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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: मिलों को देना होगा 15% ब्याज, सरकार की अर्जी खारिज — ₹1,936 करोड़ बकाया वसूली पर किसानों की जीत

Aamir Raza Aamir Raza • Oct 11, 2026 • 6 min read
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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: मिलों को देना होगा 15% ब्याज, सरकार की अर्जी खारिज — ₹1,936 करोड़ बकाया वसूली पर किसानों की जीत
अंतिम अपडेट: October 11, 2026 11:50 AM IST — यह आर्टिकल नियमित रूप से अपडेट किया जाता है।

नई दिल्ली/लखनऊ: उत्तर प्रदेश के लाखों गन्ना किसानों को त्योहारों से ठीक पहले सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। बकाया भुगतान पर 15% ब्याज के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने 6 अक्टूबर 2026 को उत्तर प्रदेश सरकार की याचिका निपटा दी, जिसमें ब्याज में छूट मांगी गई थी। अदालत ने साफ किया कि गन्ना आपूर्ति के 14 दिनों के भीतर भुगतान का कानूनी अधिकार और देरी पर 15% वार्षिक ब्याज का नियम बना रहेगा। यह फैसला उन किसानों के लिए बेहद अहम है, जिनका बकाया 1990 के दशक से अटका है।

मामला क्या है: ₹1,936 करोड़ का बकाया, एक पैसा ब्याज नहीं मिला

इलाहाबाद हाईकोर्ट के 31 अगस्त 2026 के आदेश के मुताबिक, मिलों से वसूली प्रमाण पत्रों (RC) के तहत कुल ₹1,936 करोड़ वसूलने बाकी हैं — ₹1,087 करोड़ मूल बकाया और ₹849.5 करोड़ ब्याज (15% की दर से)। हाईकोर्ट ने दर्ज किया था कि “ब्याज के तौर पर एक पैसा भी वसूल नहीं किया गया है”। 15% की निर्धारित दर के बजाय कुछ जिलों में अधिकारियों ने 12% पर रिकवरी सर्टिफिकेट जारी कर दिए थे, जिस पर कोर्ट ने कड़ी फटकार लगाई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने 6 अक्टूबर को क्या कहा

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने तीन विशेष अनुमति याचिकाओं (SLP) का निपटारा किया, जो इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेशों को चुनौती देते हुए दाखिल की गई थीं। यूपी सरकार ने दो मुख्य तर्क दिए थे: पहला, आर्थिक तंगी से जूझ रही मिलों पर 15% ब्याज का बोझ डालने से वे दिवालिया हो सकती हैं और मिलें बंद होने पर किसानों को ही नुकसान होगा। दूसरा, यूपी गन्ना अधिनियम, 1953 की धारा 17(3) के तहत उपयुक्त मामलों में ब्याज में कटौती या माफी का प्रावधान है।

सुप्रीम कोर्ट ने दोनों तर्क खारिज कर दिए और 14 दिन की भुगतान सीमा तथा 15% ब्याज को “कर्ज के जाल से बचने के लिए जरूरी सुरक्षा उपाय” बताया। अदालत ने सीधे कोई छूट मंजूर नहीं की, लेकिन सरकार और मिल संघ को स्वतंत्रता दी कि वे धारा 17(3) के आधार पर पुनर्विचार की मांग इलाहाबाद हाईकोर्ट के समक्ष कर सकते हैं।

14 दिन का कानून: किसानों का सबसे बड़ा अधिकार

किसानों के लिए इस लड़ाई में सबसे मजबूत हथियार यूपी गन्ना अधिनियम, 1953 की धारा 17 है: गन्ना आपूर्ति के 14 दिनों के भीतर मिल को शत-प्रतिशत भुगतान अनिवार्य है, और देरी पर विलंब अवधि के लिए 15% वार्षिक साधारण ब्याज देय होगा। धारा 17(3) की छूट अपवाद की स्थिति के लिए है, सामान्य नियम नहीं।

इसी कानून के लिए 2006 में राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन (RKMS) के प्रमुख और पूर्व विधायक वी.एम. सिंह ने जनहित याचिका (PIL) दाखिल की थी। करीब 20 साल की लड़ाई के बाद सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश को वे अपनी सबसे बड़ी जीत मान रहे हैं: “यह आदेश एक बड़ी उपलब्धि है। सोचिए, एक किसान के लिए 30 साल के इंतजार का क्या मतलब होता है।”

बिजनौर में किसानों का धरना, साल-दर-साल ब्याज का ब्योरा मांगा

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बिजनौर में धरने पर बैठे किसानों की उम्मीदें बढ़ गई हैं। वहां किसान इस सीजन गन्ने का भाव ₹600 प्रति क्विंटल किए जाने की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं — उनका कहना है कि महंगाई और डीजल-सीएनजी की बढ़ती कीमतों के बीच मौजूदा भाव पर खेती घाटे का सौदा बनती जा रही है।

धरना नेता कैलाश लांबा ने कहा कि अदालत ने ब्याज का हक तो माना है, लेकिन उनकी तत्काल मांग किसानों को बकाया ब्याज का अलग-अलग और साल-दर-साल का ब्योरा देने की है। उनका मानना है कि वसूली प्रमाण पत्रों में दिखाया जा रहा ₹849.5 करोड़ ब्याज असल रकम से कहीं कम है। उन्होंने कहा कि विलंबित भुगतान की मार छोटे किसानों पर सबसे ज्यादा पड़ी है, जिन्हें खाद-मशीनरी के खर्च के साथ शादी-ब्याह जैसे घरेलू खर्च भी पूरे करने पड़ते हैं।

एक मार्मिक तथ्य यह भी है कि जिन किसानों ने दशकों पहले गन्ना सप्लाई किया था, उनमें से कई की अब मौत हो चुकी है। कई परिवारों के पास उस दौर की तौल पर्चियां आज भी संभालकर रखी हैं, जो अब इस कानूनी जीत में उनके हक का सबूत बनेंगी।

2027 के विधानसभा चुनाव से पहले “गन्ना” फिर बड़ा मुद्दा

इस आदेश का समय भी बेहद अहम है। 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं और “गन्ना” फिर से प्रदेश की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन रहा है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव समय पर भुगतान के मुद्दे पर किसानों और खाप प्रतिनिधियों से संपर्क में हैं, जबकि रालोद के जयंत चौधरी गन्ना अर्थव्यवस्था को लगातार आगे रख रहे हैं। आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर आजाद ने कहा कि हाईकोर्ट के 15% ब्याज आदेश के बाद तत्कालीन सपा सरकार ने कैबिनेट प्रस्ताव से मिल मालिकों का साथ दिया था, जिसे हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया — और अब सुप्रीम कोर्ट ने भी राज्य सरकार की एसएलपी खारिज कर दी है।

किसानों को अब क्या करना चाहिए

  1. पुरानी तौल पर्चियां और भुगतान के कागजात संभालकर रखें: 1990 के दशक या उसके बाद के बकाए के जो भी तौल पर्ची, पर्ची-केंद्र के रिकॉर्ड या भुगतान के सबूत हैं, वे अब आपके दावे की बुनियाद हैं।
  2. हाईकोर्ट की निगरानी वाली वसूली पर नजर रखें: सरकार और मिल संघ ब्याज में पुनर्विचार की मांग हाईकोर्ट में कर सकते हैं, इसलिए किसान संगठनों को कानूनी पैरवी में सक्रिय रहना चाहिए।
  3. केनयूपी (caneup.in) पोर्टल पर रिकॉर्ड दुरुस्त रखें: जब मिलें 20 अक्टूबर के बाद खुलेंगी, तो अपना सट्टा-सर्वे रिकॉर्ड, बैंक खाता और आधार लिंकिंग पहले से दुरुस्त रखें, ताकि नए भुगतान में अड़चन न आए।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या सुप्रीम कोर्ट ने मिलों को तुरंत ₹1,936 करोड़ चुकाने का आदेश दिया?

नहीं, सीधे ऐसा आदेश नहीं दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार की छूट वाली याचिका निपटा दी और 14 दिन की भुगतान सीमा व 15% ब्याज का नियम बरकरार रखा। ब्याज में पुनर्विचार की मांग अब इलाहाबाद हाईकोर्ट के समक्ष की जा सकती है।

15% ब्याज किस पर और कब से मिलेगा?

यूपी गन्ना अधिनियम, 1953 की धारा 17 के अनुसार, किसान द्वारा गन्ना आपूर्ति के 14 दिनों के बाद देरी होने पर विलंब अवधि के लिए 15% वार्षिक साधारण ब्याज देय होता है। यह नियम दशकों से लागू है; अब सुप्रीम कोर्ट ने इसे फिर से पुख्ता किया है।

₹1,936 करोड़ में से कितना मूलधन और कितना ब्याज है?

हाईकोर्ट के 31 अगस्त 2026 के आदेश के अनुसार, ₹1,087 करोड़ रुपये गन्ने का मूल बकाया है और ₹849.5 करोड़ रुपये 15% की दर से जुड़ा ब्याज है। हाईकोर्ट ने दर्ज किया था कि ब्याज के तौर पर एक पैसा भी वसूल नहीं किया गया है।

क्या 12% पर जारी रिकवरी सर्टिफिकेट वैध रहेंगे?

हाईकोर्ट ने 12% पर सर्टिफिकेट जारी करने पर अधिकारियों को फटकार लगाई थी। अदालत का निर्देश 15% की दर को लागू करने का है।

क्या धारा 17(3) से सरकार ब्याज माफ कर सकती है?

धारा 17(3) में ब्याज में कटौती या माफी का प्रावधान उपयुक्त मामलों के लिए है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुनर्विचार कानून के अनुसार इलाहाबाद हाईकोर्ट के समक्ष ही मांगा जा सकता है।

स्रोत: टाइम्स ऑफ इंडिया (नई दिल्ली, 9 अक्टूबर 2026), किसान तक (9 अक्टूबर 2026), द बार बुलेटिन (9 अक्टूबर 2026), लोकमत टाइम्स।

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Aamir Raza
लेखक एवं मुख्य संपादक

Aamir Raza

संस्थापक एवं प्रधान संपादक — CaneUp.xyz। उत्तर प्रदेश गन्ना उद्योग, पर्ची कैलेंडर, SAP/MSP मूल्य नीति, ई-गन्ना पोर्टल और किसान अधिकारों पर 10+ वर्षों का जमीनी अनुभव।

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