16 अक्टूबर को हर जिले के डीएम दफ्तर पर धरना: चीनी 60 रुपये किलो पार, फिर गन्ने का भाव सिर्फ ₹400 क्यों — भाकियू अराजनैतिक बोली, ₹500 करो

बाजार में चीनी के दाम आसमान छू रहे हैं, लेकिन खेत में गन्ना उगाने वाले किसान को आज भी पुराना भाव मिल रहा है — इसी नाराजगी को लेकर भारतीय किसान यूनियन अराजनैतिक ने आंदोलन का बिगुल फूंक दिया है। संगठन ने ऐलान किया है कि 16 अक्टूबर को प्रदेश के हर जिले में जिलाधिकारी कार्यालय पर प्रदर्शन किया जाएगा और मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा जाएगा। संगठन की सबसे बड़ी मांग है कि गन्ने का भाव कम से कम ₹500 प्रति क्विंटल घोषित किया जाए।
संगठन का तर्क सीधा है: जब खुदरा बाजार में चीनी ₹60 प्रति किलो के पार बिक रही है, तो गन्ना किसान को उसकी लागत और मेहनत के हिसाब से लाभकारी मूल्य क्यों नहीं मिलना चाहिए? राष्ट्रीय प्रवक्ता धर्मेंद्र मलिक ने साफ कहा है कि गन्ने के मूल्य का सवाल सिर्फ चीनी मिलों की आर्थिक स्थिति तक सीमित नहीं रखा जा सकता। किसान पूरे साल पूंजी, मेहनत और समय लगाकर फसल तैयार करता है और मौसम, बीमारी और उत्पादन के जोखिम भी वही उठाता है — इसलिए भाव ऐसा होना चाहिए जिससे किसान अपनी लागत निकालने के साथ सम्मानजनक आय भी कमा सके।
16 अक्टूबर को क्या होगा
रॉयल बुलेटिन की रिपोर्ट के मुताबिक भाकियू अराजनैतिक के सहारनपुर और मेरठ मंडल की बैठक में यह फैसला लिया गया कि 16 अक्टूबर को प्रदेशभर के सभी जिलाधिकारी कार्यालयों पर एक साथ प्रदर्शन होगा। हर जिले में किसान डीएम दफ्तर पहुंचेंगे और मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपकर अपनी मांगें सरकार तक पहुंचाएंगे। संगठन ने कहा है कि यह प्रदर्शन सिर्फ एक दिन का कार्यक्रम नहीं, बल्कि गन्ना मूल्य की लड़ाई का आगाज है — संगठन इस मांग को लेकर गांव-गांव किसानों के बीच जाएगा और सरकार पर लगातार दबाव बनाए रखेगा।
बागपत में हुई आगरा मंडल की बैठक में भी 16 अक्टूबर को जिलाधिकारी कार्यालय पर प्रदर्शन का आह्वान किया गया। बैठक में बागपत, हापुड़, बुलंदशहर, गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, सहारनपुर, शामली और मुजफ्फरनगर के जिलाध्यक्षों समेत सैकड़ों पदाधिकारी मौजूद रहे।
संगठन की चार बड़ी मांगें
भाकियू अराजनैतिक ने सरकार के सामने चार स्पष्ट मांगें रखी हैं:
पहली — गन्ने का भाव ₹500 प्रति क्विंटल: संगठन का कहना है कि खेती की लागत लगातार बढ़ रही है — खाद, बीज, दवाएं, सिंचाई और मजदूरी सब महंगा हो गया है। ऐसे में गन्ने का मूल्य कम से कम ₹500 प्रति क्विंटल घोषित होना चाहिए। धर्मेंद्र मलिक का तर्क है कि वैश्विक बाजार में चीनी की स्थिति को देखते हुए आने वाले समय में भी कीमतों में बड़ी गिरावट की संभावना नजर नहीं आती, इसलिए सरकार को बाजार की परिस्थितियों और किसानों की बढ़ती लागत को ध्यान में रखकर भाव तय करना चाहिए।
दूसरी — बेमौसम बारिश से बर्बाद फसलों का मुआवजा: हाल की बेमौसम बारिश में जिन किसानों की फसलें बर्बाद हुई हैं, उन्हें जल्द मुआवजा मिलना चाहिए।
तीसरी — खाद की उपलब्धता: बुवाई के सीजन में किसानों को खाद की किल्लत न हो, इसकी पुख्ता व्यवस्था सरकार करे।
चौथी — लाभकारी मूल्य निर्धारण की नीति: सिर्फ भाव घोषित करना काफी नहीं — मूल्य निर्धारण में किसानों की वास्तविक लागत, मेहनत, कृषि जोखिम और परिवार की आर्थिक जरूरतों को भी शामिल किया जाए। प्रदेश अध्यक्ष हरिनाम सिंह वर्मा ने कहा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कृषि अर्थव्यवस्था में गन्ने की भूमिका सबसे अहम है और लाखों किसान परिवारों की आजीविका इसी फसल पर टिकी है।
चीनी 60 पार, गन्ना 400 — गणित क्या कहता है
संगठन का सबसे तीखा सवाल यही है: जब उपभोक्ता बाजार में चीनी के दाम ऊंचे हैं, तो उसका फायदा गन्ना किसान तक क्यों नहीं पहुंचता? ध्यान रहे कि “चीनी ₹60 किलो पार” यह संगठन का दावा है — भाव शहर, ब्रांड और दुकान के हिसाब से अलग-अलग हो सकते हैं। लेकिन मोटा गणित किसान के पक्ष में ही जाता है: एक क्विंटल गन्ने से करीब 10 किलो चीनी बनती है, यानी ₹60 के हिसाब से एक क्विंटल गन्ने की चीनी का खुदरा मूल्य लगभग ₹600 बैठता है, जबकि किसान को मिल रहा है ₹400 (पिछले सीजन का एसएपी)।
अभी की आधिकारिक स्थिति यह है: केंद्र सरकार ने 2026-27 चीनी सीजन के लिए एफआरपी ₹365 प्रति क्विंटल तय किया है (10.25 प्रतिशत बेसिक रिकवरी पर)। उत्तर प्रदेश में 2025-26 के लिए एसएपी अगेती किस्मों का ₹400 और सामान्य किस्मों का ₹390 प्रति क्विंटल था। 2026-27 सीजन के एसएपी की घोषणा अभी बाकी है — यानी नया पेराई सत्र सिर पर है और किसान नहीं जानता कि इस बार उसे गन्ने का क्या भाव मिलेगा। यही अनिश्चितता आंदोलनों को हवा दे रही है।
गौरतलब है कि गन्ना भाव को लेकर किसान संगठन एक सुर में नहीं हैं — भाकियू टिकैत गुट ₹600 प्रति क्विंटल की मांग कर चुका है, जबकि कर्नाटक के किसान संगठन कम से कम ₹550 पर अड़े हैं।
चुनाव आयुक्त वाले आंदोलन पर संगठन ने क्या कहा
बैठक में एक दिलचस्प मोड़ तब आया जब राष्ट्रीय प्रवक्ता धर्मेंद्र मलिक ने मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन में किसान संगठनों की भागीदारी पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि किसान संगठनों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि ऐसे मुद्दे में शामिल होने से किसानों को क्या लाभ होगा — किसान संगठन अपनी ऊर्जा गन्ना भाव, मुआवजा और खाद जैसी जमीनी मांगों पर लगाएं।
यूपी के गन्ना किसान के लिए इसका क्या मतलब है
16 अक्टूबर का प्रदर्शन ऐसे समय हो रहा है जब नया पेराई सत्र 2026-27 बस शुरू होने वाला है — पश्चिमी यूपी की कई मिलें अक्टूबर के तीसरे-चौथे हफ्ते में पहिए घुमाने की तैयारी में हैं। अगर सरकार पर दबाव बनता है, तो 2026-27 के एसएपी की घोषणा में तेजी आ सकती है। किसानों के लिए यह भी याद रखने का समय है कि पेराई शुरू होने से पहले अपनी पर्ची, सट्टा और सर्वे का ब्योरा दुरुस्त कर लें, ताकि सीजन में भुगतान में देरी न हो।
एक और अहम बात: नियमानुसार गन्ना आपूर्ति के 14 दिन के भीतर भुगतान होना चाहिए और देरी पर 15 प्रतिशत वार्षिक ब्याज का प्रावधान है। शिकायत गन्ना विभाग के टोल-फ्री नंबर 1800-121-3203 या 1800-180-5129 पर की जा सकती है।
आपके सवाल
16 अक्टूबर को प्रदर्शन कहां-कहां होगा? भाकियू अराजनैतिक के ऐलान के मुताबिक प्रदेश के हर जिले में जिलाधिकारी कार्यालय के बाहर प्रदर्शन होगा और मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा जाएगा।
संगठन ने गन्ने का क्या भाव मांगा है? कम से कम ₹500 प्रति क्विंटल। संगठन का कहना है कि बढ़ती उत्पादन लागत और ऊंचे चीनी दामों को देखते हुए यही न्यायसंगत भाव है।
अभी गन्ने का आधिकारिक भाव क्या चल रहा है? 2025-26 सीजन में यूपी का एसएपी अगेती किस्मों के लिए ₹400 और सामान्य किस्मों के लिए ₹390 प्रति क्विंटल था। केंद्र का एफआरपी 2026-27 के लिए ₹365 प्रति क्विंटल तय है। 2026-27 के यूपी एसएपी की घोषणा अभी बाकी है।
क्या चीनी वाकई ₹60 किलो से ऊपर बिक रही है? यह भारतीय किसान यूनियन अराजनैतिक का दावा है, जिसे उसने अपनी ₹500 भाव की मांग के समर्थन में रखा है। खुदरा भाव शहर और ब्रांड के हिसाब से अलग हो सकते हैं।
प्रदर्शन के बाद संगठन की आगे क्या योजना है? संगठन ने कहा है कि वह इस मांग को लेकर किसानों के बीच जाएगा और सरकार पर लगातार दबाव बनाए रखेगा, ताकि गन्ना किसानों को उनकी मेहनत का सही मूल्य मिल सके।
स्रोत: फ्रेंड्स रिपोर्टर और रॉयल बुलेटिन (12 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट); पृष्ठभूमि आंकड़े — चिनीमंडी (एफआरपी/एसएपी) और किसान इंडिया (कैबिनेट भुगतान आंकड़े)।
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