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देशभर के गन्ना किसानों के लिए एक बड़ी कानूनी जीत सामने आई है। कर्नाटक हाई कोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा तय किए गए गन्ने के ₹2,500 प्रति टन न्यूनतम भाव के खिलाफ चीनी मिलों द्वारा दायर अपीलों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि सरकार का यह मूल्य निर्धारण कतई मनमाना (arbitrary) नहीं है और यह किसानों की आजीविका की रक्षा के लिए पूरी तरह वैध है।
कर्नाटक की निजी चीनी मिलों ने सरकार द्वारा तय किए गए ₹2,500 प्रति टन के न्यूनतम गन्ना मूल्य को अदालत में चुनौती दी थी। मिल मालिकों का तर्क था कि बाजार में चीनी और सह-उत्पादों (बाय-प्रोडक्ट्स) की कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण यह भाव देना उनके लिए व्यावहारिक नहीं है। मिलों ने इस आदेश को रद्द करने की माँग की थी।
हाई कोर्ट की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए मिलों की सभी दलीलों को खारिज कर दिया और किसानों के संवैधानिक व कानूनी अधिकारों को प्राथमिकता दी:
| प्रमुख बिंदु | अदालत का फैसला / टिप्पणी |
|---|---|
| मूल्य निर्धारण | ₹2,500/टन का भाव तर्कसंगत, न्यायसंगत और वैधानिक है |
| किसानों के हित | कोर्ट ने कहा—किसानों को लागत से कम भाव पर धकेला नहीं जा सकता |
| मिलों की याचिका | निजी चीनी मिलों की सभी अपीलें एकमुश्त खारिज (Dismissed) |
| प्रमुख स्रोत | द हिंदू (The Hindu), विधिक समाचार रिपोर्ट |
सुनवाई के दौरान अदालत ने कई महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश दिए:
कर्नाटक हाई कोर्ट के इस फैसले का असर केवल दक्षिण भारत तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उत्तर प्रदेश के गन्ना उत्पादकों के लिए भी यह एक मजबूत कानूनी मिसाल है:
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