
उत्तर प्रदेश में गन्ना बुवाई के दो मुख्य सीजन होते हैं — शरदकालीन (अक्टूबर-नवंबर) और बसंतकालीन (फरवरी-मार्च)। शरदकालीन बुवाई के फायदे अपनी जगह हैं, लेकिन हकीकत यह है कि यूपी के 60% से ज्यादा गन्ना किसान बसंतकालीन बुवाई ही करते हैं। वजह सीधी है: गेहूं, सरसों या आलू की फसल कटने के बाद खेत फरवरी में खाली होता है, और उसी खेत में गन्ना बोना सबसे व्यावहारिक विकल्प बनता है।
लेकिन यहीं सबसे बड़ी चूक भी होती है। बहुत से किसान बसंतकालीन बुवाई को “बची-खुची” बुवाई मानकर चलते हैं — बीज पुरानी पेड़ी से काट लिया, खाद आधी डाली, सिंचाई भगवान भरोसे। नतीजा: उपज 250 क्विंटल प्रति एकड़ पर अटक जाती है, जबकि सही योजना से बसंतकालीन गन्ना भी 350 से 400 क्विंटल प्रति एकड़ तक उपज दे सकता है। इस गाइड में फरवरी-मार्च 2027 की बुवाई के लिए पूरा 8-स्टेप प्लान दिया गया है — किस्म के चुनाव से लेकर पहली सिंचाई तक।
स्टेप 1 — बुवाई का सही समय पकड़ें: 15 फरवरी से 31 मार्च
बसंतकालीन बुवाई में समय ही सबसे बड़ा खाद है। मिट्टी का तापमान जब 20 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंचता है, तभी गन्ने की आंख (बड) तेजी से फूटती है। यूपी के मैदानी इलाकों में यह स्थिति आमतौर पर फरवरी के दूसरे सप्ताह के बाद बनती है।
- आदर्श समय: 15 फरवरी से 31 मार्च
- जल्दी बुवाई (फरवरी): अंकुरण थोड़ा धीमा लेकिन फसल को लंबा बढ़वार काल मिलता है — उपज ज्यादा
- देर से बुवाई (अप्रैल): हर 15 दिन की देरी से उपज में 8-10% तक की गिरावट देखी गई है
अगर आपका खेत गेहूं के बाद खाली हो रहा है, तो गेहूं कटते ही 7-10 दिन के अंदर बुवाई की तैयारी शुरू कर दें। खेत को खाली पड़ा छोड़ने से नमी उड़ जाती है और बुवाई में देरी होती है।
स्टेप 2 — किस्म का चुनाव: पुरानी Co 0238 से आगे बढ़ें
बसंतकालीन बुवाई में किस्म का चुनाव शरदकालीन से भी ज्यादा अहम है, क्योंकि फसल को गर्मी का लंबा मौसम झेलना पड़ता है। 2027 की बुवाई के लिए इन किस्मों पर विचार करें:
| किस्म | खासियत | उपयुक्तता |
|---|---|---|
| Co 0118 | अगेती पकने वाली, चीनी प्रतिशत अच्छा | बसंतकालीन के लिए बेहतरीन |
| Co 15023 | अधिक उपज, रोग प्रतिरोधी | नई सिफारिश, बीज उपलब्धता जांचें |
| CoS 17231 | Co 0238 का विकल्प, लाल सड़न से बचाव | पूर्वी यूपी में अच्छा प्रदर्शन |
| CoS 13235 | सूखा सहनशीलता बेहतर | कम सिंचाई वाले क्षेत्रों के लिए |
| CoLK 16202 | मध्य यूपी के लिए उपयुक्त | स्थिर उपज |
एक जरूरी सलाह: अगर आप अब भी Co 0238 बो रहे हैं, तो 2027 की बुवाई से पहले बीज बदलाव की योजना बनाएं। इस किस्म में लाल सड़न (रेड रॉट) का खतरा बढ़ गया है। नई किस्म का बीज अपने नजदीकी गन्ना विकास केंद्र या कृषि विज्ञान केंद्र से बुक कराएं — अक्टूबर-नवंबर में ही बीज की व्यवस्था कर लेना समझदारी है, क्योंकि बुवाई के समय अच्छा बीज मिलना मुश्किल हो जाता है।
स्टेप 3 — बीज की तैयारी: 25-30 क्विंटल प्रति एकड़ का हिसाब
बीज गन्ना फसल की नींव है। बसंतकालीन बुवाई में बीज दर का सही हिसाब इस प्रकार है:
- बीज दर: 25 से 30 क्विंटल प्रति एकड़ (तीन-आंख वाले टुकड़े)
- बीज का चुनाव: 8-10 महीने की स्वस्थ फसल से, रोग-मुक्त, मोटे और रसीले गन्ने
- टुकड़े की लंबाई: हर टुकड़े में 3 आंखें हों, कटाई तेज धार वाले औजार से करें
- बीज उपचार: बुवाई से पहले टुकड़ों को फफूंदनाशी घोल में उपचारित करें — मात्रा के लिए कृषि विशेषज्ञ/कृषि विज्ञान केंद्र से सलाह लें
बीज को धूप में सुखाकर न रखें। कटे हुए टुकड़ों को छांव में रखें और 24-48 घंटे के अंदर बुवाई कर दें, वरना आंखों की अंकुरण क्षमता घटने लगती है। पुरानी पेड़ी (रटून) की फसल से बीज लेने से बचें — उसमें रोग का खतरा ज्यादा होता है।
स्टेप 4 — खेत की तैयारी: गहरी जुताई और समतलीकरण
गेहूं या सरसों के बाद खेत में फसल अवशेष रह जाते हैं। बुवाई से पहले खेत की तैयारी इस क्रम में करें:
- पहली जुताई: मिट्टी पलटने वाले हल से 20-25 सेमी गहरी जुताई
- गोबर की खाद: 8-10 टन प्रति एकड़ (उपलब्धता अनुसार) जुताई के समय मिलाएं
- दूसरी जुताई: कल्टीवेटर से 2 बार आड़ी-तिरछी जुताई
- समतलीकरण: लेजर लेवलर या पटेला से खेत समतल करें — असमतल खेत में सिंचाई का पानी एक जैसा नहीं पहुंचता
- कूंड बनाना: 75 से 90 सेमी की दूरी पर कूंड (फरो) बनाएं
बसंतकालीन बुवाई में 90 सेमी (3 फीट) की कतार दूरी सबसे व्यावहारिक मानी जाती है — इसमें निराई-गुड़ाई, खाद डालना और सिंचाई सभी आसान होते हैं। जिन किसानों के पास ट्रेंच ओपनर है, वे 4 फीट की ट्रेंच विधि भी अपना सकते हैं, जिसमें अंतरवर्तीय फसल की गुंजाइश ज्यादा मिलती है।
स्टेप 5 — खाद का कैलेंडर: एक बार में नहीं, किस्तों में
बसंतकालीन गन्ने की सबसे आम गलती है — सारी खाद बुवाई के समय डाल देना। गन्ना 12 महीने की फसल है; खाद भी उसी हिसाब से किस्तों में दें। नीचे प्रति एकड़ का सामान्य कैलेंडर दिया गया है:
| समय | खाद | मात्रा (प्रति एकड़, अनुमानित) |
|---|---|---|
| बुवाई के समय (बेसल) | डीएपी + पोटाश | डीएपी 50-60 किलो, पोटाश 25-30 किलो |
| बुवाई के 30-45 दिन बाद | यूरिया (पहली किस्त) | 40-45 किलो |
| बुवाई के 90-100 दिन बाद (कल्ले निकलते समय) | यूरिया (दूसरी किस्त) | 40-45 किलो |
| मिट्टी चढ़ाते समय (जुलाई-अगस्त) | यूरिया (तीसरी किस्त) + पोटाश | 25-30 किलो यूरिया |
जिंक की कमी पर ध्यान दें: यूपी की बहुत सी मिट्टियों में जिंक की कमी है, जिससे पत्तियां पीली पड़ती हैं और कल्ले कम निकलते हैं। मिट्टी परीक्षण कराकर जिंक सल्फेट की जरूरत तय करें।
जरूरी नोट: ऊपर दी गई मात्राएं सामान्य सिफारिशें हैं — आपकी मिट्टी की जांच रिपोर्ट के अनुसार मात्रा घट-बढ़ सकती है। बुवाई से पहले मिट्टी परीक्षण जरूर कराएं और अंतिम मात्रा के लिए कृषि विशेषज्ञ/कृषि विज्ञान केंद्र से सलाह लें।
स्टेप 6 — सिंचाई का शेड्यूल: गर्मी में पानी की मार न पड़े
बसंतकालीन गन्ने को अप्रैल से जून की भीषण गर्मी में बढ़ना होता है — यही इसकी सबसे बड़ी चुनौती और सबसे बड़ा मौका दोनों है। समय पर सिंचाई मिले तो गर्मी में गन्ना तेजी से बढ़ता है।
- पहली सिंचाई: बुवाई के तुरंत बाद — कूंड में हल्की सिंचाई, बीज बहने न पाए
- अंकुरण तक: मिट्टी में नमी बनी रहे; जरूरत हो तो 7-10 दिन पर हल्की सिंचाई
- अप्रैल-जून: हर 10-12 दिन पर सिंचाई — गर्मी में अंतराल न बढ़ाएं
- बरसात में: जलभराव से बचाएं; खेत से अतिरिक्त पानी निकालने की व्यवस्था रखें
- अक्टूबर के बाद: 15-20 दिन के अंतराल पर सिंचाई पर्याप्त
ड्रिप सिंचाई लगाने वाले किसानों को बसंतकालीन बुवाई में दोगुना फायदा मिलता है — गर्मी में पानी की बचत और फर्टिगेशन से खाद की बचत। यूपी में ड्रिप पर 80-90% तक अनुदान की योजनाएं चल रही हैं; बुवाई से पहले आवेदन कर दें।
स्टेप 7 — खरपतवार और कीट-रोग: पहले 100 दिन निर्णायक
बुवाई के बाद पहले 100 दिन फसल की दिशा तय करते हैं। इस दौरान दो मोर्चों पर ध्यान दें:
खरपतवार नियंत्रण:
- बुवाई के 25-30 दिन बाद पहली निराई-गुड़ाई
- बुवाई के 45-60 दिन बाद दूसरी निराई
- खरपतवारनाशी का प्रयोग करना हो तो कृषि विशेषज्ञ की सलाह से सही दवा और सही समय चुनें — मात्रा के लिए कृषि विशेषज्ञ/कृषि विज्ञान केंद्र से सलाह लें
कीट-रोग से बचाव:
- दीमक/सफेद गिडार: बुवाई के समय कूंड में दानेदार कीटनाशक का प्रयोग विशेषज्ञ की सलाह से करें
- अंकुर बेधक (शूट बोरर): अप्रैल-मई में सूखी पत्ती जैसी “डेड हार्ट” दिखे तो प्रभावित कल्ले निकालकर नष्ट करें
- लाल सड़न: बीज उपचार और रोग-प्रतिरोधी किस्म ही असली बचाव है; रोग दिखे तो कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क करें
स्टेप 8 — अंतरवर्तीय फसल: खाली कतारों से अतिरिक्त आमदनी
बसंतकालीन बुवाई में कतारों के बीच 90 सेमी की जगह 60-70 दिनों तक खाली रहती है। इस जगह में छोटी अवधि की फसल लेकर अतिरिक्त आमदनी पाई जा सकती है:
- मूंग/उड़द: 60-65 दिन की फसल, मिट्टी में नाइट्रोजन भी बढ़ाती है
- भिंडी/लौकी: सब्जी वाली अंतरवर्तीय फसल से नकद आमदनी
- प्याज/लहसुन: रबी की बची फसल के रूप में कतारों में
एक सावधानी: अंतरवर्तीय फसल ऐसी चुनें जो गन्ने की बढ़वार में बाधा न बने और 70 दिन के अंदर कट जाए। लंबी अवधि की फसल गन्ने के कल्लों को दबा देती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सवाल: बसंतकालीन बुवाई के लिए सबसे अच्छी किस्म कौन सी है? जवाब: Co 0118, Co 15023 और CoS 17231 बसंतकालीन बुवाई के लिए अच्छी मानी जाती हैं। Co 0238 से धीरे-धीरे बाहर निकलने की सलाह दी जाती है क्योंकि उसमें लाल सड़न का खतरा बढ़ा है। अपने क्षेत्र के गन्ना विकास केंद्र से स्थानीय सिफारिश जरूर लें।
सवाल: फरवरी में बुवाई छूट जाए तो क्या अप्रैल में बो सकते हैं? जवाब: बो तो सकते हैं, लेकिन हर 15 दिन की देरी से उपज में 8-10% की गिरावट आती है। अप्रैल बुवाई में गर्मी का तनाव भी ज्यादा पड़ता है, इसलिए सिंचाई का पक्का इंतजाम करके ही देर से बुवाई करें।
सवाल: एक एकड़ में कितना बीज लगेगा? जवाब: तीन-आंख वाले टुकड़ों से बुवाई पर 25 से 30 क्विंटल बीज प्रति एकड़ लगता है। बडचिप नर्सरी विधि से यह मात्रा काफी कम की जा सकती है।
सवाल: क्या बसंतकालीन गन्ने में भी 400 क्विंटल उपज संभव है? जवाब: हां, संभव है — बशर्ते समय पर बुवाई, सही किस्म, किस्तों में खाद और गर्मी में नियमित सिंचाई हो। लापरवाही वाली फसल 250 क्विंटल पर अटकती है, योजनाबद्ध फसल 350-400 क्विंटल देती है।
सवाल: गन्ने के साथ मूंग बोने से गन्ने को नुकसान तो नहीं? जवाब: नहीं, अगर मूंग 60-65 दिन में कट जाए। दलहनी फसल मिट्टी में नाइट्रोजन बढ़ाती है, जिससे गन्ने को फायदा ही होता है। बस फसल 70 दिन से ज्यादा खेत में न रहे।
यह गाइड सामान्य कृषि सिफारिशों पर आधारित है। अपने खेत की मिट्टी, पानी और मौसम के अनुसार अंतिम निर्णय के लिए नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या गन्ना विकास केंद्र के विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें।
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