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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला — सरकार की अपील खारिज, 30 साल से फंसा ₹2000 करोड़ बकाया और 15% ब्याज अब मिलेगा

Aamir Raza Aamir Raza • Oct 12, 2026 • 6 min read
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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला — सरकार की अपील खारिज, 30 साल से फंसा ₹2000 करोड़ बकाया और 15% ब्याज अब मिलेगा
अंतिम अपडेट: October 12, 2026 6:55 AM IST — यह आर्टिकल नियमित रूप से अपडेट किया जाता है।

उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों के लिए सुप्रीम कोर्ट से बड़ी खुशखबरी आई है — कोर्ट ने सरकार की अपील खारिज करते हुए (6 अक्टूबर का आदेश) गन्ना बकाए पर 15% सालाना ब्याज और 14 दिन के भीतर भुगतान की कानूनी बाध्यता बरकरार रखी है। इस आदेश के बाद करीब ₹1,936 करोड़ के पुराने बकाए की वसूली का रास्ता साफ हो गया है, जिसमें ₹1,087 करोड़ मूल गन्ना मूल्य और ₹849.5 करोड़ ब्याज शामिल है। यह पैसा 1990 के दशक से कानूनी लड़ाई में फंसा हुआ था — यानी करीब तीन दशक से।

जानकारों का मानना है कि यह फैसला नए पेराई सत्र से पहले किसानों की सबसे पुरानी शिकायत का समाधान कर सकता है। चीनी मिलें करीब 20 अक्टूबर से 2026-27 का पेराई सत्र शुरू करने जा रही हैं, और उसी समय हजारों किसानों को दशकों पुराने बकाए की वापसी की उम्मीद बंधी है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा — पूरा आदेश समझें

सुप्रीम कोर्ट ने तीन विशेष अनुमति याचिकाओं का निपटारा करते हुए कहा कि गन्ना भुगतान का 14 दिन का नियम और 15% ब्याज किसानों के लिए “कर्ज के जाल से बचाने वाली अनिवार्य सुरक्षा” है — इसे कमजोर नहीं किया जा सकता।

उत्तर प्रदेश सरकार ने दो दलीलें रखी थीं। पहली — 15% ब्याज से कमजोर मिलें दिवालिया हो जाएंगी, और मिलें बंद होने पर नुकसान आखिरकार किसानों का ही होगा। दूसरी — यूपी गन्ना अधिनियम, 1953 की धारा 17(3) में सरकार को ब्याज घटाने या माफ करने का अधिकार है।

सुप्रीम कोर्ट ने दोनों दलीलों को ठुकरा दिया। कोर्ट का कहना था कि कानून में ब्याज दर और समयसीमा इसलिए रखी गई है ताकि किसान का पैसा सालों तक मिलों के पास न फंसे। हालांकि कोर्ट ने एक दरवाजा खुला छोड़ा — राज्य सरकार और मिल एसोसिएशन चाहें तो धारा 17(3) के तहत ब्याज में पुनर्विचार की मांग इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने रख सकती हैं, और हाईकोर्ट उस पर कानूनी रूप से उचित आदेश देगा। यानी 15% ब्याज की बाध्यता कायम है; कोई छूट नहीं मिली है।

₹1,936 करोड़ का हिसाब — किसानों को कितना पैसा मिलेगा

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 31 अगस्त 2026 के आदेश में दर्ज किया था कि वसूली प्रमाणपत्रों (रिकवरी सर्टिफिकेट) के तहत चीनी मिलों से अभी भी ₹1,936 करोड़ वसूल होना बाकी है। इसका ब्योरा इस प्रकार है:

  • ₹1,087 करोड़ — किसानों का मूल गन्ना मूल्य (कई वर्षों का बकाया)
  • ₹849.5 करोड़ — देरी पर बना 15% ब्याज

सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि हाईकोर्ट ने अपने आदेश में लिखा — “ब्याज के नाम पर अब तक एक भी पैसा वसूल नहीं हुआ है।” यही नहीं, कुछ वसूली प्रमाणपत्र 12% ब्याज की दर से जारी कर दिए गए थे, जबकि अदालत का आदेश 15% का था। दर के इस अंतर से किसानों को करोड़ों का नुकसान हो रहा था।

तीन दशक पुराना विवाद — पूरा बैकग्राउंड

गन्ना बकाए पर ब्याज की लड़ाई 1990 के दशक से चल रही है। 2012 से 2014 के बीच भुगतान में देरी पर तत्कालीन सरकार ने मिल मालिकों का करीब ₹2,000 करोड़ ब्याज माफ कर दिया था। 2017 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस माफी को रद्द कर दिया — कोर्ट ने कहा था कि सरकार ने सिर्फ मिल मालिकों का पक्ष सुनकर एकतरफा फैसला लिया, किसानों की बात नहीं सुनी। इसके बाद मामला जनहित याचिका के रूप में चलता रहा, लेकिन ब्याज का एक रुपया भी किसानों तक नहीं पहुंचा। 6 अक्टूबर के आदेश ने इस लंबी लड़ाई में किसानों के पक्ष को निर्णायक मजबूती दी है।

14 दिन का नियम क्यों है इतना अहम

गन्ना किसानों की सबसे बड़ी दिक्कत भुगतान की देरी है। कानून कहता है कि मिल को गन्ना खरीद के 14 दिन के भीतर पूरा भुगतान करना होगा। देरी होने पर 15% सालाना ब्याज किसान का कानूनी हक है।

सुप्रीम कोर्ट ने इसी बात को दोहराया — यह नियम कोई औपचारिकता नहीं, बल्कि किसान को आर्थिक शोषण से बचाने वाला कवच है। किसान संगठनों की सालों पुरानी मांग रही है कि ब्याज की रकम का हिसाब किसानों को अलग से बताया जाए — कौन सी मिल ने कितने दिन देरी की, ब्याज कितना बना।

पेराई सत्र से पहले का सही समय

यह फैसला ऐसे समय आया है जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश की चीनी मिलें 20 अक्टूबर के आसपास पेराई शुरू करने की तैयारी में हैं। बिजनौर, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, शामली और मुरादाबाद की मिलों में बॉयलर पूजा और स्टीम ट्रायल पूरे होने वाले हैं।

किसानों को आगे क्या करना चाहिए

  1. अपना बकाया रिकॉर्ड रखें — पुराने वर्षों का बकाया है तो संबंधित चीनी मिल और गन्ना समिति से लिखित हिसाब मांगें। इस आदेश के बाद ब्याज की गणना का दावा मजबूत हुआ है।
  2. शिकायत का रास्ता खुला है — भुगतान में देरी या ब्याज न मिलने पर गन्ना विभाग के टोल-फ्री नंबर 1800-121-3203 और 1800-180-5129 पर शिकायत दर्ज कराएं। एसएमएस के लिए सरकारी शॉर्टकोड 51969 भी उपलब्ध है।
  3. वसूली की निगरानी — हाईकोर्ट ने सभी जिलाधिकारियों से वसूली रिपोर्ट मांगी है। अपने जिले में रिकवरी सर्टिफिकेट की स्थिति जिला गन्ना अधिकारी कार्यालय से जानी जा सकती है।
  4. नए सत्र की तैयारी — पेराई 20 अक्टूबर से शुरू हो रही है; गन्ना सर्वे रिकॉर्ड, बैंक खाता और क्रय केंद्र की जानकारी पहले से दुरुस्त रखें।

जवाब जानिए

सुप्रीम कोर्ट के 6 अक्टूबर के आदेश का किसानों के लिए सीधा मतलब क्या है? सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार की अपील खारिज कर दी, यानी गन्ना बकाए पर 15% ब्याज और 14 दिन में भुगतान की बाध्यता बरकरार रहेगी। करीब ₹1,936 करोड़ के पुराने बकाए (₹1,087 करोड़ मूल + ₹849.5 करोड़ ब्याज) की वसूली का रास्ता साफ हुआ है।

क्या यह ₹2,000 करोड़ का पैसा किसानों को मिलेगा? यह पैसा उन वर्षों और मिलों से जुड़ा है जिनके खिलाफ वसूली प्रमाणपत्र जारी हैं। हाईकोर्ट के अनुसार ब्याज के नाम पर अब तक एक भी पैसा वसूल नहीं हुआ था — अब वसूली तेज करने के आदेश हैं। अपने बकाए की स्थिति अपने गन्ना समिति या जिला गन्ना अधिकारी से जांचें।

सरकार ने ब्याज कम करने की मांग क्यों की थी? सरकार का कहना था कि 15% ब्याज से कमजोर मिलें दिवालिया हो सकती हैं और मिलें बंद हुईं तो नुकसान किसानों का होगा। सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि 14 दिन का नियम और 15% ब्याज किसानों को कर्ज के जाल से बचाने वाली अनिवार्य सुरक्षा है।

क्या सरकार अब भी ब्याज माफ करवा सकती है? सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार और मिल एसोसिएशन को छूट दी है कि वे धारा 17(3) के तहत ब्याज में पुनर्विचार की मांग इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने रख सकते हैं। लेकिन जब तक हाईकोर्ट कोई नया आदेश नहीं देता, 15% ब्याज की बाध्यता पूरी तरह लागू है।

इस फैसले का नए पेराई सत्र (2026-27) पर क्या असर होगा? प्रत्यक्ष असर पुराने बकाए की वसूली पर है, लेकिन संदेश नए सत्र के लिए भी है — देरी पर 15% ब्याज अब कानूनी रूप से और मजबूत हो गया है। मिलें 20 अक्टूबर के आसपास पेराई शुरू कर रही हैं, इसलिए किसान समय पर भुगतान की मांग और मजबूती से रख सकते हैं।

स्रोत: द टाइम्स ऑफ इंडिया, मिरर नाउ, द बार बुलेटिन (सुप्रीम कोर्ट के 6 अक्टूबर 2026 के आदेश और इलाहाबाद हाईकोर्ट के 31 अगस्त 2026 के आदेश की रिपोर्टिंग के आधार पर)

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Aamir Raza
लेखक एवं मुख्य संपादक

Aamir Raza

संस्थापक एवं प्रधान संपादक — CaneUp.xyz। उत्तर प्रदेश गन्ना उद्योग, पर्ची कैलेंडर, SAP/MSP मूल्य नीति, ई-गन्ना पोर्टल और किसान अधिकारों पर 10+ वर्षों का जमीनी अनुभव।

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