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लाल सड़न ने यूपी की चीनी 126.4 से घटाकर 89.5 लाख टन की: अक्टूबर में नई किस्म को-20016 (करण-20) को मंजूरी का रास्ता साफ

Aamir Raza Aamir Raza • Oct 2, 2026 • 6 min read
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लाल सड़न ने यूपी की चीनी 126.4 से घटाकर 89.5 लाख टन की: अक्टूबर में नई किस्म को-20016 (करण-20) को मंजूरी का रास्ता साफ
अंतिम अपडेट: October 2, 2026 10:52 AM IST — यह आर्टिकल नियमित रूप से अपडेट किया जाता है।

लाल सड़न ने पश्चिमी यूपी के गन्ना खेतों में जो बर्बादी मचाई, वह अब सरकारी आंकड़ों में भी साफ दिख रही है — यूपी का चीनी उत्पादन 2019-20 के 126.4 लाख टन से घटकर 2025-26 में 89.5 लाख टन रह गया।

इसी बीच वैज्ञानिकों की तरफ से किसानों के लिए बड़ी उम्मीद की खबर आई है। कोयंबटूर के भारतीय गन्ना प्रजनन संस्थान (आईसीएआर-एसबीआई) द्वारा विकसित नई किस्म को-20016 (करण-20) को लाल सड़न से बर्बाद हो चुकी को-0238 (करण-4) का संभावित विकल्प चुना गया है। एआईसीआरपी की वेरायटल आईडेंटिफिकेशन कमेटी ने 27 मई को हुई बैठक में इस किस्म को चुना, और अब इसे अक्टूबर में केंद्रीय वेरायटल रिलीज कमेटी के सामने रखा जाना है। अगर सब कुछ तय कार्यक्रम पर रहा तो किसान 2027 की बसंत, ग्रीष्म या शरदकालीन बुआई में यह किस्म लगा पाएंगे।

परीक्षणों के आंकड़े उम्मीद दिलाते हैं — आईएसएमए के तीन साल के परीक्षणों में करण-20 ने 144.6 टन प्रति हेक्टेयर उपज दी, जबकि को-0238 की 116.4 टन रही। सुक्रोज भी करण-20 में 18.7 प्रतिशत बनाम 18.3 प्रतिशत रहा। लेकिन वैज्ञानिक खुद कहते हैं कि असली परीक्षा अभी बाकी है — वह परीक्षा किसानों के खेतों में होगी।

यूपी के चीनी उत्पादन में 37 लाख टन की गिरावट — आंकड़े क्या कहते हैं

The Indian Express और ThePrint — दोनों ने सरकारी आंकड़ों के हवाले से बताया है कि 2019-20 में यूपी ने 126.4 लाख टन चीनी का उत्पादन किया था, जो 2025-26 में घटकर 89.5 लाख टन रह गया। यानी करीब 37 लाख टन की कमी — और पेराई हुई गन्ने की मात्रा भी छह साल में पांचवें हिस्से से ज्यादा घट गई है।

2019-20 वह दौर था जब यूपी ने 1,118 लाख टन गन्ना पेरा था और रिकवरी 11.7 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गई थी — उसी दौर में यूपी ने महाराष्ट्र को पीछे छोड़कर 2016-17 से 2020-21 तक लगातार देश में चीनी उत्पादन में पहला स्थान बनाए रखा था। अब पेराई सत्र 2026-27 की शुरुआत (1 अक्टूबर 2026) के साथ उद्योग और किसान दोनों की नजरें इसी सवाल पर हैं कि गन्ने का उत्पादन वापस पटरी पर कैसे आएगा।

एक ही किस्म की बुआई कैसे बनी सबसे बड़ी गलती

इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह है एक ही गन्ना किस्म पर अत्यधिक निर्भरता। को-0238, जिसे किसान ‘करण-4’ या ‘दो-सौ-अड़तीस’ के नाम से जानते हैं, 2009 में डॉ. बक्शी राम (आईसीएआर-एसबीआई के तत्कालीन निदेशक) ने विकसित की थी। 2020-21 तक यूपी के 86.7 प्रतिशत गन्ना क्षेत्र में यही एक किस्म बोई जा रही थी।

लगातार एक ही किस्म की बुआई ने लाल सड़न फैलाने वाले कवक (कोलेटोट्राइकम फालकैटम) को नया, ज्यादा घातक रूप ‘सीएफ13’ विकसित करने का मौका दे दिया — और को-0238 की रोग प्रतिरोधक क्षमता टूट गई। डॉ. बक्शी राम ने दोनों मीडिया संस्थानों से बातचीत में बताया कि उन्होंने पहले ही चेतावनी दी थी कि कोई एक किस्म 40-50 प्रतिशत से ज्यादा क्षेत्र में न बोई जाए, खासकर मध्य, पूर्वी और तराई के जलभराव वाले इलाकों में। दुर्भाग्य से न मिलों ने उनकी सुनी, न किसानों ने — क्योंकि दोनों को उस समय को-0238 से फायदा हो रहा था।

लाल सड़न कैसे मारती है गन्ने को

बागपत के कृषि विज्ञान केंद्र के डॉ. शिवम सिंह के मुताबिक यह कवक गन्ने की संवहन प्रणाली पर हमला करता है, जिससे पानी और पोषक तत्वों का प्रवाह रुक जाता है — संक्रमित गन्ना अंदर से खोखला, लाल धब्बों वाला और खट्टे रस वाला हो जाता है। बीज और मिट्टी — दोनों के जरिए फैलने वाली इस बीमारी का रासायनिक दवाओं से प्रबंधन “लगभग असंभव” है, इसलिए वैज्ञानिकों का कहना है कि एकमात्र टिकाऊ समाधान किस्म को बदलना है।

असर सीधे जेब पर है। शामली के किशेर बैरागी गांव के जितेंद्र सिंह हुड्डा ने The Indian Express को बताया कि पहले उनकी उपज 38-39 टन प्रति एकड़ थी, जो अब 22-23 टन रह गई है। बागपत के खूशी राम बताते हैं कि बीमार पौधों की दवाओं पर ही प्रति फसल 4,000 से 8,000 रुपये खर्च हो जाते हैं।

नई किस्म को-20016 (करण-20): परीक्षणों में को-0238 से आगे

उम्मीद की बात है कि वैज्ञानिक खाली हाथ नहीं बैठे। आईसीएआर-एसबीआई, कोयंबटूर द्वारा विकसित को-20016 (करण-20) को एआईसीआरपी की वेरायटल आईडेंटिफिकेशन कमेटी ने 27 मई को को-0238 का संभावित विकल्प चुना है, और आईएसएमए ने अगस्त 2023 से आईसीएआर-एसबीआई के साथ इसके मूल्यांकन परीक्षण चलाए।

उप-उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में तीन साल तक दो पौधा फसलों और एक पेड़ी फसल के जरिए परीक्षण किए गए, जिनमें यूपी की 11 मिलों सहित 16 चीनी मिलों ने हिस्सा लिया। आईएसएमए के महानिदेशक दीपक बल्लानी के मुताबिक नतीजे “बहुत उत्साहजनक” हैं — करण-20 की तीन साल की औसत गन्ना उपज 144.6 टन प्रति हेक्टेयर रही, जबकि को-0238 की 116.4 टन प्रति हेक्टेयर। 10 महीने की फसल अवधि में गन्ने के रस में सुक्रोज की मात्रा करण-20 में 18.7 प्रतिशत रही, जबकि को-0238 में 18.3 प्रतिशत। सबसे अहम बात — यह किस्म लाल सड़न के घातक सीएफ13 रूप के प्रति रोगरोधी पाई गई है।

अक्टूबर की बैठक और किसानों तक पहुंचने का रास्ता

अब सारी नजरें अक्टूबर में होने वाली केंद्रीय वेरायटल रिलीज कमेटी की बैठक पर हैं। मंजूरी के बाद किसान इसे 2027 की बसंत (फरवरी-मार्च), ग्रीष्म (अप्रैल-मई) या शरदकालीन (सितंबर मध्य से नवंबर मध्य) बुआई में लगा सकेंगे — ThePrint के मुताबिक भी यह किस्म अगले साल किसानों के लिए उपलब्ध हो सकती है।

वैज्ञानिक खुद भी किसानों को हवाई उम्मीद नहीं दे रहे। डॉ. बक्शी राम ने साफ कहा कि किसी भी क्षेत्र में कोई एक किस्म 40-50 प्रतिशत से ज्यादा क्षेत्र में नहीं होनी चाहिए, ताकि बीमारी के प्रति आनुवंशिक प्रतिरोध बना रहे। और आईएसएमए के बल्लानी कहते हैं कि “अंतिम परीक्षा किसानों के खेतों में होगी।” यानी संदेश दोहरा है — को-0238 के एकछत्र राज का दौर खत्म होना चाहिए, लेकिन करण-20 को भी अकेली रामबाण मानकर उसी गलती को न दोहराएं। किस्मों में विविधता ही लाल सड़न से बचाव का सबसे पक्का तरीका है।

गन्ने के भाव की गणित समझने के लिए एफआरपी और एसएपी की पूरी जानकारी वाला लेख पढ़ें — पेराई सत्र 2025-26 का एसएपी ₹400 प्रति क्विंटल (अगेती) था और 2026-27 के एसएपी की घोषणा अभी बाकी है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

यूपी में चीनी उत्पादन कितना घटा है? 2019-20 के 126.4 लाख टन से घटकर 2025-26 में 89.5 लाख टन — छह साल में करीब 37 लाख टन की गिरावट।

को-0238 (करण-4) किस्म को क्या हुआ? एक ही किस्म की लगातार बुआई से लाल सड़न के कवक का घातक रूप ‘सीएफ13’ विकसित हो गया, जिससे को-0238 की रोग प्रतिरोधक क्षमता टूट गई।

करण-20 (को-20016) किसानों को कब मिलेगी? अक्टूबर में केंद्रीय वेरायटल रिलीज कमेटी की बैठक में मंजूरी के बाद — 2027 की बसंत, ग्रीष्म या शरदकालीन बुआई में किसानों को मिल सकती है।

करण-20 की उपज को-0238 से कितनी ज्यादा है? परीक्षणों में 144.6 टन प्रति हेक्टेयर बनाम को-0238 की 116.4 टन; सुक्रोज 18.7 प्रतिशत बनाम 18.3 प्रतिशत। लेकिन व्यावसायिक रिलीज और खेतों में परख अभी बाकी है।

किसान अभी क्या करें? एक ही किस्म पर पूरी निर्भरता छोड़ें — कोई एक किस्म 40-50 प्रतिशत से ज्यादा क्षेत्र में न बोएं, रोगग्रस्त बीज न लगाएं और बीज उपचार अपनाएं।

स्रोत: The Indian Express (UP sugar output falls as red rot hits cane, new variety offers hope), ThePrint (Red rot is ravaging UP’s sugarcane belt — ग्राउंड रिपोर्ट)

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Aamir Raza
लेखक एवं मुख्य संपादक

Aamir Raza

संस्थापक एवं प्रधान संपादक — CaneUp.xyz। उत्तर प्रदेश गन्ना उद्योग, पर्ची कैलेंडर, SAP/MSP मूल्य नीति, ई-गन्ना पोर्टल और किसान अधिकारों पर 10+ वर्षों का जमीनी अनुभव।

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