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बलरामपुर चीनी मिल्स को ₹75 करोड़ का BioE3 अनुदान: यूपी के कुंभी में गन्ने से बनेगा बायोप्लास्टिक, 100 TPA R&D सेंटर से खुलेगा किसानों की खुशहाली का नया द्वार

Aamir Raza Aamir Raza • Sep 26, 2026 • 9 min read
बलरामपुर चीनी मिल्स को ₹75 करोड़ का BioE3 अनुदान: यूपी के कुंभी में गन्ने से बनेगा बायोप्लास्टिक, 100 TPA R&D सेंटर से खुलेगा किसानों की खुशहाली का नया द्वार
अंतिम अपडेट: September 26, 2026 8:35 AM IST — यह आर्टिकल नियमित रूप से अपडेट किया जाता है।

नई दिल्ली / लखनऊ: भारतीय चीनी उद्योग और हरित जैव-अर्थव्यवस्था (Green Bioeconomy) के इतिहास में एक युगांतकारी अध्याय जुड़ गया है। देश की अग्रणी एकीकृत चीनी उत्पादक कंपनी बलरामपुर चीनी मिल्स लिमिटेड (Balrampur Chini Mills Ltd - BCML) को भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) के अधीन कार्यरत बायोटेक्नोलॉजी इंडस्ट्री रिसर्च असिस्टेंस काउंसिल (BIRAC) से ₹75 करोड़ का बड़ा वित्तीय अनुदान प्राप्त हुआ है।

बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) को दी गई आधिकारिक विनियामक सूचना (Regulatory Filing) के अनुसार, इस अनुदान का उपयोग उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी स्थित कुंभी (Kumbhi) एकीकृत विनिर्माण परिसर में 100 टन प्रति वर्ष (TPA) क्षमता वाली अत्याधुनिक पॉली लैक्टिक एसिड (Poly Lactic Acid - PLA) को-पॉलिमर अनुसंधान एवं विकास (R&D) सुविधा स्थापित करने के लिए किया जाएगा।

यह अनुदान केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में शुरू की गई महत्वाकांक्षी BioE3 (Biotechnology for Economy, Environment & Employment) नीति के तहत स्वीकृत किया गया है। इसका सीधा उद्देश्य भारत को सिंगल-यूज पेट्रोलियम प्लास्टिक के प्रदूषण से मुक्ति दिलाना, गन्ने से 100% कंपोस्टेबल बायोप्लास्टिक बनाना और स्वदेशी बायोमैन्युफैक्चरिंग क्षमता को विश्वस्तरीय बनाना है। आइए इस ऐतिहासिक परियोजना, गन्ने से बायोप्लास्टिक बनने की वैज्ञानिक प्रक्रिया और उत्तर प्रदेश के लाखों गन्ना किसानों के जीवन पर इसके क्रांतिकारी प्रभाव का तथ्यपरक विश्लेषण करते हैं।


🏭 कुंभी परिसर (लखीमपुर खीरी): भारत का पहला एकीकृत बायोप्लास्टिक हब

बलरामपुर चीनी मिल्स की यह पायलट स्तर की R&D सुविधा उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के कुंभी स्थित चीनी मिल व डिस्टिलरी कॉम्प्लेक्स में स्थापित की जा रही है।

गौरतलब है कि इसी परिसर में कंपनी पहले से ही 80,000 टन प्रति वर्ष (TPA) क्षमता वाला भारत का पहला और सबसे बड़ा वाणिज्यिक पीएलए (Commercial PLA) विनिर्माण संयंत्र स्थापित कर रही है, जिसमें लगभग ₹2,000 करोड़ का भारी-भरकम पूंजी निवेश (CAPEX) किया जा रहा है।

🔬 100 TPA पायलट R&D केंद्र का तकनीकी दायरा और मुख्य लक्ष्य:

  1. अगली पीढ़ी के उन्नत PLA ग्रेड्स: पैकेजिंग, ऑटोमोटिव, टेक्सटाइल्स और मेडिकल ग्रेड के लिए उच्च तापीय स्थिरता (High Heat Resistance) वाले विशेष को-पॉलिमर विकसित करना।
  2. प्रयोगशाला से उद्योग तक का सेतु: लैब-स्केल रिसर्च और 80,000 TPA के विशाल वाणिज्यिक संयंत्र के बीच तकनीकी-आर्थिक आंकड़ों (Techno-Economic Data) को मान्य (Validate) करना।
  3. प्रौद्योगिकी का स्वदेशीकरण (Indigenous Tech): विदेशी पेटेंट और आयातित रेजिन पर निर्भरता समाप्त कर 100% भारतीय परिस्थितियों और घरेलू गन्ने के अनुरूप उत्पादन तकनीक विकसित करना।
  4. ग्राहक सत्यापन एवं सैंपल टेस्टिंग: एफएमसीजी (FMCG) और उपभोक्ता उद्योग की विशेष पैकेजिंग आवश्यकताओं के अनुसार पायलट सैंपल तैयार कर फील्ड ट्रायल पूरा करना।
  5. वैज्ञानिक व तकनीकी कौशल विकास: देश के युवा बायो-इंजीनियरों, शोधकर्ताओं और तकनीकी कर्मचारियों को विश्वस्तरीय बायो-पॉलिमर प्रोसेसिंग का व्यावहारिक प्रशिक्षण देना।

🧬 गन्ने से बायोप्लास्टिक (PLA) कैसे बनता है? आसान वैज्ञानिक प्रक्रिया

आम तौर पर प्लास्टिक कच्चे तेल (पेट्रोलियम क्रूड) के रासायनिक शोधन से बनता है, जिसे प्राकृतिक रूप से विघटित होने में 500 से 1,000 साल लग जाते हैं। इसके विपरीत, पॉली लैक्टिक एसिड (PLA) पूरी तरह पौधों (मुख्यतः गन्ने के रस व शीरे) से बनने वाला 100% बायोडिग्रेडेबल और कंपोस्टेबल बहुलक (Polymer) है।

गन्ना पेराई (खेत से मिल) 
       ↓ 
गन्ने का रस / बी-हैवी शीरा / सुक्रोज
       ↓ 
माइक्रोबियल फर्मेंटेशन (जीवाणु किण्वन) 
       ↓ 
लैक्टिक एसिड (Lactic Acid) 
       ↓ 
रिंग-ओपनिंग पॉलिमराइजेशन (Lactide से PLA) 
       ↓ 
100% कंपोस्टेबल बायोप्लास्टिक (PLA Grids & Co-polymers)

चरणबद्ध निर्माण प्रक्रिया:

  1. शर्करा निष्कर्षण (Sugar Extraction): गन्ने की पेराई के बाद प्राप्त सुक्रोज या स्टार्च को शुद्ध किया जाता है।
  2. बायोलॉजिकल फर्मेंटेशन (किण्वन): विशिष्ट बैक्टीरियल स्ट्रेन (जैसे Lactobacillus) की मदद से गन्ने की मिठास को लैक्टिक एसिड (Lactic Acid) में बदला जाता है।
  3. पॉलिमराइजेशन: लैक्टिक एसिड को पहले चक्रीय डाइमर ‘लैक्टाइड’ (Lactide) में बदला जाता है, फिर उत्प्रेरक की उपस्थिति में रिंग-ओपनिंग पॉलिमराइजेशन द्वारा लंबी आणविक श्रृंखलाओं वाला पॉली लैक्टिक एसिड (PLA) तैयार होता है।
  4. प्राकृतिक विघटन (Composting): इस बायोप्लास्टिक से बने चम्मच, कप, कैरी बैग या पैकेजिंग फिल्म जब उपयोग के बाद मिट्टी या कंपोस्टिंग पिट में डाले जाते हैं, तो यह 90 से 180 दिनों के भीतर पानी, बायोमास और कार्बन डाइऑक्साइड में बदल जाते हैं—पर्यावरण पर शून्य विषाक्त प्रभाव!

📊 तुलनात्मक अध्ययन: पारंपरिक पेट्रोलियम प्लास्टिक बनाम गन्ने का बायोप्लास्टिक (PLA)

मानक / गुणधर्मपारंपरिक पेट्रोलियम प्लास्टिक (PE/PP/PET)गन्ने से निर्मित PLA बायोप्लास्टिक
कच्चा माल (Feedstock)कच्चा तेल, नेफ्था, गैर-नवीकरणीय जीवाश्म ईंधनगन्ने का रस, शीरा, मक्का (100% नवीकरणीय कृषि उत्पाद)
कार्बन फुटप्रिंटअत्यधिक उच्च (ग्लोबल वार्मिंग और उत्सर्जन का बड़ा स्रोत)68% से 80% कम ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन
विघटन समय (Degradation)400 से 1,000 वर्ष (माइक्रोप्लास्टिक बनकर मिट्टी/पानी को जहरीला करता है)औद्योगिक कंपोस्टिंग में 3 से 6 महीने में 100% विघटित
खाद्य सुरक्षा (Food Grade)हानिकारक बीपीए (BPA) और थैलेट्स का रिसाव संभव100% बायो-कम्पैटिबल, नॉन-टॉक्सिक, चिकित्सा व खाद्य सुरक्षित
किसानों को लाभकेवल तेल रिफाइनरियों और विदेशी पेट्रोकेमिकल कंपनियों को लाभग्रामीण अर्थव्यवस्था और गन्ना किसानों को प्रत्यक्ष आय वृद्धि

👩‍💼 BCML नेतृत्व की प्रतिक्रिया: आत्मनिर्भर भारत की दिशा में ऐतिहासिक कदम

अनुदान की घोषणा पर अपनी आधिकारिक प्रतिक्रिया देते हुए बलरामपुर चीनी मिल्स लिमिटेड की कार्यकारी निदेशक (Executive Director) अवंतिका सराओगी ने कहा:

“भारत सरकार और डीबीटी-बिराक (DBT-BIRAC) द्वारा दिया गया ₹75 करोड़ का यह BioE3 अनुदान देश के सतत भविष्य में उन्नत बायोमैन्युफैक्चरिंग की अपरिहार्य भूमिका को प्रमाणित करता है। यह अत्याधुनिक R&D सुविधा न केवल भारत में अगली पीढ़ी की टिकाऊ सामग्रियों (Sustainable Materials) के स्वदेशी विकास को गति देगी, बल्कि हमारी वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमताओं को भी विश्व स्तर पर स्थापित करेगी। हम गन्ने के हर अंश को उच्च मूल्य वाले हरित उत्पादों में बदलने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं।”


🚜 उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों के लिए यह क्यों है सबसे बड़ी खुशखबरी?

उत्तर प्रदेश के लाखों गन्ना किसानों के लिए यह परियोजना किसी वरदान से कम नहीं है। पारंपरिक रूप से चीनी मिलों का कारोबार केवल सफेद चीनी (White Sugar) के उत्पादन और उसकी बाजार कीमतों पर निर्भर रहता था। जब चीनी के दाम गिरते थे, तो मिलों की तरलता (Liquidity) खत्म हो जाती थी और किसानों का गन्ना भुगतान महीनों तक अटक जाता था।

BCML का यह बायोप्लास्टिक मॉडल गन्ना किसानों के लिए 4 बड़े बदलाव लेकर आया है:

1. गन्ने की निरंतर और सुरक्षित मांग (De-risking Sugar Cycles)

बायोप्लास्टिक एक गैर-खाद्य (Non-food) औद्योगिक उत्पाद है, जिसकी वैश्विक मांग पैकेजिंग और प्रतिबंधों के चलते तेजी से बढ़ रही है। मिलें अब केवल चीनी के उतार-चढ़ाव पर निर्भर नहीं रहेंगी। गन्ने की खपत बायोप्लास्टिक, एथेनॉल और ग्रीन पावर में समान रूप से होगी, जिससे मिल का कैश फ्लो साल के 12 महीने मजबूत रहेगा।

2. समयबद्ध और सुरक्षित गन्ना भुगतान

उच्च मार्जिन वाले बायोप्लास्टिक (PLA का अंतरराष्ट्रीय बाजार मूल्य पारंपरिक चीनी से कई गुना अधिक होता है) के उत्पादन से मिलों की लाभप्रदता बढ़ेगी। इसका सीधा फायदा लखीमपुर खीरी, सीतापुर, गोंडा, बलरामपुर और बहराइच के किसानों को पारदर्शी व त्वरित गन्ना मूल्य भुगतान के रूप में मिलेगा।

3. बगास और शीरे की 100% वैल्यू-एडिशन

गन्ने की खोई (Bagasse) से बिजली बनती है, गन्ने के रस व बी-हैवी शीरे से एथेनॉल और लैक्टिक एसिड बनता है, और प्रेस-मड (Pressmud) से जैविक खाद बनती है। यानी गन्ने का एक भी कतरा व्यर्थ नहीं जाएगा, जिससे किसान के उत्पाद का प्रति क्विंटल मूल्य बढ़ेगा।

4. स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर

लखीमपुर खीरी के कुंभी जैसे ग्रामीण अंचल में विश्वस्तरीय बायोटेक आरएंडडी लैब और मेगा मैन्युफैक्चरिंग प्लांट बनने से स्थानीय युवाओं को ऑपरेटर, केमिस्ट, लॉजिस्टिक्स और सप्लाई-चेन में हजारों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिलेंगे।


📈 एक नज़र में: बलरामपुर चीनी मिल्स (BCML) का औद्योगिक साम्राज्य

बलरामपुर चीनी मिल्स देश की सबसे वित्तीय रूप से सशक्त और तकनीकी रूप से अग्रणी एग्री-बिजनेस कंपनियों में गिनी जाती है:

  • चीनी मिलों की संख्या: उत्तर प्रदेश में 10 अत्याधुनिक एकीकृत चीनी कारखाने।
  • गन्ना पेराई क्षमता: 80,000 टन प्रतिदिन (TCD) — राज्य के लाखों किसानों से सीधा जुड़ाव।
  • डिस्टिलरी क्षमता: 1,050 किलोलीटर प्रतिदिन (KLPD) — राष्ट्रीय एथेनॉल सम्मिश्रण कार्यक्रम (EBP) का मुख्य स्तंभ।
  • हरित विद्युत उत्पादन (Co-generation): 175.7 मेगावाट (MW) बिक्री योग्य हरित ग्रिड बिजली।
  • आगामी पीएलए क्षमता: कुंभी में 80,000 TPA वाणिज्यिक बायोप्लास्टिक प्लांट + 100 TPA BIRAC-समर्थित पायलट R&D यूनिट।

🇮🇳 भारत की BioE3 नीति और 2030 तक $300 बिलियन बायो-इकोनॉमी का लक्ष्य

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा अनुमोदित BioE3 (Biotechnology for Economy, Environment & Employment) नीति भारत को 21वीं सदी की जैव-क्रांति का वैश्विक केंद्र बनाने की रूपरेखा है।

  • मिशन 2030: भारत की जैव-अर्थव्यवस्था को वर्तमान के लगभग $130 बिलियन से बढ़ाकर $300 बिलियन तक पहुंचाना।
  • नेट जीरो 2070: जीवाश्म ईंधन (पेट्रोल-डीजल और क्रूड प्लास्टिक) की खपत को घटाकर भारत के शून्य कार्बन उत्सर्जन लक्ष्य को हासिल करना।
  • सर्कुलर बायो-इकोनॉमी: कृषि अवशेषों और गन्ने जैसी फसलों को आधुनिक उद्योगों का प्राथमिक कच्चा माल बनाकर किसानों की आय दोगुनी करना।

बलरामपुर चीनी का कुंभी प्रोजेक्ट इसी राष्ट्रीय विजन का सबसे पहला और सबसे ठोस जमीनी उदाहरण बन गया है।


❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

प्रश्न 1: बलरामपुर चीनी मिल्स को कितना अनुदान मिला है और किसने दिया है?

उत्तर: BCML को भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) के अंतर्गत कार्यरत स्वायत्त संस्थान ‘बायोटेक्नोलॉजी इंडस्ट्री रिसर्च असिस्टेंस काउंसिल’ (BIRAC) से ₹75 करोड़ का अनुदान स्वीकृत हुआ है।

प्रश्न 2: यह R&D सुविधा उत्तर प्रदेश में कहां स्थापित की जा रही है?

उत्तर: यह अनुसंधान एवं विकास (R&D) सुविधा उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जनपद स्थित बलरामपुर चीनी मिल्स के कुंभी (Kumbhi) एकीकृत औद्योगिक परिसर में स्थापित की जा रही है।

प्रश्न 3: गन्ने से बनने वाले PLA बायोप्लास्टिक की क्या खासियत है?

उत्तर: पीएलए (पॉली लैक्टिक एसिड) 100% पौधों (गन्ने) से बनता है, टॉक्सिन-मुक्त होता है और कचरा निपटान के दौरान औद्योगिक कंपोस्टिंग में महज 90 से 180 दिनों में पूरी तरह मिट्टी में मिलकर नष्ट हो जाता है।

प्रश्न 4: क्या इससे गन्ना किसानों का भुगतान और पर्ची कोटा प्रभावित होगा?

उत्तर: हां, बेहद सकारात्मक रूप से। बायोप्लास्टिक के उत्पादन से चीनी मिलों की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत होगी, जिससे किसानों के गन्ने की मांग में साल भर स्थिरता रहेगी और गन्ना मूल्य भुगतान समय पर बैंक खातों में पहुंचेगा।


🎯 निष्कर्ष: अन्नदाता अब बनेगा ‘प्लास्टिक-दाता’ और ‘ऊर्जा-दाता’

बलरामपुर चीनी मिल्स को मिला ₹75 करोड़ का यह BioE3 अनुदान केवल एक कॉर्पोरेट उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि भारत का गन्ना किसान अब केवल देश की मिठास और वाहनों के एथेनॉल का स्रोत नहीं रहा, बल्कि वह पर्यावरण को प्लास्टिक प्रदूषण के जहर से बचाने वाला ‘हरित क्रांति दूत’ भी बन चुका है।

जब लखीमपुर खीरी के कुंभी प्लांट से गन्ने से बना बायोप्लास्टिक पूरी दुनिया के बाजारों में पहुंचेगा, तो उसमें तराई के मेहनतकश गन्ना किसान का पसीना और भारत के वैज्ञानिकों की आत्मनिर्भर मेधा चमकेगी। कृषि और बायो-टेक्नोलॉजी से जुड़े ऐसे ही प्रमाणिक और तथ्यपरक विश्लेषणों के लिए CaneUp (caneup.xyz) के साथ जुड़े रहें!

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Aamir Raza
लेखक एवं मुख्य संपादक

Aamir Raza

संस्थापक एवं प्रधान संपादक — CaneUp.xyz। उत्तर प्रदेश गन्ना उद्योग, पर्ची कैलेंडर, SAP/MSP मूल्य नीति, ई-गन्ना पोर्टल और किसान अधिकारों पर 10+ वर्षों का जमीनी अनुभव।

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