3 साल बाद फिर चलेगी कप्तानगंज चीनी मिल: ₹25–30 करोड़ निवेश से 2027–28 पेराई का लक्ष्य — मशीनरी निरीक्षण पूरा, 10 हजार किसानों की आस बंधी

कुशीनगर के कप्तानगंज कस्बे में पिछले तीन साल से बंद पड़ी कनोडिया चीनी मिल की चिमनियों से फिर धुआं उठने की उम्मीद बंधी है। मिल प्रबंधन ने गुरुवार को परिसर का निर्णायक निरीक्षण किया और पेराई सत्र 2027–28 से मिल को दोबारा चलाने का लक्ष्य रखा है। मशीनरी मरम्मत पर ₹25–30 करोड़ पूंजी का प्रारंभिक आंकलन किया जा रहा है। अगर योजना पटरी पर रही तो पूर्वी उत्तर प्रदेश के हजारों गन्ना किसानों के लिए यह बीते तीन साल की सबसे बड़ी राहत होगी।
गुरुवार को हुआ निर्णायक निरीक्षण
लाइव हिंदुस्तान की रिपोर्ट के मुताबिक, गुरुवार को मिल के उपाध्यक्ष एसके श्रीवास्तव ने तकनीकी टीम के साथ मिल परिसर का निरीक्षण किया। निरीक्षण दल में तकनीकी उप महाप्रबंधक शिव गोविंद श्रीवास्तव, उप प्रबंधक प्रशासन विनोद श्रीवास्तव, कार्यकारी प्रबंधक शिशुपाल सांखला, अनुराग पांडेय और रमेश सिंह भी मौजूद रहे। टीम ने मशीनरी और अन्य व्यवस्थाओं का जायजा लिया और मिल प्रबंधन का कहना है कि सब कुछ ठीक रहा तो 2027–28 के पेराई सत्र से मिल दोबारा संचालित होगी।
एसके श्रीवास्तव 1992 से इस मिल में विभिन्न पदों पर कार्य कर चुके हैं। उन्होंने कहा कि कनोडिया समूह की कप्तानगंज इकाई समूह की सबसे पुरानी इकाइयों में से एक है, और समूह की इससे विशेष निष्ठा जुड़ी है। इसी वजह से मिल को हर हाल में दोबारा चलाने की कोशिश की जा रही है। पहले चरण में पुरानी मशीनरी की मरम्मत और बदलने योग्य उपकरणों का खर्च आंकलित किया जा रहा है; अनुमान के मुताबिक ₹25–30 करोड़ की पूंजी की व्यवस्था मिल प्रबंधन विभिन्न स्रोतों से करेगा।
तीन साल की बंदी: बकाये, सील और नीलामी की कहानी
कप्तानगंज मिल का दर्द नया नहीं है। यह मिल पेराई सत्र 2022–23 से बंद है और इसके साथ किसानों के बकाया भुगतान का लंबा विवाद जुड़ा हुआ है। चीनीमंडी की रिपोर्ट के मुताबिक, पेराई सत्र 2021–22 में मिल पर ₹44 करोड़ का बकाया था, जो ब्याज समेत बढ़कर ₹77 करोड़ तक पहुंच गया था। वसूली प्रमाणपत्र (आरसी) जारी होने के बाद ही मिल प्रबंधन ने यह राशि चुकाई, जिससे किसानों को बड़ी राहत मिली। सांसद विजय दुबे, विधायक विनय प्रकाश गोड और यूपी गौ सेवा आयोग के उपाध्यक्ष अतुल सिंह ने यह मुद्दा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने उठाया था, जिसके बाद मिल मालिक ने पूरा भुगतान किया।
गन्ना विभाग ने बकाया भुगतान में विफल रहने पर मिल को सील किया था — तहसीलदार ने पुलिस बल के साथ पहुंचकर मुख्य द्वार समेत सभी छह गेटों पर ताला जड़ा था। किसानों का ₹77 करोड़ बकाया दिलाने के लिए तहसील प्रशासन ने मिल की बसहिया उर्फ कप्तानगंज और दुबौली में स्थित तीन जमीनों की नीलामी का फैसला भी लिया था। बकाये को लेकर पूर्व मंत्री राधेश्याम सिंह जब किसानों के साथ कप्तानगंज तहसील पर धरना देने पहुंचे तो पुलिस ने उन्हें हिरासत में भी ले लिया था, जिसकी खबर ज़ी न्यूज़ ने प्रमुखता से दिखाई थी।
उपाध्यक्ष का दावा: बंदी के बावजूद भुगतान पूरा, 2002–03 का ₹6 करोड़ बकाया
उपाध्यक्ष एसके श्रीवास्तव ने किसानों के पुराने संबंधों का जिक्र करते हुए कहा कि जब भी मिल संकट में रही, किसानों ने सहयोग किया। उनका दावा है कि बंदी के बावजूद मिल ने किसानों का संपूर्ण भुगतान कर दिया है, लेकिन वर्ष 2002–03 के पेराई सत्र का करीब ₹6 करोड़ अभी बकाया है — जिसका भुगतान मिल के दोबारा संचालन के साथ करने की व्यवस्था बनाई जाएगी।
किसानों के लिए यह दावा महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी बकाये को लेकर वर्षों तक आंदोलन, धरने और आरसी की कार्रवाई होती रही है। जिला प्रशासन भी पहले इस मिल को चलवाना अपनी प्राथमिकता बता चुका है — तत्कालीन डीएम उमेश मिश्रा ने किसान दिवस की बैठक में आश्वासन दिया था कि मिल चलवाना प्रशासन की प्राथमिकता है और किसानों का कोई नुकसान नहीं होने दिया जाएगा।
10 हजार किसानों और 1000 से ज्यादा मजदूरों की जिंदगी से जुड़ा सवाल
मिल बंद होने का असर सिर्फ बकाये तक सीमित नहीं रहा। लाइव हिंदुस्तान की पहले की रिपोर्ट के मुताबिक, इस मिल से इलाके के 10 हजार से अधिक गन्ना किसान जुड़े थे और मिल में काम करने वाले मजदूरों की संख्या 1000 से अधिक थी। तीन साल से मिल का पहिया रुकने के कारण गन्ना किसानों, मजदूरों और कस्बे के व्यापारियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
डिस्टिलरी के बंद होने के बाद चीनी मिल का संचालन भी ठप हो गया, जिससे कप्तानगंज की “औद्योगिक कस्बे” के रूप में पहचान प्रभावित हुई। कस्बे के चौक-चौराहों की रौनक खत्म हो गई और मिल से जुड़े कारीगरों व मजदूरों की हालत बिगड़ गई। उपाध्यक्ष का कहना है कि मिल चलने से क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियां फिर बढ़ेंगी।
पूर्वी यूपी के किसानों के लिए इसका क्या मतलब है
कुशीनगर के गन्ना किसान पिछले तीन पेराई सत्रों से अपना गन्ना दूसरे इलाकों की मिलों तक पहुंचाने को मजबूर हैं, जिससे ढुलाई का खर्च और समय दोनों बढ़ता है। कप्तानगंज मिल दोबारा चलने पर किसानों को नजदीकी खरीद केंद्र मिलेगा, पर्ची की व्यवस्था आसान होगी और पेमेंट भी स्थानीय स्तर पर तेज होने की उम्मीद रहेगी।
यूपी की बाकी मिलों में पेराई सत्र 2026–27 की तैयारियां चल रही हैं, लेकिन प्रशासनिक और तकनीकी काम को देखते हुए कप्तानगंज प्रबंधन ने 2027–28 का लक्ष्य रखा है — यानी किसानों को एक और पेराई सत्र दूर की मिलों में गन्ना देना पड़ सकता है, इसके बाद स्थिति सामान्य होने की संभावना है। किसान अपने सर्वे, सट्टे और बैंक खाते की जानकारी caneup.in पोर्टल और ई-गन्ना ऐप पर पहले से अपडेट रखें, ताकि मिल चलने पर पर्ची और भुगतान में देरी न हो।
पहले भी ऐसी मिलें दोबारा चलने की राह पर
कप्तानगंज अकेला मामला नहीं है। बरेली की ओसवाल चीनी मिल को भी ₹70 करोड़ के बकाया भुगतान पर प्रशासन ने सील किया है और उसकी 22 अक्टूबर को नीलामी तय है — उस घटनाक्रम की पूरी जानकारी हमने पहले प्रकाशित की थी। ऐसे में कप्तानगंज का दोबारा चलने की दिशा में बढ़ना पूर्वी यूपी के गन्ना बेल्ट के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।
पूछे जाने वाले प्रश्न
कप्तानगंज चीनी मिल कब से दोबारा चलेगी? प्रबंधन के मुताबिक, सब कुछ ठीक रहा तो पेराई सत्र 2027–28 से मिल दोबारा चलेगी। मशीनरी मरम्मत का खर्च आंकलित किया जा रहा है।
मिल को दोबारा चलाने में कितनी पूंजी लगेगी? प्रारंभिक अनुमान के मुताबिक करीब ₹25–30 करोड़ की पूंजी की जरूरत होगी। इस राशि की व्यवस्था मिल प्रबंधन विभिन्न स्रोतों से करेगा।
किसानों का पुराना बकाया कब मिलेगा? उपाध्यक्ष एसके श्रीवास्तव का दावा है कि बंदी के बावजूद किसानों का संपूर्ण भुगतान कर दिया गया है। हालांकि वर्ष 2002–03 के पेराई सत्र का करीब ₹6 करोड़ बकाया है, जिसका भुगतान मिल के दोबारा संचालन के साथ करने की व्यवस्था बनाई जाएगी।
कप्तानगंज मिल कितने समय से बंद है? मिल पेराई सत्र 2022–23 से बंद है। 2021–22 सत्र का ₹77 करोड़ बकाया वसूली प्रमाणपत्र जारी होने के बाद चुकाया गया था।
इससे किसानों को क्या फायदा होगा? मिल चलने पर करीब 10 हजार किसानों को नजदीकी खरीद केंद्र मिलेगा, ढुलाई खर्च घटेगा और स्थानीय स्तर पर रोजगार व आर्थिक गतिविधियां फिर शुरू होंगी।
स्रोत: लाइव हिंदुस्तान, चीनीमंडी, ज़ी न्यूज़।
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