मथुरा की छाता चीनी मिल 18 साल से बंद: जंग खा रहीं मशीनें, खंडहर कार्यालय, किसानों का 40 दिन से धरना जारी

🚨 BREAKING: उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में छाता विधानसभा की चीनी मिल का 18 साल से ताला नहीं खुला है। न्यूज18 की आज (27 सितंबर 2026) की ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि मिल के अंदर की मशीनें पूरी तरह कबाड़ में तब्दील हो चुकी हैं, लोहा पूरी तरह गल गया है और कई मशीनें गायब हैं। कर्मचारी और अधिकारियों के आवास-कार्यालय खंडहर बन चुके हैं। इस बीच किसान करीब 40 दिन से मिल परिसर के बाहर धरने पर बैठे हैं और “चीनी मिल चालू करो” के नारों से ब्रज का पूरा क्षेत्र गूंज रहा है।
1978 में शुरू, 2008 में बंद — छाता मिल का इतिहास
न्यूज18 की रिपोर्ट के अनुसार, छाता की यह चीनी मिल दशकों पहले जब शुरू हुई थी तो इलाके के गन्ना किसान बेहद खुश थे। लेकिन 2008 में यह मिल घाटा दिखाकर बंद कर दी गई। उस समय प्रदेश में बसपा की सरकार थी और पेराई सत्र पर रोक लगा दी गई।
तब से 18 साल बीत चुके हैं, लेकिन यह मिल आज तक चालू नहीं हो पाई। स्थानीय लोगों का कहना है कि हर चुनाव में इसे चालू करने के सपने दिखाए जाते हैं, लेकिन चुनाव बीतते ही यह मुद्दा ठंडे बस्ते में चला जाता है। रिपोर्ट में इसे साफ शब्दों में कहा गया है — तब से लेकर आज तक यह मिल सिर्फ चुनावी मुद्दा बनकर रह गई है।
अंदर की हालत: जंग, कबाड़ और खंडहर
न्यूज18 की टीम जब मिल परिसर पहुंची तो हालत देखकर कोई भी चौंक जाए। मिल की मुख्य बातें, जो अब तक लोगों को पता नहीं थीं:
- मशीनें कबाड़ में तब्दील: लोहा पूरी तरह गल गया है और कई मशीनें तथा उनके पुर्जे गायब हैं।
- खंडहर परिसर: प्रांगण में बड़ी-बड़ी कटीली झाड़ियां खड़ी हो गई हैं। कर्मचारियों और अधिकारियों के आवास व कार्यालय पूरी तरह खंडहर बन चुके हैं।
- हमेशा ताला: मिल के अंदर वाले गेट पर हमेशा ताला जड़ा रहता है। एक निजी कंपनी के सुरक्षाकर्मी देखरेख करते हैं और किसी को अंदर जाने की अनुमति नहीं है।
- मशीनें कैसे गायब हुईं? कर्मचारियों के अनुसार, करीब 10 वर्ष पहले जब मिल सिक्योरिटी के हवाले की गई थी, तब सारी चीजें लिखित में दर्ज थीं। उससे पहले कौन-सी मशीनें और कल-पुर्जे गायब हुए, यह किसी को नहीं पता।
मिल की यह हालत बताती है कि करीब दो दशक की उपेक्षा ने एक समय की वरदान रही चीनी मिल को कबाड़खाने में बदल दिया है।
40 दिन से धरना, सोमवार तड़के हटाया गया
इस बीच किसानों का आंदोलन भी तेज होता जा रहा है। द जेबीटी की 22 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, करीब 40 दिन से किसान मिल परिसर के बाहर धरने पर बैठे थे। लेकिन सोमवार (21 सितंबर) तड़के करीब तीन बजे पुलिस धरना स्थल पर पहुंची।
किसानों का आरोप है कि उस समय अधिकांश किसान सो रहे थे। धरने का टेंट, माइक और अन्य सामान हटवा दिया गया तथा कुछ लोगों को हिरासत में भी लिया गया। धरने का नेतृत्व कर रहे सेवानिवृत्त सूबेदार कर्मयोगी ने वीडियो जारी कर पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए।
हालांकि, पुलिस की ओर से इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
धरना हटने की खबर मिलते ही आसपास के गांवों में आक्रोश फैल गया। करीब 30 गांवों में पंचायतें हुईं और किसान ट्रैक्टर-ट्रॉलियों से छाता शुगर मिल की ओर रवाना हो गए। मिल परिसर के आसपास नारेबाजी हुई और सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई।
13 सितंबर: मिल परिसर में बड़ा प्रदर्शन, बीकेयू का दावा
मथुरानाउ की रिपोर्ट के अनुसार, 13 सितंबर 2026 को छाता की बंद पड़ी चीनी मिल के स्थल पर एक बड़ा प्रदर्शन हुआ था। स्थानीय किसान एक बड़े शामियाने के नीचे इकट्ठा होकर मिल को तुरंत फिर से चालू करने की मांग कर रहे थे। पूरे प्रदर्शन के दौरान “चीनी मिल चालू करो” के नारे गूंजते रहे।
बीकेयू नेता का दावा है कि तीन साल पहले लखनऊ में मंत्री के आवास पर हुई बैठक में छाता मिल के पुनरुद्धार के लिए 300 करोड़ रुपये के आवंटन का आश्वासन मिला था, लेकिन परियोजना साकार नहीं हो पाई। उनका आरोप है कि मंत्री अब कहने लगे हैं कि मिल चालू नहीं की जाएगी। उन्होंने गतिरोध को “अहंकार का मुद्दा” बताया और कहा कि किसान अपनी मांगों से पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।
16 सितंबर का कैबिनेट फैसला और जमीन की हकीकत
गौरतलब है कि 16 सितंबर 2026 को योगी कैबिनेट ने मथुरा की छाता सहकारी चीनी मिल में 3.96 करोड़ लीटर वार्षिक क्षमता का ड्यूल-मोड एथेनॉल प्लांट लगाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। गन्ना विकास मंत्री चौधरी लक्ष्मी नारायण ने कहा था कि यह प्लांट पेराई सीजन में गन्ने के रस व शीरे से और ऑफ-सीजन में मक्का व अनाज से एथेनॉल बनाएगा।
लेकिन 27 सितंबर की ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि जमीन पर हालत अब भी जस की तस है — मिल पर ताला है, मशीनें जंग खा रही हैं और किसान सड़कों पर हैं। किसानों की मांग स्पष्ट है: केवल डिस्टिलरी नहीं, चीनी मिल की पेराई भी दोबारा शुरू की जाए। कभी 1,250 TCD क्षमता की यह चीनी मिल क्षेत्र के हजारों किसानों की आजीविका का आधार थी।
किसानों पर क्या असर पड़ा?
छाता क्षेत्र के गन्ना किसानों को पिछले 18 सालों से सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ कि उनके पास स्थानीय स्तर पर गन्ना बेचने का कोई ठिकाना नहीं बचा। किसान या तो दूर की मिलों तक गन्ना पहुंचाते हैं, जिसमें ढुलाई का भारी खर्च आता है, या मजबूरी में कोल्हू पर कम दाम में गन्ना बेचना पड़ता है।
कैबिनेट फैसले के बाद किसानों ने उम्मीद जताई थी कि हालात बदलेंगे, लेकिन जमीन की तस्वीर और चल रहा धरना बताता है कि ब्रज के गन्ना किसानों का इंतजार अभी खत्म नहीं हुआ है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
छाता चीनी मिल कहां स्थित है?
यह उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले की छाता विधानसभा में नेशनल हाईवे-19 (आगरा-दिल्ली रोड) पर स्थित है।
छाता चीनी मिल कब शुरू हुई और कब बंद हुई?
न्यूज18 की ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, यह मिल 1978 में शुरू हुई थी और 2008 में बसपा सरकार के दौरान घाटा दिखाकर बंद कर दी गई।
किसान छाता मिल के लिए क्यों आंदोलन कर रहे हैं?
किसान 18 साल से बंद पड़ी मिल को दोबारा चालू कराने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि मिल बंद होने से गन्ने की खेती घाटे का सौदा बन गई है। करीब 40 दिन से किसान मिल परिसर के बाहर धरने पर हैं।
क्या सरकार ने छाता मिल को लेकर कोई फैसला लिया है?
हां, 16 सितंबर 2026 को योगी कैबिनेट ने छाता मिल में 3.96 करोड़ लीटर क्षमता का ड्यूल-मोड एथेनॉल प्लांट लगाने की मंजूरी दी थी। लेकिन किसान चीनी मिल की पेराई भी दोबारा शुरू करने की मांग कर रहे हैं।
21 सितंबर को धरने के साथ क्या हुआ?
किसानों का आरोप है कि 21 सितंबर तड़के करीब 3 बजे पुलिस ने धरना स्थल से टेंट और सामान हटवा दिया। पुलिस की ओर से इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
स्रोत: न्यूज18 हिंदी — मथुरा ग्राउंड रिपोर्ट (27 सितंबर 2026); मथुरानाउ — किसान प्रदर्शन रिपोर्ट (13 सितंबर 2026); द जेबीटी — धरना व पुलिस कार्रवाई रिपोर्ट (22 सितंबर 2026); केनअप — कैबिनेट एथेनॉल प्लांट फैसले की पूर्व रिपोर्ट (16 सितंबर 2026)।
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