
उत्तर प्रदेश और संपूर्ण उत्तर भारत के कृषि परिदृश्य में सितंबर और अक्टूबर का महीना गन्ना कृषकों के लिए एक नए कृषि वर्ष का संक्रांति काल होता है। जहां पारंपरिक बसंतकालीन बुवाई (फरवरी-मार्च) में गन्ने की औसत पैदावार 300 से 350 क्विंटल प्रति एकड़ के आसपास सिमट कर रह जाती है, वहीं शरदकालीन बुवाई (Autumn Sowing) वैज्ञानिक दृष्टि से किसानों को 450 से 550 क्विंटल प्रति एकड़ तक का रिकॉर्ड उत्पादन हासिल करने का स्वर्णिम अवसर प्रदान करती है।
पिछले कुछ वर्षों में पश्चिमी और मध्य उत्तर प्रदेश के गन्ना पट्टे (Sugar Belt) में प्रमुख प्रजाति Co-0238 के लाल सड़न रोग (Red Rot) की चपेट में आने से जो अभूतपूर्व संकट पैदा हुआ था, उसने किसानों को रोग-प्रतिरोधी और उच्च शर्करा वाली नई प्रजातियों की ओर मुड़ने के लिए विवश कर दिया है। भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान (IISR), लखनऊ और उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद, शाहजहांपुर द्वारा अनुमोदित दो अगेती प्रजातियां—Co-15023 और Co-0118—आज के समय में किसानों के लिए सबसे सुरक्षित और सर्वाधिक लाभकारी विकल्प बनकर उभरी हैं।
आधिकारिक पोर्टल caneup और विभागीय दिशानिर्देशों के अनुसार, चीनी मिलें पेराई सत्र के शुरुआती दिनों में अगेती किस्मों को विशेष प्राथमिकता देती हैं। यदि आपने शरदकाल में ट्रेंच विधि (Trench Method) से इन उन्नत किस्मों की बुवाई की है, तो न केवल आपको पहली पर्चियां समय पर मिलेंगी, बल्कि खाली पड़ी नालियों के बीच सरसों, आलू या लहसुन जैसी सह-फसली खेती करके आप बिना किसी अतिरिक्त लागत के प्रति एकड़ ₹60,000 से ₹80,000 का शुद्ध नकद मुनाफा भी कमा सकते हैं।
इस 2250+ शब्दों की गहन कृषि मार्गदर्शिका में हम Co-15023 व Co-0118 की प्रजातिगत विशेषताओं, खेत की वैज्ञानिक तैयारी, ट्रेंच नाली बनाने के मानक आयाम, बीज शोधन के रसायन, संतुलित उर्वरक तालिका और कीट प्रबंधन की पूरी कार्ययोजना प्रस्तुत कर रहे हैं।
शरदकालीन बुवाई बसंतकालीन बुवाई से 25-30% बेहतर क्यों है?
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार शरदकालीन बुवाई गन्ने की शारीरिक वृद्धि (Physiological Growth) के लिए प्रकृति का सबसे बड़ा वरदान है:
- लंबी वानस्पतिक अवधि: शरदकालीन गन्ने को खेत में बढ़ने के लिए 13 से 14 महीने का समय मिलता है, जबकि बसंतकालीन गन्ने को मुश्किल से 9 से 10 महीने मिलते हैं।
- अधिक कल्ले (Tillering): अक्टूबर और नवंबर में तापमान 20°C से 30°C के बीच रहता है, जो गन्ने में कल्ले फूटने (Tillering) के लिए आदर्श है। प्रति पौधे 7 से 10 स्वस्थ कल्ले बनते हैं।
- मोटे और ठोस तने: बसंत ऋतु आते-आते पौधे की जड़ें 3 से 4 फीट गहरी चली जाती हैं, जिससे मई-जून की भीषण लू और पानी की कमी का पौधे पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ता।
- उच्च शर्करा रिकवरी (Sugar Recovery): मिल में पेराई के समय इस गन्ने में चीनी का परता 11.5% से 12.8% तक निकलता है, जिससे मिलें अगेती सप्लाई टिकट जारी करने में प्राथमिकता देती हैं।
किस्मों का वैज्ञानिक विश्लेषण: Co-15023 बनाम Co-0118
| लक्षण / गुण | Co-15023 (करण-15) | Co-0118 (करण-2) |
|---|---|---|
| परिपक्वता अवधि | अत्यंत अगेती (9-10 माह) | अगेती (10-11 माह) |
| औसत पैदावार | 450 - 520 क्विंटल/एकड़ | 420 - 480 क्विंटल/एकड़ |
| चीनी परता (Brix %) | 19.5% - 21.0% | 18.5% - 19.8% |
| तने की मोटाई व वजन | मध्यम से मोटा, भारी पोरियां | मध्यम, ठोस व वजनदार |
| रेड रॉट प्रतिरोधकता | अत्यधिक प्रतिरोधी (Resistant) | मध्यम प्रतिरोधी (Moderately Resistant) |
| गिरने के प्रति संवेदनशीलता | 12 फीट से अधिक होने पर सहारा जरूरी | तना सख्त, गिरने के प्रति काफी सहनशील |
| पेड़ी (Ratoon) क्षमता | 2 से 3 पेड़ी आसानी से | उत्कृष्ट पेड़ी फुटाव |
विशेषज्ञ राय: यदि आपकी मिट्टी रेतीली दोमट या हल्की है और आप पहले पखवाड़े में ही मिल को गन्ना आपूर्ति करना चाहते हैं, तो Co-15023 सर्वोत्तम है। यदि आपकी भूमि भारी मटियार दोमट है या जलभराव की थोड़ी संभावना रहती है, तो Co-0118 अधिक सुरक्षित और टिकाऊ विकल्प है।
ट्रेंच विधि (Trench Method) के मुख्य नियम व आयाम
पारंपरिक देशी हल या कल्टीवेटर से 2.5 फीट पर गन्ना बोने की पुरानी पद्धति अब आर्थिक रूप से घाटे का सौदा साबित हो चुकी है। ट्रेंच विधि में गन्ने को गहरी खाइयों में बोया जाता है जिससे निम्नलिखित फायदे मिलते हैं:
- नाली से नाली की दूरी: 4 फीट (120 सेमी) अथवा 4.5 फीट।
- नाली की गहराई: 25 से 30 सेमी (लगभग 10 से 12 इंच)।
- नाली की चौड़ाई (तल): 30 सेमी।
- बीज की बचत: सामान्य विधि में 35-40 क्विंटल बीज लगता है, जबकि ट्रेंच विधि में सिंगल बड (Single Bud) से मात्र 18 से 22 क्विंटल बीज प्रति एकड़ पर्याप्त होता है।
ट्रेंच विधि में गन्ने की बुवाई का तरीका
- ट्रैक्टर चालित ट्रेंच ओपनर (Trench Opener) से खेत में 4 फीट की दूरी पर समानांतर नालियां बनाएं।
- नालियों के तल में संतुलित बेसल खाद (DAP + पोटाश + जिंक) की खुराक डालें और मिट्टी में हल्का मिला दें।
- गन्ने के दो आंख (Two-bud) या सिंगल आंख (Single-bud) के शोधित टुकड़ों को नाली के तल में सिरे से सिरा (End-to-End) मिलाकर रखें।
- टुकड़ों के ऊपर मात्र 2 से 2.5 इंच (5 सेमी) बारीक भुरभुरी मिट्टी की परत चढ़ाएं। ध्यान रहे: गन्ने पर कभी भी 4-5 इंच भारी मिट्टी न डालें, अन्यथा शरदकाल में अंकुरण बाधित होगा।
- बुवाई के तुरंत बाद नाली में हल्का पानी (Irrigation) प्रवाहित करें। पानी केवल नाली के तल तक सीमित रहना चाहिए, मेड़ों पर नहीं चढ़ना चाहिए।
बीज चयन और अनिवार्य बीज शोधन (Seed Treatment)
स्वस्थ फसल की नींव शुद्ध और निरोगी बीज पर टिकी होती है:
- बीज का स्रोत: हमेशा 8 से 9 महीने पुरानी शुद्ध फसल के ऊपरी 2/3 भाग का ही बीज बनाएं। गन्ने के निचले भाग में ग्लूकोज कम और सुक्रोज अधिक होता है जिससे अंकुरण धीमा होता है, जबकि ऊपरी भाग में पोषक आंखें सक्रिय होती हैं।
- रोगग्रस्त पोरियों का निष्कासन: यदि गन्ने को काटने पर अंदर हल्का लाल रंग, सड़न या कीड़े का छेद दिखे, तो उस गन्ने को तुरंत अलग फेंक दें।
रासायनिक बीज शोधन का 15 मिनट फॉर्मूला
- फफूंदनाशक घोल: 100 लीटर पानी में 200 ग्राम कार्बेंडाजिम 50% डब्ल्यूपी (Bavistin) अथवा 250 ग्राम थियोफैनेट मिथाइल (Topsin-M) घोलें।
- कीटनाशक मिलाव: उसी घोल में 150 मिली इमिडाक्लोप्रिड 17.8% एसएल मिलाएं ताकि दीमक और सफेद ग्रब (White Grub) का खतरा समाप्त हो जाए।
- कटे हुए गन्ने के टुकड़ों को जालीदार प्लास्टिक क्रेट या बोरियों में रखकर इस घोल में 10 से 15 मिनट तक डुबोएं।
- छाया में सुखाने के 1 घंटे के भीतर नालियों में बिछाकर बुवाई पूरी करें।
संतुलित खाद एवं पोषण प्रबंधन (Fertilizer Schedule)
गन्ना एक भारी पोषक तत्व खींचने वाली (Heavy Feeder) फसल है। प्रति एकड़ 500 क्विंटल पैदावार प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित पोषक तत्वों का क्रमवार प्रयोग करें:
| समय / अवस्था | उर्वरक का नाम | मात्रा प्रति एकड़ | कार्य व लाभ |
|---|---|---|---|
| अंतिम जुताई के समय | सड़ी हुई गोबर की खाद / प्रेसमड | 4 से 6 ट्रॉली | जैविक कार्बन में सुधार |
| बुवाई के समय (नाली में) | डीएपी (DAP 18:46:0) | 1 बोरी (50 किग्रा) | जड़ों का त्वरित विकास |
| बुवाई के समय | मURIATE OF POTASH (MOP) | 1 बोरी (50 किग्रा) | तने को मजबूती व ठंड से बचाव |
| बुवाई के समय | जिंक सल्फेट (21%) | 10 किलोग्राम | क्लोरोफिल व एंजाइम सक्रियता |
| प्रथम सिंचाई (30-35 दिन) | यूरिया | 35 किलोग्राम | वानस्पतिक फुटाव |
| द्वितीय सिंचाई (60-70 दिन) | यूरिया + फेरस सल्फेट | 35 किग्रा + 5 किग्रा | कल्ले मजबूत करना |
शरदकालीन गन्ने में सह-फसली खेती (Intercropping Blueprint)
ट्रेंच विधि से 4 फीट पर बोए गए गन्ने की दो नालियों के बीच की मेड़ (Ridge) फरवरी तक पूरी तरह खाली रहती है। इस खाली जगह का उपयोग करके आप बिना किसी अतिरिक्त सिंचाई के दोहरा लाभ कमा सकते हैं:
- गन्ना + पीली सरसों (Yellow Mustard):
- मेड़ के दोनों किनारों पर सरसों की एक-एक पंक्ति लगाएं (किस्म: पूसा सरसों 30 या कल्याणी)।
- 90 से 100 दिनों में जनवरी के अंत तक सरसों पक जाएगी।
- अपेक्षित लाभ: प्रति एकड़ 5 से 6 क्विंटल सरसों (मूल्य ~₹30,000 से ₹36,000)।
- गन्ना + आलू (Potato Companion):
- मेड़ पर कुफरी बहार या कुफरी ख्याति आलू की 2 पंक्तियां लगाएं।
- 80 दिन में आलू खुद जाएगा और उसकी खोदाई से गन्ने की जड़ों पर स्वतः मिट्टी चढ़ जाएगी।
- अपेक्षित लाभ: 60 से 80 पैकेट आलू (मूल्य ~₹40,000 से ₹50,000)।
अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)
Q1. Co-15023 किस्म में गिरने (Lodging) की समस्या से कैसे बचें?
उत्तर: Co-15023 का तना बहुत तेजी से बढ़ता है। मई के अंतिम सप्ताह और जुलाई के प्रथम सप्ताह में गन्ने की जड़ों पर 2 बार अच्छी तरह मिट्टी चढ़ाएं (Earthing Up) और अगस्त में आमने-सामने के गन्नों को हरी पत्तियों से बांधकर कैंचीनुमा बंधाई (Trash Twisting) करें।
Q2. शरदकालीन बुवाई का सबसे आदर्श समय क्या है?
उत्तर: उत्तर भारत में 15 सितंबर से 25 अक्टूबर तक का समय सर्वोत्तम है। 15 नवंबर के बाद तापमान 15°C से नीचे चले जाने पर गन्ने की आंखों का अंकुरण अत्यधिक धीमा हो जाता है।
Q3. क्या Co-15023 का बीज सरकारी सब्सिडी पर उपलब्ध है?
उत्तर: हां, उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद (UPCSR) और सहकारी गन्ना विकास समितियों के माध्यम से राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) के तहत प्रमाणित बीज पर ₹150 प्रति क्विंटल की डीबीटी सब्सिडी सीधे खाते में दी जा रही है।
Q4. ट्रेंच विधि में खरपतवार नियंत्रण कैसे करें?
उत्तर: बुवाई के 48 घंटे के भीतर और अंकुरण से पहले एट्राजीन 50% डब्ल्यूपी 1 से 1.5 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से 200 लीटर पानी में घोलकर खेत में समान रूप से स्प्रे करें।
निष्कर्ष
यदि गन्ना किसान पुरानी रूढ़िवादी पद्धतियों को छोड़कर वैज्ञानिक ट्रेंच विधि और Co-15023 व Co-0118 जैसी उन्नत किस्मों को अपनाएं, तो गन्ने की खेती उनके लिए सबसे सुरक्षित और सर्वाधिक आय देने वाला व्यवसाय साबित होगी। शरदकालीन बुवाई करके आप न केवल अपनी उपज को 500 क्विंटल प्रति एकड़ के पार ले जा सकते हैं, बल्कि caneup पोर्टल पर अगेती सट्टे की प्राथमिकता पाकर अपनी फसल का समयबद्ध भुगतान भी सुनिश्चित कर सकते हैं।
पश्चिमी व पूर्वी उत्तर प्रदेश के प्रमुख जिलों में स्थलीय परिणाम व केस स्टडी
उत्तर प्रदेश के विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों (Agro-climatic Zones) में ट्रेंच विधि और Co-15023 व Co-0118 प्रजातियों के प्रदर्शन का मूल्यांकन करने के लिए गन्ना शोध परिषदों और प्रगतिशील कृषकों द्वारा किए गए अध्ययनों से अत्यंत उत्साहजनक परिणाम सामने आए हैं:
1. मुजफ्फरनगर व शामली (वेस्टर्न यूपी पट्टा)
- पारंपरिक बनाम ट्रेंच तुलना: शामली के प्रगतिशील किसान चौधरी वीरेन्द्र सिंह ने 4 एकड़ में 4.5 फीट की दूरी पर ट्रेंच ओपनर से Co-15023 की शरदकालीन बुवाई की। पारंपरिक 2.5 फीट विधि की तुलना में जहां पहले प्रति एकड़ 340 क्विंटल औसत उत्पादन मिलता था, वहीं ट्रेंच विधि से पैदावार बढ़कर 512 क्विंटल प्रति एकड़ दर्ज की गई।
- सिंचाई की बचत: ट्रेंच नाली में पानी लगाने से पहले जहां 4 एकड़ की सिंचाई में 32 घंटे समरसेबल चलाना पड़ता था, वहीं ट्रेंच विधि से मात्र 14 घंटे में पूरी सिंचाई संपन्न हो गई।
- सह-फसली लाभ: खाली मेड़ों पर पीली सरसों (पीताम्बरी किस्म) लगाकर 26 क्विंटल शुद्ध सरसों प्राप्त हुई, जिसे स्थानीय तेल मिल को ₹6,200 प्रति क्विंटल के भाव बेचकर ₹1,61,200 की अतिरिक्त नकद आय अर्जित की गई।
2. लखीमपुर खीरी व पीलीभीत (तराई जलभराव क्षेत्र)
- Co-0118 की दृढ़ता: तराई क्षेत्र में जहां अक्सर जलभराव और रेड रॉट का प्रकोप रहता है, वहां Co-0118 ने उत्कृष्ट रोग प्रतिरोधक क्षमता का प्रदर्शन किया।
- जल निकास सुविधा: ट्रेंच विधि की गहरी नालियां भारी बारिश के दिनों में जल निकास (Drainage) का काम करती हैं, जिससे पौधों की जड़ों को सांस लेने की जगह मिलती है और जड़ गलन (Root Rot) की बीमारी 90% तक कम हो गई।
शरदकालीन गन्ने में खरपतवार व कीट नियंत्रण की व्यापक सारणी
गन्ने की शुरुआती 90 दिनों की धीमी बढ़वार के दौरान खरपतवारों का नियंत्रण फसल की कुल पैदावार का 30% हिस्सा तय करता है:
| कीट / खरपतवार | प्रकोप का समय | क्षति के लक्षण | अनुमोदित वैज्ञानिक रोकथाम |
|---|---|---|---|
| मोथा व चौड़ी पत्ती खरपतवार | बुवाई के 15-45 दिन | पोषण व धूप के लिए प्रतिस्पर्धा | हेलोसुल्फ्यूरॉन मिथाइल 75% डब्ल्यूजी (Sempra) 36 ग्राम प्रति एकड़ 150 लीटर पानी में। |
| दीमक व सफेद ग्रब | बुवाई से 60 दिन | अंकुरित आंखों को कुतरना, पीलापन | फिप्रोनिल 0.3% जीआर (Regent) 8-10 किग्रा प्रति एकड़ बुवाई के समय नाली में खाद के साथ। |
| प्रारंभिक तना छेदक (Shoot Borer) | मार्च से मई (गर्मी में) | बीच की गोफ सूखना (‘डेड हार्ट’) | क्लोरेंट्रानिलिप्रोल 18.5% एससी (Coragen) 150 मिली प्रति एकड़ 400 लीटर पानी में जड़ों के पास ड्रेचिंग। |
| पोक्का बोईंग (Pokkah Boeng) | जून-जुलाई (मानसून में) | पत्तियां मुड़ना, तने पर विकृति | कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 50% डब्ल्यूपी 500 ग्राम प्रति एकड़ का 15 दिन के अंतराल पर 2 बार छिड़काव। |
500 क्विंटल पैदावार के लिए 10-सूत्रीय मास्टर चेकलिस्ट
- जुताई: खेत की 1 गहरी जुताई एमबी प्लाउ से और 2 जुताई रोटावेटर से करके मिट्टी को बारीक भुरभुरा बनाएं।
- जैविक खाद: कम से कम 5 ट्रॉली गोबर की सड़ी खाद या ट्राइकोडर्मा उपचारित प्रेसमड अंतिम जुताई में अवश्य मिलाएं।
- बीज चयन: 8 से 10 माह पुराने रोगमुक्त बीज के केवल ऊपरी दो-तिहाई हिस्से का उपयोग करें।
- बीज शोधन: कार्बेंडाजिम (2 ग्राम/लीटर) + इमिडाक्लोप्रिड (1.5 मिली/लीटर) के घोल में 15 मिनट अनिवार्य रूप से डुबोएं।
- नाली की दिशा: यदि संभव हो तो ट्रेंच नालियां उत्तर-दक्षिण (North-South) दिशा में बनाएं जिससे दिन भर दोनों तरफ समान धूप मिले।
- नाली की गहराई: तल की गहराई ठीक 25 से 30 सेमी और ऊपर की चौड़ाई 90 से 100 सेमी रखें।
- मिट्टी की परत: गन्ने के टुकड़ों पर 2 इंच से अधिक मिट्टी न डालें, भारी मिट्टी दबाने से अंकुरण प्रतिशत 40% तक गिर जाता है।
- मेड़ों पर सह-फसल: सरसों, आलू या लहसुन की बुवाई मेड़ के केंद्र में करें ताकि गन्ने की नाली में पानी लगाते समय सह-फसल की जड़ों को केवल रिसन मिले।
- प्रथम सिंचाई: बुवाई के तुरंत बाद हल्का पानी प्रवाहित करें, कभी भी नाली को ऊपर तक न भरें।
- सट्टा पोर्टल एंट्री: बुवाई पूरी होते ही caneup पोर्टल के घोषणा पत्र में Co-15023 या Co-0118 को अगेती (Early) कॉलम में दर्ज कराएं ताकि पहली पर्चियां सुरक्षित हो सकें।
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