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सीतापुर-खीरी समेत 4 जिलों में लाल सड़न से 80% गन्ना सूखा: को.0238 वालों के लिए वैज्ञानिकों के 5 जरूरी उपाय

Aamir Raza Aamir Raza • Oct 5, 2026 • 6 min read
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सीतापुर-खीरी समेत 4 जिलों में लाल सड़न से 80% गन्ना सूखा: को.0238 वालों के लिए वैज्ञानिकों के 5 जरूरी उपाय
अंतिम अपडेट: October 5, 2026 2:07 PM IST — यह आर्टिकल नियमित रूप से अपडेट किया जाता है।

सीतापुर/लखीमपुर खीरी। पेराई सत्र शुरू होने से ठीक पहले उत्तर प्रदेश के चार जिलों में गन्ना किसानों की परेशानी बढ़ गई है। ट्रैक्टर जंक्शन की 3 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार सीतापुर, लखीमपुर खीरी, पीलीभीत और शाहजहांपुर में लाल सड़न रोग का प्रकोप है, और गन्ने की किस्म को.0238 इसकी चपेट में सबसे ज्यादा आ रही है। किसानों के हवाले से बताया गया है कि कुछ इलाकों में इस रोग से 80 फीसदी तक फसल सूख गई है, और महंगी दवाओं के छिड़काव के बावजूद रोग काबू में नहीं आ रहा।

शरदकालीन बुवाई (15 सितंबर से 30 अक्टूबर) अभी चल रही है, इसलिए बीज चुनते समय क्या सावधानी बरतें और खड़ी फसल में रोग दिखे तो क्या करें, यही सबसे अहम सवाल है। नीचे यूपीसीएसआर शाहजहांपुर के वैज्ञानिकों की सलाह विस्तार से दी गई है।

क्या है लाल सड़न रोग और क्यों इसे गन्ने का कैंसर कहते हैं

यूपीसीएसआर शाहजहांपुर के पैथोलॉजी अनुभाग के अनुभागाध्यक्ष डॉ. सुजीत प्रताप सिंह के अनुसार गन्ने में लाल सड़न एक बीज जनित फफूंदी रोग है, जिसे गन्ने का कैंसर भी कहा जाता है। यह हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश व ओडिशा में गन्ने को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाता है, और उत्तरी बिहार तथा पूर्वी व मध्य उत्तर प्रदेश में इसका प्रकोप महामारी जैसा रहा है।

रोग का वैज्ञानिक नाम कोलेक्टोट्राइकम फाल्केटम है। इसका सबसे खतरनाक पहलू यह है कि यह संक्रमित बीज गन्ने (सेट्स) के जरिए फैलता है। अगर बुवाई वाला गन्ना ही अंदर से रोगी है तो नई फसल जन्म से संक्रमित पैदा होती है। मिट्टी, सिंचाई के पानी और फसल अवशेष से भी रोगजाणु फैलते हैं, और जलभराव वाले खेतों में रोग तेजी से बढ़ता है।

लक्षण: ऐसे पहचानें कि गन्ने में लाल सड़न लगा है

सबसे खास लक्षण गन्ने के तने के अंदर दिखता है। संक्रमित गन्ने को चीरकर देखें तो अंदर लाल रंग के साथ सफेद धब्बे जैसे दिखाई देते हैं, इसी से इसका नाम पड़ा है। रोग लगने पर पौधा धीरे-धीरे सूखने लगता है, गन्ने की मिठास कम हो जाती है और उत्पादन पर सीधा असर पड़ता है। समय पर बचाव न किया जाए तो पूरी फसल बर्बाद हो सकती है।

यूपीसीएसआर की कासगंज सलाह के अनुसार पत्तियों के निचले भाग से ऊपर की तरफ मध्य शिरा पर लाल रंग के धब्बे बनते हैं, जो रुद्राक्ष या मोतियों की माला जैसे दिखाई देते हैं। संक्रमण के 16 से 21 दिन में पत्तियों का रंग हरे से नारंगी और फिर पीला होने लगता है, और अगले 10 से 15 दिनों में तना नीचे से ऊपर की ओर सूखना शुरू कर देता है।

जब गन्ना अंदर से सूख चुका है तो उसे ठीक नहीं किया जा सकता। देवीपाटन मंडल के उप गन्ना आयुक्त डॉ. आर.वी. राम का कहना है कि रोग के बाद गन्ना सूख जाएगा और कोई दवा काम नहीं करेगी। इसलिए पूरा जोर बचाव और रोकथाम पर होना चाहिए।

को.0238 ही सबसे ज्यादा क्यों चपेट में

लाल सड़न का सबसे घातक रूप यूपी में को.0238 किस्म पर देखा गया है। डॉ. सुजीत प्रताप सिंह ने 2015 से 2019 तक चार साल के शोध के बाद इस रोग के प्रबल प्रकार को “को 0238 रेड-रॉट-सीएफ-13” नाम दिया। को.0238 करीब 15 साल से चलन में है और कभी सबसे लोकप्रिय किस्म रही, लेकिन इसी लंबे इस्तेमाल ने रोग को पनपने का मौका दिया। 26 नवंबर 2024 को उत्तर प्रदेश गन्ना विभाग ने को.0238, को.11015 और को.पीबी.95 को रोग-संवेदनशील घोषित कर बुवाई न करने की अपील की थी।

राहत की खबर यह है कि विभाग ने हाल में लाल सड़न प्रतिरोधी नई किस्मों को मंजूरी दी है। 29 सितंबर की बैठक में को.शा.23232 सहित चार नई किस्मों को खेती की मंजूरी मिली, और 8 पुरानी किस्मों को दो साल में खेती से बाहर करने का फैसला भी हुआ है। एबीपी लाइव की 3 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार यूपी के शोध केंद्रों की 4 तथा केंद्र सरकार से मंजूर 8 किस्मों समेत कुल 12 नई किस्मों में लाल सड़न से बचने की क्षमता पाई गई है।

वैज्ञानिकों के बताए 5 जरूरी उपाय

1. संक्रमित पौधे जड़ से उखाड़कर नष्ट करें: रोग दिखते ही संक्रमित पौधे को जड़ सहित निकालकर खेत से दूर नष्ट कर दें। यूपीसीएसआर की सलाह के अनुसार गड्ढे में 0.2 प्रतिशत थायोफेनेट मेथिल 70 डब्ल्यूपी अथवा एजॉक्सीस्ट्रोबिन 18.2 + डाइफेनोकोनाजोल 11.4 एससी के घोल की ड्रेंचिंग करें। उखाड़े गए स्थान पर 10 से 20 ग्राम ब्लीचिंग पाउडर का बुरकाव भी करें।

2. पत्तियों पर फफूंदनाशक का छिड़काव: 0.1 प्रतिशत थायोफेनेट मेथिल, कार्बेन्डाजिम या टेबुकोनाजोल का छिड़काव करें। यह खड़ी फसल में रोग को आगे फैलने से रोकने में मदद करता है।

3. रोगमुक्त नर्सरी से बीज और उपचार: बुवाई से पहले गन्ने के टुकड़ों को 0.1 प्रतिशत कार्बेन्डाजिम के घोल में 15 मिनट तक डुबोएं। गर्म पानी उपचार (52 डिग्री सेल्सियस) भी रोगजाणु मारने की स्थापित विधि है।

4. फसल चक्र, संक्रमित खेत की पेड़ी न लें: जिस खेत में रोग लगा हो, वहां लगातार गन्ना न लगाएं। गेहूं, धान या हरी खाद की फसल चक्र अपनाएं। संक्रमित खेत से पेड़ी (रैटून) की फसल न लें, क्योंकि रोग बीज के जरिए अगली फसल में चला जाता है।

5. खेत की सफाई और जल निकासी: कटाई के बाद खेत के अवशेष इकट्ठा कर जला दें, ताकि रोग का स्रोत खत्म हो। जलभराव न होने दें, क्योंकि नमी में रोग तेजी से फैलता है। अन्य प्रदेशों से कोई भी गन्ना किस्म वैज्ञानिकों की संस्तुति के बाद ही लाएं।

शरदकालीन बुवाई के लिए कौन सी किस्म चुनें

यूपीसीएसआर के प्रसार अधिकारी डॉ. संजीव कुमार पाठक के अनुसार गन्ने की बुवाई 15 सितंबर से 30 अक्टूबर तक या 15 फरवरी से 30 मार्च तक की जा सकती है। शरदकालीन बुवाई की खिड़की अभी खुली है, इसलिए बीज चुनाव का यह सही समय है।

डॉ. सुजीत प्रताप सिंह की सलाह है कि किसान केवल संस्तुत किस्में ही लगाएं: को.0118, को.15023, को.13235, सीओएस 17231, को.एलके.14201, को.एलके.16202 और को.एस.18231। नई मंजूर किस्में को.शा.23232 और को.लख.21201 भी लाल सड़न प्रतिरोधी हैं, जो को.0238 का विकल्प बन सकती हैं। जो किसान अभी भी को.0238 का बीज लगाने की सोच रहे हैं, उन्हें इस बार योजना बदलनी चाहिए।

पूछे जाने वाले प्रश्न

लाल सड़न को गन्ने का कैंसर क्यों कहा जाता है? क्योंकि यह बीज के जरिए अंदर से फैलता है और एक बार गन्ना अंदर से सूख जाए तो उसे ठीक नहीं किया जा सकता। डॉ. सुजीत प्रताप सिंह (यूपीसीएसआर, शाहजहांपुर) ने इसे बीज जनित फफूंदी रोग बताते हुए गन्ने का कैंसर कहा है।

क्या लाल सड़न लगी फसल को दवा से ठीक किया जा सकता है? पूरी तरह सूख चुके गन्ने को नहीं। लेकिन शुरुआती अवस्था में संक्रमित पौधे हटाने, गड्ढे में फफूंदनाशक घोल डालने और छिड़काव से रोग को आगे फैलने से रोका जा सकता है।

बीज गन्ने का उपचार कैसे करें? गन्ने के टुकड़ों को 0.1 प्रतिशत कार्बेन्डाजिम के घोल में 15 मिनट तक डुबोएं। गर्म पानी उपचार (52 डिग्री सेल्सियस) भी रोगजाणु मारने की वैज्ञानिक विधि है। हमेशा रोगमुक्त नर्सरी से स्वस्थ बीज लें।

को.0238 की जगह कौन सी किस्म लगाएं? को.0118, को.15023, को.13235, सीओएस 17231, को.एलके.14201, को.एलके.16202 और को.एस.18231 की संस्तुति की गई है। नई मंजूर किस्में को.शा.23232 और को.लख.21201 भी लाल सड़न प्रतिरोधी हैं।

स्रोत: ट्रैक्टर जंक्शन (3 अक्टूबर 2026), 101रिपोर्टर्स, अमर उजाला (यूपीसीएसआर सलाह, कासगंज), एबीपी लाइव (3 अक्टूबर 2026), कृषिजागरण, न्यूज18 (शाहजहांपुर, 3 अक्टूबर 2026)

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Aamir Raza
लेखक एवं मुख्य संपादक

Aamir Raza

संस्थापक एवं प्रधान संपादक — CaneUp.xyz। उत्तर प्रदेश गन्ना उद्योग, पर्ची कैलेंडर, SAP/MSP मूल्य नीति, ई-गन्ना पोर्टल और किसान अधिकारों पर 10+ वर्षों का जमीनी अनुभव।

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