है।
  3. ग्रीन एनर्जी से संचालन: प्लांट पूरी तरह से गन्ने की खोई (Bagasse) से उत्पन्न 100% हरित बायो-एनर्जी और जीरो लिक्विड डिस्चार्ज (ZLD) तकनीक पर काम करता है।

लखीमपुर खीरी के 60,000 गन्ना किसानों को होगा सीधा लाभ

इस विशाल बायो-पॉलिमर प्लांट के संचालन से लखीमपुर खीरी, सीतापुर और हरदोई के लगभग 60,000 गन्ना किसानों के लिए गन्ने की सुनिश्चित और निरंतर मांग पैदा होगी। चीनी मिल प्रबंधन ने घोषणा की है कि बायो-प्लास्टिक के लिए उच्च सुक्रोज वाले गन्ने की आपूर्ति करने वाले पंजीकृत किसानों को सामान्य एसएपी भाव के अलावा प्रति क्विंटल विशेष लॉयल्टी ग्रीन बोनस दिया जाएगा।

उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि यूरोपीय संघ और भारत सरकार द्वारा सिंगल-यूज प्लास्टिक पर लगाए जा रहे कड़े वैश्विक प्रतिबंधों के बीच गन्ने से बनने वाला बायो-प्लास्टिक भविष्य का सबसे बड़ा गेम चेंजर साबित होगा, जिससे भारतीय चीनी मिलों की आर्थिक निर्भरता केवल चीनी बिक्री पर नहीं रहेगी।

भारत को वैश्विक स्तर पर मिलेगा बायो-प्लास्टिक हब का दर्जा

कुंभी प्लांट से उत्पादित पीएलए दानों का निर्यात मध्य-पूर्व, यूरोप और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों को भी किया जाएगा। इससे देश को प्रति वर्ष लगभग ₹1,200 करोड़ की विदेशी मुद्रा अर्जित होगी और उत्तर प्रदेश देश में ग्रीन बायो-मैन्युफैक्चरिंग का सिरमौर राज्य बनकर उभरेगा।

राज्य सरकार ने आश्वासन दिया है कि कुंभी बायो-प्लास्टिक प्रोजेक्ट की सफलता के बाद प्रदेश की अन्य प्रमुख चीनी मिलों (त्रिवेणी, धामपुर और डीसीएम श्रीराम) को भी इसी तरह के बायोपॉलिमर संयंत्र स्थापित करने के लिए विशेष औद्योगिक सब्सिडी और कर छूट प्रदान की जाएगी।

Randhir Patil
लेखक

Randhir Patil

गन्ना उद्योग विशेषज्ञ — ChiniMandi पर 425+ लेख। गन्ना खेती, शुगर मिल, MSP रेट, सरकारी योजनाओं पर विश्वसनीय जानकारी।

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