गन्ने के खेत में खरपतवार खा जाते हैं 40% तक उपज: अक्टूबर में इस तरह करें प्रबंधन, बुवाई के पहले 3 महीने सबसे नाजुक

🚨 BREAKING: अक्टूबर का महीना उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों के लिए साल का सबसे अहम दौर है — शरदकालीन गन्ने की बुवाई (मध्य सितंबर से मध्य नवंबर) चल रही है और पेडी (रैटून) की फसल भी बढ़वार पर है। लेकिन इसी समय खेत में एक ऐसा दुश्मन पनपता है जिसे ज्यादातर किसान हल्के में ले लेते हैं — खरपतवार। कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक, समय पर खरपतवार नियंत्रण न किया जाए तो गन्ने की उपज 30 से 40 प्रतिशत तक घट सकती है, यानी प्रति एकड़ करीब 80 क्विंटल गन्ने का नुकसान। उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद के प्रसार अधिकारियों और भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान (IISR) की सिफारिशों के आधार पर पेश है खरपतवार प्रबंधन की पूरी वैज्ञानिक गाइड।
खरपतवार क्यों हैं गन्ने के सबसे बड़े दुश्मन
गन्ने की दो पंक्तियों के बीच की दूरी अन्य फसलों से ज्यादा होती है। इस खाली जगह का फायदा सबसे पहले खरपतवार उठाते हैं। उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद के प्रसार अधिकारी डॉ. संजीव पाठक के मुताबिक, गन्ने के खेत में चौड़ी और संकरी पत्ती के करीब 45 प्रकार के खरपतवार पाए जाते हैं।
खरपतवार सिर्फ जगह नहीं घेरते — वे गन्ने का खाना छीनते हैं। कृषि जागरण में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, खरपतवार मिट्टी से गन्ने की तुलना में अधिक नाइट्रोजन और फास्फोरस खींच लेते हैं। किसान जो यूरिया-डीएपी डालता है, उसका बड़ा हिस्सा खरपतवार खा जाते हैं।
आईसीएआर की रिपोर्ट (जी बिजनेस में उद्धृत) बताती है कि विकासशील देशों में खरपतवारों से फसलों को 20 से 30 प्रतिशत तक नुकसान होता है, और गन्ने जैसी लंबी अवधि की फसल में यह आंकड़ा 40 प्रतिशत तक पहुंच जाता है।
सबसे नाजुक समय: बुवाई के पहले 3 महीने
वैज्ञानिक शोध (द फार्मा इनोवेशन जर्नल में प्रकाशित समीक्षा) के अनुसार, गन्ने की फसल बुवाई के बाद 120 दिनों तक खरपतवारों से कड़ी प्रतिस्पर्धा झेलती है। डॉ. पाठक का कहना है कि बुवाई के शुरुआती तीन महीने खरपतवार नियंत्रण के लिए सबसे अहम हैं। इस दौरान अगर खरपतवार काबू में रहें, तो बाद में गन्ने की छतरी (कैनोपी) इतनी घनी हो जाती है कि नए खरपतवार पनप ही नहीं पाते।
अक्टूबर में बोए जा रहे शरदकालीन गन्ने के लिए यह बात और भी अहम है, क्योंकि सर्दियों में गन्ने की बढ़वार धीमी होती है और खरपतवारों को बढ़ने का मौका मिल जाता है।
रासायनिक विधि: कौन-सी दवा, कब और कितनी
कृषि विज्ञान के प्रयोगों के आधार पर गन्ने में खरपतवारनाशियों का यह क्रम सबसे कारगर माना गया है:
1. बुवाई के समय (प्री-इमरजेंस): बुवाई के तीसरे-चौथे दिन खेत में नमी रहते हुए एट्राजीन 1.25 से 2.0 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर या ऑक्सीफ्लोरफेन 750 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर का छिड़काव करें। दवा को करीब 900 लीटर पानी में घोलकर फैन-टाइप नोजल से छिड़कें। यह बीज से उगने वाले ज्यादातर चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों को 50-60 दिनों तक दबाए रखता है।
2. बुवाई के 40-60 दिन बाद (पोस्ट-इमरजेंस): बचे-खुचे खरपतवारों पर 2,4-डी 1.0 से 1.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर का निर्देशित छिड़काव (सिर्फ खरपतवार की पत्तियों पर) करें। मेट्रिब्यूजिन, डायूरॉन और एलाक्लोर भी प्री-इमरजेंस विकल्पों के रूप में प्रभावी पाए गए हैं।
3. पेडी (रैटून) में: रैटून फसल में बेल वाले खरपतवार (जैसे आइपोमिया) गंभीर समस्या बनते हैं। इनके लिए मेट्रिब्यूजिन आधारित पोस्ट-इमरजेंस छिड़काव फूल आने से पहले करना जरूरी है।
ध्यान रहे — खरपतवारनाशी फसल-विशिष्ट होते हैं और लगातार एक ही दवा के इस्तेमाल से कुछ खरपतवारों में प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती है। इसलिए दवाओं का चक्र बदलते रहें और हमेशा लेबल पर लिखी मात्रा का ही पालन करें।
यांत्रिक विधि: निराई-गुड़ाई और मिट्टी चढ़ाना
जो किसान रासायनिक विधि से बचना चाहते हैं या पूरक उपाय चाहते हैं, उनके लिए यांत्रिक विधि बेहद कारगर है:
- निराई-गुड़ाई: बुवाई के 25, 55 और 85 दिन बाद पंक्तियों के बीच जूनियर-हो चलाएं और नालियों के खरपतवार हाथ से निकालें। निराई-गुड़ाई से मिट्टी में हवा का संचार होता है, जड़ों का विकास अच्छा होता है और पौधे उर्वरक व पानी बेहतर तरीके से ग्रहण करते हैं।
- मिट्टी चढ़ाना (अर्थिंग-अप): पेडी और बुवाई वाली दोनों फसलों में आंशिक और पूर्ण मिट्टी चढ़ाने से खरपतवार दब जाते हैं और गन्ने के तने मजबूत होते हैं।
- गुड़ाई के साथ खाद: गुड़ाई के समय खरपतवार निकालकर उसी में खाद मिलाने से दोहरा फायदा मिलता है।
ट्रेंच विधि वालों के लिए खास सावधानी
ट्रेंच विधि से बुवाई करने वाले किसानों को अतिरिक्त सतर्क रहना चाहिए। दो पंक्तियों के बीच ज्यादा जगह होने से खरपतवार तेजी से बढ़ते हैं। ऐसे खेतों में बुवाई के तीसरे दिन ही खरपतवारनाशी का छिड़काव जरूर करें और पहली निराई समय पर करें।
अंतरवर्तीय फसल: प्राकृतिक खरपतवार नियंत्रण
शरदकालीन गन्ने के साथ अंतरवर्तीय फसल (इंटरक्रॉपिंग) खरपतवार नियंत्रण का प्राकृतिक तरीका है। गन्ने के साथ चना, राजमा, मटर, मसूर, गेहूं, सरसों, आलू या धनिया लगाने से खाली जगह खरपतवारों को नहीं मिलती और किसान को अतिरिक्त आय भी होती है। शोध बताते हैं कि अंतरवर्तीय फसल से गन्ने की उपज या गुणवत्ता पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ता।
IISR का समेकित खरपतवार प्रबंधन (IWM)
भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान (IISR), लखनऊ ने “समेकित खरपतवार प्रबंधन” तकनीक विकसित की है — प्री-इमरजेंस और पोस्ट-इमरजेंस खरपतवारनाशी, हाथ से निराई और यांत्रिक गुड़ाई का समन्वित इस्तेमाल (जर्नल ऑफ एक्सपेरिमेंटल एग्रीकल्चर इंटरनेशनल, 2024)। इससे खेत में खरपतवारों का बीज भंडार घटता है और लंबे समय तक खेत साफ रहता है।
दवा छिड़कते समय ये सावधानियां जरूर बरतें
- छिड़काव के समय खेत में पर्याप्त नमी होनी चाहिए; सूखे खेत में दवा असर नहीं करती।
- 2,4-डी का छिड़काव तब न करें जब पड़ोस में कपास या भिंडी जैसी फसल हो — दवा उड़कर नुकसान पहुंचा सकती है।
- छिड़काव के दौरान मास्क, दस्ताने और पूरी आस्तीन के कपड़े पहनें; खाली डिब्बों को खेत में न फेंकें।
- किसी भी नई दवा को पूरे खेत में लगाने से पहले छोटे हिस्से में आजमाएं और कृषि विभाग या गन्ना विकास निरीक्षक से सलाह लें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सवाल: गन्ने में खरपतवार से कितना नुकसान होता है? जवाब: कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक, समय पर नियंत्रण न हो तो उपज 30 से 40 प्रतिशत तक घट सकती है — यानी प्रति एकड़ करीब 80 क्विंटल गन्ने का नुकसान।
सवाल: खरपतवार नियंत्रण का सबसे सही समय कौन-सा है? जवाब: बुवाई के पहले तीन महीने (120 दिन) सबसे नाजुक हैं। बुवाई के तीसरे-चौथे दिन प्री-इमरजेंस छिड़काव और 40-60 दिन बाद पोस्ट-इमरजेंस छिड़काव का क्रम अपनाएं।
सवाल: क्या बिना दवा के भी खरपतवार नियंत्रित हो सकते हैं? जवाब: हां। 25, 55 और 85 दिन पर निराई-गुड़ाई, मिट्टी चढ़ाना और अंतरवर्तीय फसल से अच्छा नियंत्रण मिलता है, हालांकि बड़े खेतों में यह श्रम-सघन पड़ता है।
सवाल: पेडी (रैटून) में खरपतवार की समस्या ज्यादा क्यों होती है? जवाब: कटाई के बाद खेत खाली रहता है और बेल वाले खरपतवार गन्ने पर चढ़ जाते हैं। इनके लिए फूल आने से पहले पोस्ट-इमरजेंस छिड़काव जरूरी है।
सवाल: क्या खरपतवारनाशी से गन्ने को नुकसान हो सकता है? जवाब: सही दवा, सही मात्रा और सही समय पर छिड़काव से गन्ने को नुकसान नहीं होता। लेबल की मात्रा से ज्यादा दवा न डालें और निर्देशित छिड़काव ही करें।
स्रोत: कृषि जागरण (उ.प्र. गन्ना शोध परिषद के प्रसार अधिकारी डॉ. संजीव पाठक), जी बिजनेस (आईसीएआर रिपोर्ट), द फार्मा इनोवेशन जर्नल (खरपतवार प्रबंधन समीक्षा), जर्नल ऑफ एक्सपेरिमेंटल एग्रीकल्चर इंटरनेशनल (IISR समेकित खरपतवार प्रबंधन), ई-एग्री (तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय)।
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