पत्तियां जलाकर मुफ्त खाद मत जलाइए: पेराई सीजन में 3 आसान तरीकों से गन्ने की पत्तियों से बनाएं जैविक खाद

उत्तर प्रदेश में पेराई सीजन की शुरुआत के साथ खेतों में गन्ने की कटाई तेज हो गई है, और कटाई के बाद एक नजारा हर गांव में आम है — खेत में पड़ी पत्तियों और सूखे अवशेषों के ढेर को आग के हवाले कर देना। एक माचिस की तीली से मिनटों में खेत साफ दिखने लगता है, लेकिन इस “साफ” दिखने वाले खेत की मिट्टी के साथ क्या होता है, यह बहुत कम किसान सोचते हैं। कृषि वैज्ञानिकों की मानें तो गन्ने की यही पत्तियां, जिन्हें किसान कचरा समझकर जला देते हैं, असल में खेत की सबसे सस्ती और सबसे असरदार खाद हैं।
एक एकड़ गन्ने की फसल से कटाई के बाद कई क्विंटल पत्तियां और सूखा अवशेष निकलता है, जिसमें वही पोषक तत्व होते हैं जो फसल ने पूरे साल मिट्टी से लिए थे। आग लगाने पर ये तत्व धुएं के साथ चले जाते हैं और खेत में सिर्फ राख बचती है — राख में कुछ पोटाश जरूर होता है, लेकिन मिट्टी को जीवंत रखने वाला जैविक पदार्थ पूरी तरह नष्ट हो जाता है।
पत्तियां जलाने से खेत को क्या-क्या नुकसान होता है
पहला और सबसे बड़ा नुकसान मिट्टी के जैविक कार्बन का है। गन्ने की पत्तियों में भारी मात्रा में सेल्युलोज और कार्बनिक पदार्थ होता है, जो सड़कर मिट्टी को नरम और भुरभुरा बनाता है। जलाने से यह पूरी प्रक्रिया ही खत्म हो जाती है। नतीजा यह होता है कि खेत की मिट्टी साल-दर-साल सख्त होती जाती है, पानी सोखने की क्षमता घटती है और जुताई में ज्यादा ताकत और डीजल लगता है।
दूसरा नुकसान मिट्टी के सूक्ष्म जीवों का है। खेत की ऊपरी सतह पर रहने वाले केंचुए और लाभकारी बैक्टीरिया फसल अवशेषों को ही खाकर मिट्टी को उपजाऊ बनाते हैं। आग की तेज गर्मी से ये जीव नष्ट हो जाते हैं, और एक बार जीवाणु-तंत्र बिगड़ने पर उसे वापस पटरी पर लाने में कई सीजन लग जाते हैं।
तीसरा नुकसान सीधा जेब पर पड़ता है। जो पोषक तत्व पत्तियों के साथ जल जाते हैं, उनकी भरपाई के लिए किसान को बाजार से महंगी रासायनिक खाद खरीदनी पड़ती है। यानी किसान एक तरफ मुफ्त की खाद जला रहा है और दूसरी तरफ उसी की कमी पूरी करने के लिए पैसे खर्च कर रहा है।
ट्रैश मल्चिंग क्या है और वैज्ञानिक क्यों इसकी सिफारिश करते हैं
ट्रैश मल्चिंग का मतलब है कटाई के बाद गन्ने की पत्तियों को खेत में ही बिछा देना, ताकि वे धीरे-धीरे सड़कर मिट्टी में मिल जाएं। भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान (IISR), लखनऊ समेत कृषि वैज्ञानिक लंबे समय से इस विधि की सिफारिश करते आ रहे हैं — गन्ना मिट्टी से भारी मात्रा में पोषक तत्व लेता है, इसलिए उन्हीं तत्वों को खेत में वापस लौटाना सबसे तार्किक कदम है।
पत्तियों की परत खेत में बिछी रहने से मिट्टी की नमी लंबे समय तक बनी रहती है, क्योंकि यह धूप को सीधे मिट्टी पर पड़ने से रोकती है और पानी का वाष्पीकरण कम होता है। खरपतवारों को भी धूप नहीं मिल पाती, इसलिए उनकी बढ़वार अपने आप दब जाती है। पेड़ी (रैटून) फसल वाले खेतों में तो ट्रैश मल्चिंग और भी फायदेमंद मानी जाती है, क्योंकि पेड़ी की नई कोंपलों को नमी और ठंडक दोनों मिलती है।
तरीका 1: खेत में ही ट्रैश मल्चिंग करना
यह सबसे आसान और सबसे सस्ता तरीका है। कटाई के बाद पत्तियों को इकट्ठा करके जलाने की बजाय उन्हें खेत में ही समान रूप से फैला दें, कतारों के बीच बिछाना सबसे अच्छा रहता है। अगर परत बहुत मोटी है तो पत्तियों को थोड़ा काटकर या कुचलकर बिछाएं, इससे वे जल्दी सड़ेंगी।
मल्चिंग के बाद पहली सिंचाई सामान्य से थोड़ी पहले कर दें, क्योंकि नमी मिलने पर सड़न की प्रक्रिया तेज होती है। जिन खेतों में पेड़ी फसल लेनी है, वहां तो यह विधि लगभग अनिवार्य जैसी मानी जाती है। ध्यान रखें कि पत्तियों की परत इतनी मोटी न हो कि नई कोंपलों को निकलने में रुकावट हो — दो से तीन इंच की समान परत पर्याप्त मानी जाती है।
तरीका 2: गड्ढे में कम्पोस्ट खाद बनाना
जिन किसानों के पास खेत के किनारे थोड़ी खाली जगह है, वे पत्तियों से बढ़िया कम्पोस्ट खाद बना सकते हैं। तीन से चार फीट गहरा गड्ढा खोदें और उसमें पत्तियों की परत बिछाएं, हर परत पर थोड़ी गोबर की खाद या मिट्टी डालते जाएं और हल्का पानी छिड़कते रहें। गड्ढे को ऊपर से मिट्टी या पॉलिथीन से ढक दें ताकि नमी बनी रहे।
दो से तीन महीने में यह मिश्रण सड़कर काली, भुरभुरी खाद में बदल जाता है। इस खाद में रासायनिक खादों जैसा तेज असर तो नहीं होता, लेकिन यह मिट्टी की संरचना सुधारने में बेजोड़ है। इसे अगली बुवाई के समय खेत में डालने से जड़ों का विकास अच्छा होता है और पानी की बचत भी होती है। एक बार गड्ढा बन जाने के बाद हर सीजन में इसी प्रक्रिया को दोहराया जा सकता है।
तरीका 3: प्रेसमड और खोई के साथ मिलाकर इस्तेमाल
चीनी मिलों से निकलने वाला प्रेसमड (फिल्टर केक) भी किसानों के लिए मुफ्त या सस्ते में मिलने वाला बढ़िया जैविक स्रोत है। पत्तियों के साथ प्रेसमड मिलाकर डालने से सड़न तेज होती है और खाद का पोषक मान बढ़ जाता है।
इसी तरह गन्ने की खोई (बगास) का भी खेत में इस्तेमाल किया जा सकता है, हालांकि खोई का बड़ा हिस्सा मिलों में ईंधन के रूप में चला जाता है। जो किसान गुड़-खांडसारी इकाइयों के नजदीक हैं, उन्हें खोई आसानी से मिल सकती है।
इन सावधानियों को न भूलें
ट्रैश मल्चिंग के फायदे तभी मिलते हैं जब कुछ सावधानियां बरती जाएं। सूखी पत्तियों में दीमक पनप सकती है, इसलिए मल्चिंग से पहले खेत का निरीक्षण कर लें और जरूरत हो तो कृषि अधिकारी की सलाह से उपचार करें। सूखी पत्तियों की परत में आग जल्दी फैलती है, इसलिए खेत के आसपास बीड़ी-सिगरेट या चूल्हे की आग से बचाव रखें।
लंबे समय में क्या फायदा मिलेगा
जो किसान लगातार तीन-चार सीजन तक पत्तियां जलाने की बजाय खेत में लौटाते हैं, उनके खेत की मिट्टी में साफ बदलाव दिखता है — मिट्टी नरम रहती है, जुताई आसान होती है और सिंचाई का पानी ज्यादा देर टिका रहता है। रासायनिक खाद की जरूरत धीरे-धीरे घटती है, और यह खाद पूरी तरह मुफ्त है — न खरीदनी है, न ढोकर लानी है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सवाल: क्या गन्ने की पत्तियां जलाना कानूनी अपराध है? जवाब: दिल्ली-एनसीआर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में फसल अवशेष जलाने पर प्रतिबंध है और उल्लंघन पर जुर्माने का प्रावधान है। अपने जिले के कृषि विभाग से ताजा नियम जरूर जान लें।
सवाल: ट्रैश मल्चिंग से पेड़ी फसल को कोई नुकसान तो नहीं होगा? जवाब: नहीं, पेड़ी फसल में यह विशेष रूप से फायदेमंद मानी जाती है। पत्तियों की परत नमी बनाए रखती है और नई कोंपलों को ठंडक देती है। बस परत ज्यादा मोटी न रखें ताकि कोंपलें आसानी से निकल सकें।
सवाल: पत्तियां सड़ने में कितना समय लेती हैं? जवाब: नमी मिलने पर पत्तियां आमतौर पर दो से तीन महीने में अच्छी तरह सड़ जाती हैं। सिंचाई के साथ सड़न तेज होती है, इसलिए मल्चिंग के बाद समय पर पानी देना जरूरी है।
सवाल: क्या रोग लगी फसल की पत्तियां भी खेत में बिछा सकते हैं? जवाब: नहीं। लाल सड़न या उकठा जैसे रोगों से ग्रस्त फसल की पत्तियों को खेत में न बिछाएं, बल्कि अलग करके नष्ट कर दें। रोग अगले सीजन में फैल सकता है।
सवाल: प्रेसमड कहां से मिलेगा? जवाब: नजदीकी चीनी मिल से संपर्क करें। कई मिलें प्रेसमड किसानों को खेतों में डालने के लिए उपलब्ध कराती हैं। मिल के गन्ना विभाग या कृषि अधिकारी से जानकारी लें।
स्रोत: भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान (IISR), लखनऊ के प्रचार साहित्य और कृषि विज्ञान केंद्रों के फसल अवशेष प्रबंधन संबंधी परामर्श; उत्तर प्रदेश गन्ना विकास विभाग के किसान उपयोगी प्रकाशन।
अपनी समस्या या सवाल दर्ज करें
गन्ना पर्ची, सट्टा संशोधन, सर्वे, ई-गन्ना ऐप या भुगतान में कोई भी दिक्कत हो, नीचे अपनी जानकारी भरें। हमारी टीम समाधान में आपकी पूरी मदद करेगी।
यह आर्टिकल कैसा लगा?


