14 अक्टूबर को बनी रमेश चंद गन्ना कमेटी, किसान बोले — हमें मंजूर नहीं: चीनी ₹31 से ₹50 और गन्ना भाव पर अब क्या होगा फैसला?

केंद्र सरकार ने 14 अक्टूबर 2026 को गन्ना किसानों की मांगों पर विचार के लिए एक उच्च-स्तरीय समिति की अधिसूचना जारी कर दी, जिसकी अध्यक्षता नीति आयोग के पूर्व सदस्य प्रोफेसर रमेश चंद करेंगे। लेकिन अधिसूचना के 24 घंटे के भीतर ही महाराष्ट्र और कर्नाटक के किसान संगठनों ने इस कदम को खारिज कर दिया है। उनका कहना है कि रिपोर्ट सौंपने या सिफारिशें लागू करने की कोई स्पष्ट समयसीमा तय नहीं की गई, इसलिए विरोध प्रदर्शन जारी रहेगा। उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों के लिए यह खबर इसलिए अहम है क्योंकि समिति की सिफारिशें गन्ने के समर्थन मूल्य और चीनी के न्यूनतम विक्रय मूल्य दोनों पर असर डालेंगी — और इन्हीं दोनों से मिलों की भुगतान क्षमता तय होती है।
12 अक्टूबर की बैठक: कैसे बनी कमेटी
खाद्य मंत्रालय के बयान के अनुसार, 12 अक्टूबर को पूसा परिसर में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और केंद्रीय खाद्य मंत्री प्रह्लाद जोशी ने महाराष्ट्र और कर्नाटक के करीब 80-90 किसान प्रतिनिधियों से विस्तृत चर्चा की, जिसमें दोनों राज्यों के मंत्री भी मौजूद थे। किसानों ने उत्पादन लागत बढ़ने का हवाला देकर गन्ने के समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी और चीनी के न्यूनतम विक्रय मूल्य को मौजूदा 31 रुपये प्रति किलोग्राम से बढ़ाकर 50 रुपये प्रति किलोग्राम करने की मांग रखी। बैठक के दो दिन बाद 14 अक्टूबर को केंद्र ने रमेश चंद की अध्यक्षता में समिति गठित करने की अधिसूचना जारी कर दी।
समिति किन 6 बड़े मुद्दों की जांच करेगी
अधिसूचना के अनुसार समिति का दायरा काफी व्यापक रखा गया है। जांच के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
- लाभकारी मूल्य की मांग: खेती की लागत और अन्य प्रासंगिक कारकों को ध्यान में रखते हुए किसानों को अधिक लाभकारी मूल्य दिलाने की मांग पर विचार।
- चीनी के न्यूनतम मूल्य में संशोधन: उत्पादन लागत, बाजार से होने वाली प्राप्तियों और चीनी मिलों की वित्तीय व्यवहार्यता को ध्यान में रखते हुए मिल-गेट स्तर पर चीनी के न्यूनतम विक्रय मूल्य की मांग की समीक्षा।
- रिकवरी की जांच व्यवस्था: चीनी की रिकवरी, यानी गन्ने से प्राप्त चीनी की मात्रा, के निर्धारण और रिपोर्टिंग की मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा तथा पारदर्शी सत्यापन सुनिश्चित करने के उपाय।
- तौल की प्रक्रिया: मिलों में गन्ने की तौल की प्रक्रियाओं का आकलन — यह किसानों की पुरानी शिकायत रही है कि धर्मकांटों पर वजन में कटौती की जाती है।
- मशीन-कटाई वाली कटौती: मशीनों से काटे गए गन्ने के वजन में की जाने वाली कटौती की प्रक्रिया की जांच। समिति यह भी आकलन करेगी कि मशीनी कटाई से वास्तव में कोई नुकसान होता है या नहीं, और यदि होता है तो उसकी मात्रा कितनी है।
- भुगतान पर असर: समिति यह भी परखेगी कि इन प्रक्रियाओं का किसानों को देय गन्ना मूल्य पर क्या प्रभाव पड़ता है, और आवश्यक समझे जाने वाले अन्य संबंधित मुद्दों पर भी विचार कर सकती है।
समिति अपनी जांच के दौरान सभी संबंधित पक्षों — किसान प्रतिनिधियों, चीनी मिल संघों, राज्य सरकारों तथा विषय विशेषज्ञों — से परामर्श करेगी और निष्कर्ष व सिफारिशों वाली रिपोर्ट “जल्द से जल्द” सक्षम प्राधिकारी को सौंपेगी।
अधिसूचना के बाद भी आंदोलन: किसानों ने प्रस्ताव ठुकराया
पीटीआई की 15 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र की 55 चीनी मिलों में से केवल 15 में ही 2026-27 के पेराई सत्र का काम शुरू हुआ है, जबकि कर्नाटक में अब तक पेराई शुरू नहीं हुई है। महाराष्ट्र में 40 मिलों ने सत्र से पहले की परंपरागत पूजा कर ली, पर आंदोलन के कारण पूर्ण कामकाज शुरू नहीं हो पाया। रिपोर्ट में कहा गया है कि 8 अक्टूबर से शुरू 15 मिलों की चीनी से बाजार कीमतों में कमी की उम्मीद है, और कर्नाटक की 28 मिलों में से 8 विशेष सत्र के गन्ने की पेराई कर रही हैं। महाराष्ट्र और कर्नाटक देश के क्रमशः दूसरे और तीसरे सबसे बड़े चीनी उत्पादक राज्य हैं।
किसानों की राष्ट्रीय राजमार्ग अवरुद्ध करने की चेतावनी के बाद ही मंत्रियों ने किसान संगठनों से बातचीत की थी, जिसमें समिति बनाने का निर्णय हुआ। लेकिन सूत्रों के अनुसार किसान संगठनों ने इसे खारिज कर दिया है और विरोध जारी है — नाराजगी की वजह रिपोर्ट सौंपने या सिफारिशें लागू करने की कोई स्पष्ट समयसीमा न होना है।
यूपी के गन्ना किसानों के लिए इसका क्या मतलब है
उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा गन्ना और चीनी उत्पादक राज्य है, जहां आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 122 चीनी मिलें संचालित होती हैं। समिति की सिफारिशों का यूपी पर दोहरा असर पड़ेगा: यदि चीनी का न्यूनतम विक्रय मूल्य 31 से बढ़कर 50 रुपये प्रति किलो होता है तो मिलों की आमदनी और भुगतान क्षमता सुधरेगी; और एफआरपी में वृद्धि की सिफारिश हुई तो उसका लाभ देशभर के किसानों को मिलेगा, क्योंकि एफआरपी ही वह न्यूनतम आधार भाव है जो मिलों को देना ही पड़ता है।
यूपी में गन्ना केंद्र के एफआरपी के ऊपर राज्य के राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) पर बिकता है, और योगी कैबिनेट ने इस सत्र के लिए एसएपी में वृद्धि नहीं की — गन्ना 2025-26 के ही मूल्य (अगेती 400 रुपये, सामान्य 390 रुपये प्रति क्विंटल) पर बिक रहा है। ऐसे में केंद्र की समिति की सिफारिशें यूपी के किसानों के लिए भाव बढ़ने का एकमात्र बड़ा रास्ता बन सकती हैं।
आगे क्या: रिपोर्ट कब आएगी, क्या उम्मीद करें
फिलहाल सबसे बड़ी अनिश्चितता समयसीमा को लेकर है। अधिसूचना में “जल्द से जल्द” रिपोर्ट का जिक्र है, पर कोई तारीख नहीं — यही वजह है कि किसान संगठन इसे टालमटोल मान रहे हैं। महाराष्ट्र-कर्नाटक का आंदोलन तेज रहा तो दबाव में रिपोर्ट जल्दी भी आ सकती है।
यूपी के किसानों को फिलहाल तीन बातों पर नजर रखनी चाहिए: चीनी के न्यूनतम मूल्य पर क्या सिफारिश होती है — 50 रुपये की मांग पूरी होती है या बीच का रास्ता निकलता है; मशीन से कटे गन्ने की कटौती और तौल की शिकायतों पर कोई ठोस व्यवस्था बनती है या नहीं — यह पश्चिम यूपी में हार्वेस्टर से कटाई करने वाले हजारों किसानों से सीधा जुड़ा मुद्दा है; और पेराई सत्र में मिलों के भुगतान की स्थिति — क्योंकि भाव बढ़ने का असली फायदा तभी है जब भुगतान समय पर खाते में आए।
आपके सवाल
रमेश चंद समिति कब बनाई गई? केंद्र सरकार ने 14 अक्टूबर 2026 को इस समिति की अधिसूचना जारी की। इसके अध्यक्ष नीति आयोग के पूर्व सदस्य प्रोफेसर रमेश चंद हैं।
समिति किन मांगों पर विचार करेगी? गन्ने के समर्थन मूल्य में वृद्धि, चीनी के न्यूनतम विक्रय मूल्य को 31 रुपये से बढ़ाकर 50 रुपये प्रति किलो करना, रिकवरी की जांच व्यवस्था, तौल की प्रक्रिया, मशीन-कटाई पर वजन कटौती और इन सबका किसान के भुगतान पर असर।
किसानों ने समिति को क्यों ठुकराया? किसान संगठनों का कहना है कि रिपोर्ट सौंपने या सिफारिशें लागू करने की कोई स्पष्ट समयसीमा तय नहीं की गई है, इसलिए उन्हें लगता है कि मांगें तत्काल पूरी नहीं होंगी।
महाराष्ट्र और कर्नाटक में पेराई की क्या स्थिति है? 15 अक्टूबर तक महाराष्ट्र की 55 में से 15 मिलों में पेराई शुरू हुई, जबकि कर्नाटक में विरोध के कारण पूर्ण पेराई शुरू नहीं हुई है।
यूपी के किसानों को इससे क्या फायदा हो सकता है? यदि चीनी का न्यूनतम मूल्य बढ़ता है तो मिलों की भुगतान क्षमता सुधरेगी, और एफआरपी में वृद्धि की सिफारिश का लाभ पूरे देश के किसानों को मिलेगा।
स्रोत: आईबीसी24 (पीटीआई/भाषा, 14 व 15 अक्टूबर 2026), हिंदी बिजनेस स्टैंडर्ड (15 अक्टूबर 2026)।
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