कर्नाटक में हाईवे जाम खत्म, अब 125 किमी पैदल मार्च: केंद्रीय मंत्री के घर घेराव करेंगे किसान, ₹60/किलो चीनी दर की मांग

कर्नाटक के गन्ना किसानों का आंदोलन अब एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। पुणे-बेंगलुरु नेशनल हाईवे पर दो दिन तक चला रास्ता रोको आंदोलन बुधवार रात खत्म कर दिया गया, लेकिन किसान घर नहीं लौटे — उन्होंने अब केंद्रीय खाद्य मंत्री प्रल्हाद जोशी के गृह नगर हुबली तक 125 किलोमीटर की पैदल यात्रा शुरू कर दी है। गुरुवार को यह मार्च दूसरे दिन भी जारी रहा और हजारों किसान जोशी के आवास के घेराव की ओर बढ़ रहे हैं।
दो दिन का हाईवे जाम, फिर नया ऐलान
मंगलवार से कर्नाटक राज्य रैयत संघ, हसीरु सेना और स्वाभिमानी शेतकारी संगठन के बैनर तले किसानों ने बेलगावी जिले के तीन प्रमुख स्थानों — निप्पानी तालुक के कोगनोली चेकपोस्ट, हुक्केरी तालुक के हट्टरगी टोल प्लाजा और बेलगावी तालुक के हिरेबागेवाड़ी टोल प्लाजा पर हाईवे जाम कर दिया था। 30 घंटे से अधिक समय तक यह जाम जारी रहा, जिससे व्यस्त राष्ट्रीय राजमार्ग पर यातायात पूरी तरह ठप हो गया।
बुधवार रात किसानों ने आम जनता के हित में रास्ता रोको समाप्त करने की घोषणा की। पुलिस ने छह लेन वाले हाईवे का एक हिस्सा खोल दिया और आधी रात तक पूरी सड़क पर यातायात बहाल हो गया। लेकिन इसी के साथ किसान नेताओं चुनप्पा पुजेरी और शशिकांत पडसालगी गुरुजी ने हट्टरगी टोल प्लाजा से हुबली की ओर पैदल कूच शुरू कर दिया।
125 किलोमीटर का सफर, गांव-गांव रुककर संवाद
किसान नेता चुनप्पा पुजेरी के अनुसार यह मार्च तीन-चार दिन में हुबली पहुंचेगा। किसान हाईवे के एक किनारे पैदल चल रहे हैं और रास्ते में काकती, बागेवाड़ी, कित्तूर और धारवाड़ में रुककर स्थानीय किसानों से संवाद करेंगे और उन्हें आंदोलन से जोड़ेंगे।
गुरुवार सुबह किसानों ने बेलगावी तालुक के मुक्तिमठ से मार्च फिर शुरू किया और शाम तक बेलगावी तालुक के हलगा स्थित सुवर्ण विधान सौध के आसपास पहुंचने की उम्मीद थी। शुक्रवार को मार्च चन्नम्मना कित्तूर तालुक के एमके हुबली की ओर बढ़ेगा। किसान नेताओं ने साफ कहा है कि जब तक केंद्रीय सरकार उनकी मांगों पर जवाब नहीं देती, आंदोलन जारी रहेगा।
किसानों की पांच बड़ी मांगें
आंदोलनकारी किसानों की मांगें केवल कर्नाटक तक सीमित नहीं हैं — ये फैसले केंद्र सरकार के स्तर पर होते हैं और पूरे देश के, यानी उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों को भी प्रभावित करते हैं:
- गन्ने का भाव ₹5,500 से ₹6,000 प्रति टन — वर्तमान उचित और लाभकारी मूल्य (एफआरपी) से कहीं अधिक की मांग।
- चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य (MSP) ₹31 से बढ़ाकर ₹60 प्रति किलो — किसानों का तर्क है कि जब चीनी सस्ती बिकती है तो मिलें भुगतान में देरी करती हैं।
- एफआरपी में वृद्धि और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों का क्रियान्वयन।
- सुगर कंट्रोल ऑर्डर का सख्त पालन और किसानों को समय पर भुगतान।
- मिलों में राज्य की निगरानी में कटाई, तौलाई और रिकवरी आकलन, साथ ही मिलों को उप-उत्पादों (बायप्रोडक्ट) की बिक्री से होने वाले मुनाफे में किसानों की हिस्सेदारी।
इसके अलावा किसान घरेलू खपत और औद्योगिक उपयोग के लिए चीनी की अलग-अलग कीमत की मांग भी कर रहे हैं।
जोशी की बैठक और रमेश चंद कमेटी
आंदोलन के बीच 12 अक्टूबर को केंद्रीय खाद्य मंत्री प्रल्हाद जोशी और कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने किसान संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ दिल्ली में बैठक की थी। इस बैठक में नीति आयोग के पूर्व सदस्य रमेश चंद की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय समिति गठित करने का निर्णय लिया गया, जो गन्ना किसानों को लाभकारी मूल्य, चीनी के एक्स-मिल न्यूनतम बिक्री मूल्य, रिकवरी दर, तौलाई, यंत्रीकृत कटाई और किसानों पर वित्तीय प्रभाव जैसे मुद्दों की जांच करेगी।
लेकिन किसानों ने इस समिति को खारिज कर दिया है। उनका कहना है कि समिति के गठन की अधिसूचना तो जारी हो गई है, लेकिन रिपोर्ट सौंपने या सिफारिशों को लागू करने की कोई समय-सीमा तय नहीं की गई है। चुनप्पा पुजेरी ने कहा कि गन्ना सूख रहा है और किसान सूखे की मार झेल रहे हैं — उनके पास समिति की रिपोर्ट का अनिश्चितकाल तक इंतजार करने का समय नहीं है। किसानों ने चेतावनी दी है कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो वे मिलों को ₹60 प्रति किलो से कम पर चीनी बेचने नहीं देंगे।
सरकार का रुख: आश्वासन, लेकिन फैसला बाकी
बेलगावी के जिलाधिकारी मोहम्मद रोशन ने किसानों से बातचीत की और आश्वासन दिया कि उनकी मांगें केंद्रीय सरकार तक पहुंचाई जाएंगी और राज्य प्रशासन उनके मुद्दों के समाधान के लिए कदम उठाएगा। जिलाधिकारी ने किसानों की मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार से फोन पर बातचीत भी कराई। मुख्यमंत्री ने आश्वासन दिया कि राज्य सरकार किसानों के साथ है और उनके हितों की रक्षा के लिए कदम उठाएगी।
किसानों ने इन आश्वासनों का स्वागत तो किया, लेकिन आंदोलन जारी रखने का फैसला किया है। उनका कहना है कि आश्वासन पहले भी मिले हैं, अब उन्हें ठोस फैसला चाहिए।
यूपी के किसानों के लिए यह खबर क्यों अहम है
उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा गन्ना उत्पादक राज्य है और यहां 122 चीनी मिलें चलती हैं। चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य और गन्ने का एफआरपी दोनों केंद्र सरकार तय करती है — यानी कर्नाटक के किसानों के दबाव से जो भी फैसला होगा, उसका सीधा असर यूपी के किसानों पर पड़ेगा।
अगर चीनी का MSP ₹60 प्रति किलो होता है तो मिलों की आर्थिक स्थिति सुधरेगी, जिससे यूपी के किसानों का बकाया भुगतान भी समय पर होने की उम्मीद बढ़ेगी। इसी तरह गन्ने के मूल्य में वृद्धि का दबाव यूपी की राज्य परामर्श मूल्य (SAP) की घोषणा पर भी पड़ेगा — 2026-27 सत्र की SAP की घोषणा अभी बाकी है, और यूपी के किसान भी ₹600 प्रति क्विंटल भाव की मांग कर रहे हैं।
पेराई सत्र पर असर की आशंका
इस आंदोलन का असर नए पेराई सत्र 2026-27 पर भी दिख रहा है। कर्नाटक में नियमित पेराई का काम अभी शुरू नहीं हो सका है — राज्य की 28 मिलों में से केवल 8 मिलें विशेष सत्र के गन्ने की पेराई कर रही हैं। महाराष्ट्र में भी 55 में से केवल 15 मिलों ने 8 अक्टूबर से पेराई शुरू की है। विशेषज्ञों का कहना है कि मिलों के बंद रहने से चीनी का उत्पादन पिछड़ रहा है, जिसका असर बाजार की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
कर्नाटक के किसान क्यों आंदोलन कर रहे हैं?
किसान गन्ने का भाव ₹5,500-6,000 प्रति टन करने, चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य ₹31 से बढ़ाकर ₹60 प्रति किलो करने, एफआरपी बढ़ाने और समय पर भुगतान की मांग कर रहे हैं।
125 किमी पैदल मार्च कहां से कहां तक है?
यह मार्च बेलगावी जिले के हट्टरगी टोल प्लाजा से हुबली (केंद्रीय खाद्य मंत्री प्रल्हाद जोशी का गृह नगर) तक है। किसान 3-4 दिन में यह दूरी तय करेंगे।
केंद्र सरकार ने क्या कदम उठाया है?
12 अक्टूबर की बैठक के बाद रमेश चंद की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय समिति गठित की गई है। लेकिन किसानों का कहना है कि समिति की रिपोर्ट की कोई समय-सीमा नहीं है, इसलिए आंदोलन जारी रहेगा।
इसका यूपी के गन्ना किसानों पर क्या असर होगा?
चीनी का MSP और गन्ने का FRP केंद्र सरकार तय करती है, इसलिए कर्नाटक के आंदोलन से जो भी फैसला होगा, वह यूपी के 122 चीनी मिलों और लाखों गन्ना किसानों पर भी लागू होगा।
यूपी में 2026-27 सत्र की SAP कब घोषित होगी?
2026-27 पेराई सत्र के लिए यूपी सरकार की SAP (राज्य परामर्श मूल्य) की घोषणा अभी बाकी है। यूपी के किसान संगठन ₹600 प्रति क्विंटल भाव की मांग कर रहे हैं।
स्रोत: द हिंदू (14 अक्टूबर 2026), चिनीमंडी (15 अक्टूबर 2026), डेक्कन हेराल्ड (15 अक्टूबर 2026)
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