बिजनौर की 10 चीनी मिलों का 7 साल बाद बड़ा फैसला: अब सिर्फ चीनी बनेगी, ₹4,500 प्रति क्विंटल का बाजार — गन्ना किसानों को होगा ये फायदा

चीनी मंडी के दाम-बोर्ड पर इस हफ्ते जो नंबर दर्ज हुए, उन्होंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की मिलों का गणित ही बदल दिया। दैनिक जागरण की 9 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक बिजनौर जिले की दस चीनी मिलों ने सात साल बाद बड़ा फैसला लिया है — इस पेराई सत्र में मिलें सिर्फ चीनी बनाएंगी। बी-हैवी शीरा नहीं, गन्ने के रस से एथनॉल नहीं, रॉ शुगर भी नहीं। पूरी पेराई केवल सी-हैवी शीरे पर चलेगी, क्योंकि चीनी के दाम सवा चार से साढ़े चार हजार रुपये प्रति क्विंटल तक चल रहे हैं। किसान के मन का सवाल साफ है — मिलें मोटी कमाई करेंगी, तो क्या उसका फायदा किसानों तक भी पहुंचेगा?
सात साल बाद बदला पूरा खेल — बिजनौर में क्या हुआ
जागरण संवाददाता बिजनौर की रिपोर्ट बताती है कि जिले की दस चीनी मिलें सात वर्ष बाद केवल सी-हैवी पर चलेंगी। मिल प्रबंधनों का तर्क है कि महाराष्ट्र और कर्नाटक में इस बार गन्ने की पैदावार कम बताई जा रही है, जिससे देश में चीनी का उत्पादन गिरेगा और दाम बढ़ेगा। बाजार को भुनाने के लिए मिलों ने एथनॉल और रॉ शुगर से हटकर घरेलू बाजार के लिए चीनी उत्पादन पर पूरा जोर लगाने का मन बनाया है।
सात साल पीछे देखें तो तस्वीर साफ होती है। एक समय मिलों की आमदनी केवल चीनी के उत्पादन और बाजार भाव पर निर्भर थी। फिर मिलों ने शीरे से एथनॉल बनाया, बिजली बनाई। 2018 के आसपास गन्ने की पैदावार बंपर हुई तो पहले बी-हैवी शीरा और बाद में गन्ने के रस से सीधे एथनॉल बनाया गया। विदेशी बाजार के लिए रॉ शुगर भी बनाई गई। मिलों में एथनॉल प्लांट लगे और अब सीबीजी प्लांट लगने जा रहे हैं। लेकिन चीनी के चढ़े बाजार ने मिलों को वापस चीनी की तरफ मोड़ दिया है।
सी-हैवी और बी-हैवी शीरा — किसान के लिए समझना क्यों जरूरी
गन्ने के रस से चीनी बनने के बाद जो रस बचता है, उसे सी-हैवी शीरा कहते हैं — इसमें मिठास नहीं के बराबर होती है। इसी में 15 प्रतिशत तक मिठास छोड़ने पर उसे बी-हैवी शीरा बोलते हैं। दोनों से एथनॉल बनता है, लेकिन बी-हैवी से चीनी कम निकलती है। जब मिल बी-हैवी या गन्ने के रस से एथनॉल बनाती है, तो चीनी का उत्पादन घट जाता है। और जब चीनी का बाजार चढ़ा हो, तो मिल के लिए सबसे मुनाफे वाला काम होता है — पूरा गन्ना चीनी में बदलना। बिजनौर की मिलें इस बार ठीक यही करने जा रही हैं।
जागरण की रिपोर्ट के मुताबिक जिले की धामपुर, स्योहारा, बरकातपुर, बुंदकी और चांगीपुर मिलें बी-हैवी बनाती हैं, और अब ये सभी सी-हैवी पर चलकर केवल चीनी का उत्पादन करेंगी। बरकातपुर चीनी मिल के संयुक्त अध्यक्ष नरपत सिंह का बयान रिपोर्ट में दर्ज है कि इस बार मिल द्वारा केवल चीनी बनाई जाएगी, चीनी का बाजार अच्छा है और बाकी मिलें भी केवल स्थानीय बाजार के लिए चीनी बनाने की बात कह रही हैं।
महाराष्ट्र-कर्नाटक में फसल कम — इसलिए चीनी का बाजार चढ़ेगा
इस फैसले के पीछे का गणित देश के दो बड़े गन्ना राज्यों की फसल से जुड़ा है। जागरण की रिपोर्ट के अनुसार कम बरसात के चलते महाराष्ट्र में गन्ने की पैदावार करीब 20 प्रतिशत और कर्नाटक में करीब 30 प्रतिशत तक रहने की आशंका है। यानी देश के कुल चीनी उत्पादन पर दबाव बढ़ेगा और बाजार चढ़ा ही रहेगा।
चीनीमंडी की रिपोर्टों में भी तेजी की पुष्टि मिलती है। थोक बाजार में चीनी का भाव करीब 4,400 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गया है, जो सात साल का सबसे ऊंचा स्तर है। बिजनौर की मिलों के पास पिछले साल के मुकाबले आधा ही स्टॉक बचा है — करीब 20.62 लाख क्विंटल, जबकि पिछले साल 35.50 लाख क्विंटल था। कम स्टॉक और तेज मांग का यही समीकरण दाम को और ऊपर धकेल सकता है। पिछले सत्र में मिलों ने 43,000 मीट्रिक टन का रॉ शुगर निर्यात कोटा मिलने के बावजूद एक दाना भी विदेश नहीं भेजा था — घरेलू बाजार में बेहतर दाम मिल रहे थे।
4,500 रुपये प्रति क्विंटल का बाजार — किसानों को इससे क्या मिलेगा
अब असली सवाल: मिलों की इस कमाई का किसान को क्या फायदा होगा? यहां ईमानदारी से दो चीजें अलग-अलग समझनी होंगी।
पहली — भुगतान की क्षमता। चीनी मिलों की आर्थिक सेहत का सीधा रिश्ता गन्ना भुगतान की रफ्तार से है। जब चीनी के दाम ऊंचे होते हैं, तो मिलों के पास नकदी बेहतर होती है और भुगतान में देरी की गुंजाइश घटती है। उत्तर प्रदेश में नियम साफ है — गन्ना तौल के 14 दिन के भीतर भुगतान अनिवार्य है, और देरी पर 15 प्रतिशत वार्षिक ब्याज का प्रावधान है। ऐसे में चढ़े बाजार का पहला सीधा फायदा यही हो सकता है कि इस सत्र में भुगतान समय पर मिले।
दूसरी — गन्ने का भाव। यहां सावधानी जरूरी है। केंद्र सरकार ने 2026-27 सीजन के लिए एफआरपी 365 रुपये प्रति क्विंटल तय कर दी है, जो 1 अक्टूबर 2026 से लागू है। लेकिन उत्तर प्रदेश में किसानों के लिए असली भाव एसएपी (राज्य सलाहकारी मूल्य) होता है, और 2026-27 के एसएपी की घोषणा अभी बाकी है। 2025-26 में एसएपी अगेती किस्म के लिए 400 रुपये प्रति क्विंटल था। चीनी के ऊंचे बाजार और मिलों की बेहतर कमाई किसान संगठनों की मांग को मजबूती देती है, लेकिन एसएपी की घोषणा राज्य सरकार का फैसला है — इसलिए इसे पक्का मानकर चलना ठीक नहीं होगा।
पेराई सत्र 2026-27 से पहले किसान क्या करें
पश्चिमी यूपी की मिलें 20 अक्टूबर के आसपास नया पेराई सत्र शुरू करने की तैयारी में हैं। इससे पहले अपना सट्टा और सर्वे का ब्योरा जांच लें — रकबा, किस्म की पुष्टि करा लें और बैंक खाता सक्रिय व दस्तावेजों से जुड़ा हो, ताकि भुगतान में देरी न हो। गन्ना पर्ची और कैलेंडर ई-गन्ना ऐप और caneup.in पोर्टल पर देखे जा सकते हैं, और पर्ची जारी होने की सूचना मोबाइल पर एसएमएस से भी आती है।
भुगतान पर नजर रखें: 14 दिन का नियम हर पर्ची पर लागू होता है। देरी हो तो जिला गन्ना अधिकारी के कार्यालय में शिकायत दर्ज कराएं। टोल-फ्री हेल्पलाइन 1800-121-3203 और 1800-180-5129 उपलब्ध हैं, और 51969 पर एसएमएस से भी जानकारी ली जा सकती है।
आपके सवाल
सवाल: क्या इससे गन्ने का भाव (एसएपी) बढ़ जाएगा? जवाब: इसकी कोई गारंटी नहीं है। एसएपी की घोषणा राज्य सरकार करती है और 2026-27 के एसएपी की घोषणा अभी बाकी है। लेकिन चीनी के चढ़े बाजार से किसान संगठनों की मांग मजबूत जरूर हुई है।
सवाल: बी-हैवी और सी-हैवी में क्या अंतर है? जवाब: चीनी बनने के बाद बचे रस को सी-हैवी कहते हैं, जिसमें मिठास नहीं के बराबर होती है। इसमें 15 प्रतिशत तक मिठास छोड़ने पर वह बी-हैवी कहलाता है। बी-हैवी से चीनी कम बनती है, इसलिए महंगे बाजार में मिलें सी-हैवी पर चलकर ज्यादा चीनी बनाना पसंद करती हैं।
सवाल: गन्ना भुगतान में देरी हो तो कहां शिकायत करें? जवाब: जिला गन्ना अधिकारी के कार्यालय में शिकायत दर्ज कराएं। टोल-फ्री हेल्पलाइन 1800-121-3203 और 1800-180-5129 पर भी शिकायत की जा सकती है। नियमानुसार 14 दिन से ज्यादा देरी पर 15 प्रतिशत वार्षिक ब्याज का हक बनता है।
स्रोत: दैनिक जागरण, बिजनौर (9 अक्टूबर 2026); चीनीमंडी (अक्टूबर 2026) — चीनी के थोक भाव 4,400 रुपये प्रति क्विंटल, सात साल का उच्चतम स्तर।
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