होम › 260 पहियों पर 1300 किमी चलकर गन्ने से …

260 पहियों पर 1300 किमी चलकर गन्ने से प्लास्टिक बनाने वाली विशाल मशीन लखीमपुर के कुंभी पहुंची, नवंबर से उत्पादन की उम्मीद

Aamir Raza Aamir Raza • Oct 24, 2026 • 6 min read
Google पर हमें फ़ॉलो करें
शेयर करें:
260 पहियों पर 1300 किमी चलकर गन्ने से प्लास्टिक बनाने वाली विशाल मशीन लखीमपुर के कुंभी पहुंची, नवंबर से उत्पादन की उम्मीद
अंतिम अपडेट: October 24, 2026 4:31 PM IST — यह आर्टिकल नियमित रूप से अपडेट किया जाता है।

उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों के लिए इस हफ्ते की सबसे बड़ी औद्योगिक खबर लखीमपुर खीरी जिले से आई है। ओडिशा के पारादीप बंदरगाह से चला 260 पहियों वाला विशाल ट्रेलर करीब 6 महीने और लगभग 1300 किलोमीटर का सफर तय करके गुरुवार देर रात गोला गोकर्णनाथ के कुंभी स्थित बलरामपुर चीनी मिल्स के परिसर में पहुंच गया है। इस ट्रेलर पर लदा साइक्लाइजेशन रिएक्टर देश के पहले एकीकृत गन्ना-से-बायोप्लास्टिक प्लांट का दिल कहा जा रहा है। मशीन के पहुंचते ही स्थापना का काम शुरू हो गया है और कंपनी के अधिकारियों के मुताबिक प्लांट का संचालन नवंबर महीने से शुरू होने की उम्मीद है।

यह खबर सिर्फ एक मशीन के पहुंचने की नहीं है। इसका सीधा जुड़ाव गन्ने की मांग से है। अब तक गन्ने से चीनी और एथेनॉल बनता था, लेकिन कुंभी प्लांट के शुरू होने के बाद उसी गन्ने से बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक भी बनेगा। यानी गन्ने की खपत का एक नया और बड़ा रास्ता खुल रहा है, जो लंबे समय में मिलों की कमाई और किसानों के भुगतान की सुरक्षा दोनों को मजबूत कर सकता है।

6 महीने, 1300 किलोमीटर और 15 करोड़ रुपये का सफर

इस मशीन की यात्रा अपने आप में एक कहानी है। बेल्जियम में बनी यह विशाल मशीन पहले समुद्री रास्ते से ओडिशा के पारादीप बंदरगाह पहुंची और वहां से सड़क मार्ग से उत्तर प्रदेश लाई गई। रास्ते में चार राज्यों और उत्तर प्रदेश के सात जिलों से होकर गुजरना पड़ा। संकरी सड़कें, बिजली के तार और पुलों की ऊंचाई जैसी रुकावटों के कारण ट्रेलर की औसत रफ्तार सिर्फ 10 से 12 किलोमीटर प्रतिदिन रही। पूरी यात्रा में लगभग 15 करोड़ रुपये का खर्च आया और मुंबई की एक परिवहन कंपनी के करीब 35 प्रशिक्षित कर्मियों की टीम हर कदम पर साथ रही।

मशीन का आकार ही इसकी चुनौती को बता देता है। यह करीब 20 फीट ऊंची, लगभग 147 फीट लंबी और 23 फीट चौड़ी है। कुंभी इकाई के मुख्य महाप्रबंधक सुनील कुमार यादव के मुताबिक कंपनी इस मशीन का छह महीने से इंतजार कर रही थी और पहुंचते ही स्थापना का काम शुरू कर दिया गया है।

यह मशीन करती क्या है — गन्ने से प्लास्टिक तक का सफर

साइक्लाइजेशन रिएक्टर इस प्लांट की सबसे अहम इकाई है। सरल भाषा में समझें तो कुंभी में गन्ने से पहले चीनी बनाई जाएगी, फिर उससे लैक्टिक एसिड तैयार होगा और उसी लैक्टिक एसिड से पॉलीलैक्टिक एसिड यानी पीएलए बनेगा। पीएलए एक बायोबेस्ड पॉलिमर है, जिससे पैकेजिंग सामग्री, कप-प्लेट, खाने की ट्रे, दही के कप, डिस्पोजेबल कटलरी, कपड़ा और थ्री-डी प्रिंटिंग जैसी चीजें बनाई जा सकती हैं। कंपनी ने अपने पीएलए ब्रांड को बायोयुग नाम दिया है।

खास बात यह है कि पूरा चक्र एक ही परिसर में होगा — गन्ना कुंभी मिल में पिसेगा, उसी परिसर में चीनी बनेगी और उसी से आगे पीएलए तैयार होगा। कंपनी का दावा है कि यह दुनिया में पहली ऐसी सुविधा होगी जहां गन्ने से लेकर बायोपॉलिमर तक का पूरा उत्पादन एक ही स्थान पर एकीकृत रूप से होगा।

3,080 करोड़ रुपये का प्लांट — कुंभी में क्या-क्या बनेगा

बलरामपुर चीनी मिल्स लिमिटेड ने इस परियोजना में लगभग 3,080 करोड़ रुपये के निवेश की घोषणा की है, जो करीब ढाई साल में चरणों में लगाया जाएगा। प्लांट की सालाना क्षमता 80,000 टन पीएलए की प्रस्तावित है। इस परियोजना का शिलान्यास 22 फरवरी 2025 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने किया था।

पीएलए से पैकेजिंग और फूड सर्विस के सामान के अलावा टेक्सटाइल फाइबर और चुनिंदा औद्योगिक उपयोग भी संभव हैं। रिपोर्टों के मुताबिक इन उत्पादों के तीन से छह महीने में प्राकृतिक रूप से गल जाने की बात कही गई है, जो इन्हें परंपरागत पेट्रोलियम-आधारित प्लास्टिक से अलग बनाता है।

लखीमपुर के किसानों को क्या फायदा हो सकता है

सीधा फायदा मांग के नए स्रोत से जुड़ा है। जब गन्ने का इस्तेमाल चीनी के अलावा बायोप्लास्टिक के लिए भी होगा, तो मिल के पास आमदनी का एक और जरिया होगा। मिल की आर्थिक सेहत अच्छी होगी तो भुगतान में देरी का जोखिम कम होगा। यह बात खासकर इसलिए अहम है क्योंकि पेराई सत्र 2026-27 शुरू होने जा रहा है और किसान संगठनों की सबसे बड़ी शिकायत भुगतान में देरी की रही है। दूसरा फायदा स्थानीय रोजगार और सहायक कारोबार की गतिविधियां बढ़ने की उम्मीद से जुड़ा है।

पेराई सत्र 2026-27 और गन्ना मूल्य का सवाल

पेराई सत्र 2025-26 के लिए एसएपी अगेती गन्ने पर 400 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया था और 2026-27 के एसएपी की घोषणा अभी बाकी है। इसी बीच राकेश टिकैत 23 अक्टूबर की लखनऊ महापंचायत में 600 रुपये प्रति क्विंटल से ज्यादा भाव की मांग कर चुके हैं और रालोद प्रदेश अध्यक्ष राजपाल सिंह बलियान भी मुख्यमंत्री को ज्ञापन दे चुके हैं।

उत्तर प्रदेश में कुल 122 चीनी मिलें हैं और पश्चिमी यूपी की कई मिलों में अक्टूबर के तीसरे-चौथे हफ्ते से पेराई शुरू होने की संभावना है। ऐसे में कुंभी प्लांट की खबर पेराई सत्र की शुरुआत के ठीक मौके पर आई है।

किसान अब क्या करें

पेराई सत्र सिर पर है, इसलिए किसानों को अपनी तैयारी पूरी रखनी चाहिए। अपने गन्ने के सर्वे रिकॉर्ड, रकबा और किस्म की जानकारी जांच लें। बैंक खाता सक्रिय और आधार से जुड़ा हुआ होना चाहिए, ताकि भुगतान में रुकावट न आए। पर्ची और तौल से जुड़े कागजात संभालकर रखें और कटाई का कार्यक्रम मिल के सट्टा विभाग से पहले ही पक्का कर लें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सवाल: कुंभी पहुंची विशाल मशीन क्या है और यह कहां से आई? जवाब: यह एक साइक्लाइजेशन रिएक्टर है, जो गन्ने से बायोप्लास्टिक बनाने वाले प्लांट की मुख्य इकाई है। यह बेल्जियम में बनी मशीन ओडिशा के पारादीप बंदरगाह से 260 पहियों वाले ट्रेलर पर लगभग 1300 किलोमीटर का सफर तय करके लखीमपुर खीरी के कुंभी पहुंची है।

सवाल: कुंभी प्लांट में गन्ने से क्या-क्या बनेगा? जवाब: गन्ने से पहले चीनी, फिर लैक्टिक एसिड और अंत में पीएलए यानी पॉलीलैक्टिक एसिड बनेगा। इससे पैकेजिंग सामग्री, कप-प्लेट, खाने की ट्रे, दही के कप, कटलरी, कपड़ा और थ्री-डी प्रिंटिंग उत्पाद बनाए जा सकेंगे।

सवाल: प्लांट का उत्पादन कब शुरू होगा और इसकी क्षमता कितनी है? जवाब: कंपनी अधिकारियों के मुताबिक स्थापना का काम शुरू हो गया है और नवंबर 2026 से संचालन की उम्मीद जताई गई है। प्लांट की प्रस्तावित सालाना क्षमता 80,000 टन पीएलए की है और कुल निवेश लगभग 3,080 करोड़ रुपये बताया गया है।

सवाल: क्या इस प्लांट के शुरू होने से गन्ना किसानों को तुरंत ज्यादा भाव मिलेगा? जवाब: नहीं, गन्ना मूल्य सरकार के एसएपी से तय होता है, प्लांट की कमाई से सीधे नहीं। पेराई सत्र 2025-26 के लिए एसएपी अगेती गन्ने पर 400 रुपये प्रति क्विंटल था और 2026-27 के एसएपी की घोषणा अभी बाकी है। प्लांट से मिलने वाला फायदा मांग बढ़ने और मिल की आर्थिक सेहत सुधरने के रूप में लंबे समय में दिखेगा।

सवाल: यह प्लांट पर्यावरण के लिए कैसे अलग है? जवाब: प्लांट में जीरो लिक्विड डिस्चार्ज प्रणाली की बात कही गई है, यानी तरल कचरा बाहर नहीं छोड़ा जाएगा। पीएलए से बने उत्पादों के प्राकृतिक रूप से गल जाने का दावा भी किया गया है।

स्रोत: द इंडियन एक्सप्रेस (24 अक्टूबर 2026), जीके टुडे (अगस्त 2026), पॉलिएस्टर टाइम (अगस्त 2026), ग्लीफ (बायोयुग लॉन्च रिपोर्ट)।

🌾 CaneUp किसान सहायता पोर्टल

अपनी समस्या या सवाल दर्ज करें

गन्ना पर्ची, सट्टा संशोधन, सर्वे, ई-गन्ना ऐप या भुगतान में कोई भी दिक्कत हो, नीचे अपनी जानकारी भरें। हमारी टीम समाधान में आपकी पूरी मदद करेगी।

1 जिला व मिल चुनें
2 गांव व नाम डालें
3 समस्या लिखकर भेजें
उत्तर प्रदेश का अपना जनपद चुनें
आपके जिले से संबंधित चीनी मिलें
इस नंबर पर आपको पर्ची और भुगतान के व्हाट्सएप अपडेट्स मिलेंगे
जितना स्पष्ट लिखेंगे, उतनी जल्दी सटीक समाधान मिलेगा

🔒 आपकी निजी जानकारी 100% सुरक्षित है। हम कोई स्पैम नहीं भेजते। केवल आपकी मिल से जुड़े आधिकारिक अपडेट्स शेयर किए जाते हैं।

✓
Aamir Raza
लेखक एवं मुख्य संपादक

Aamir Raza

संस्थापक एवं प्रधान संपादक — CaneUp.xyz। उत्तर प्रदेश गन्ना उद्योग, पर्ची कैलेंडर, SAP/MSP मूल्य नीति, ई-गन्ना पोर्टल और किसान अधिकारों पर 10+ वर्षों का जमीनी अनुभव।

यह आर्टिकल कैसा लगा?

📬 गन्ना अपडेट पाएं

MSP रेट, पर्ची कैलेंडर, सरकारी योजनाएं — सीधे आपके इनबॉक्स में