
अधिकांश भारतीय गन्ना किसान यह मानते हैं कि केवल भारी मात्रा में यूरिया (नाइट्रोजन), डीएपी (फॉस्फोरस) और पोटाश डाल देने से ही गन्ने की बंपर पैदावार हासिल की जा सकती है। लेकिन खेत में बोरियों के ढेर लगाने के बावजूद कई बार देखा जाता है कि गन्ने की मोटाई नहीं बढ़ती, पत्तियां हल्की पीली या सफेद धारियों वाली रह जाती हैं, अगोला छोटा हो जाता है और गन्ने में पोरियों की लंबाई रुक जाती है। इस गंभीर समस्या का मुख्य कारण मिट्टी में सूक्ष्म पोषक तत्वों (Micronutrients - जिंक, आयरन, बोरॉन, मैंगनीज) और द्वितीयक पोषक तत्व (सल्फर) की भारी कमी होना है।
उत्तर प्रदेश कृषि विभाग द्वारा सॉयल हेल्थ कार्ड (Soil Health Card) के 20 लाख नमूनों के विश्लेषण में पाया गया है कि पश्चिमी और मध्य उत्तर प्रदेश की 72% उपजाऊ मिट्टी में जिंक (Zinc), 58% मिट्टी में सल्फर (Sulfur) और 45% मिट्टी में लोहा (Iron) की गंभीर कमी हो चुकी है। सूक्ष्म पोषक तत्व यद्यपि पौधे को ग्रामों में चाहिए होते हैं, लेकिन ये पौधे के भीतर भोजन बनाने वाले एंजाइमों और क्लोरोफिल के मुख्य उत्प्रेरक (Catalyst) होते हैं। यदि जिंक या बोरॉन की कमी है, तो पौधा डाली गई 100 किग्रा यूरिया में से 40 किग्रा भी नहीं पचा पाता।
इस 2200+ शब्दों के वैज्ञानिक गाइड में हम गन्ने में सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी के सचित्र लक्षण, जमीन में देने वाले बेसल डोज और पत्तियों पर पर्णीय छिड़काव (Foliar Spray Chart 2026) का संपूर्ण प्रामाणिक कैलेंडर प्रस्तुत कर रहे हैं।
4 प्रमुख पोषक तत्वों की कमी के लक्षण कैसे पहचानें?
जब गन्ने के पौधे में किसी तत्व की कमी होती है, तो पत्तियां अपनी भाषा में संकेत देती हैं:
| पोषक तत्व | पौधे में मुख्य कार्य | कमी होने पर दिखने वाले स्पष्ट लक्षण |
|---|---|---|
| जिंक (Zinc - Zn) | क्लोरोफिल निर्माण और ऑक्सिन (वृद्धि हार्मोन) का संश्लेषण। | पत्तियों की मुख्य नस (Midrib) के दोनों तरफ चौड़ी सफेद या हल्की पीली पट्टियां (White Bud) बन जाती हैं। गन्ने की गांठें बहुत पास-पास आ जाती हैं। |
| लोहा (Iron - Fe) | प्रकाश संश्लेषण में इलेक्ट्रॉन ट्रांसफर और श्वसन क्रिया। | पौधे की सबसे ऊपरी नई पत्तियां शिराओं के बीच से बिल्कुल सफेद या कागज जैसी पीली पड़ जाती हैं (Iron Chlorosis)। |
| बोरॉन (Boron - B) | शर्करा (Sugar/Sucrose) का पत्तियों से तने में स्थानांतरण, कोशिका विभाजन। | गन्ने की नई पत्तियों की बनावट विकृत (Curled) हो जाती है। तने पर अंदरूनी दरारें (Internal Cracks) और खोखलापन आने लगता है। |
| सल्फर (Sulfur - S) | प्रोटीन और अमीनो एसिड का निर्माण, रस की गुणवत्ता। | पूरी फसल का रंग हल्का पीला पड़ जाता है (पुरानी पत्तियां हरी रहती हैं लेकिन नई पत्तियां पीली होती हैं)। गन्ने का वजन घट जाता है। |
जमीन में देने योग्य बेसल डोज (Basal Application Chart)
बुवाई के समय या पेड़ी की पहली जुताई के समय सूक्ष्म पोषक तत्वों को सीधे मिट्टी में मिलाना सबसे टिकाऊ तरीका है:
- जिंक सल्फेट (Zinc Sulfate 21%): 10 किग्रा प्रति एकड़ या जिंक सल्फेट मोनोहाइड्रेट (33%): 6 से 7 किग्रा प्रति एकड़।
- अति महत्वपूर्ण नियम: जिंक सल्फेट को कभी भी डीएपी (DAP) या सिंगल सुपर फॉस्फेट (SSP) के साथ मिलाकर न डालें। फॉस्फेट और जिंक आपस में क्रिया करके अघुलनशील ‘जिंक फॉस्फेट’ बना लेते हैं, जिससे दोनों खादें बेकार हो जाती हैं। जिंक को हमेशा बुवाई से 10 दिन पहले या बुवाई के 30 दिन बाद यूरिया के साथ दें।
- बेंटोनाइट सल्फर (Bentonite Sulfur 90% दाल रूपी): 10 किग्रा प्रति एकड़। यह मिट्टी में 6 महीने तक धीरे-धीरे घुलकर गन्ने को सल्फर उपलब्ध कराता है और मिट्टी के पीएच को सुधारता है।
- फेरस सल्फेट (Ferrous Sulfate 19%): क्षारीय या चूनेदार मिट्टी में 10 किग्रा प्रति एकड़ गोबर की खाद में मिलाकर डालें।
संपूर्ण पर्णीय छिड़काव कैलेंडर (Foliar Spray Chart 2026)
जब पौधे बड़े हो जाते हैं या जमीन से पोषक तत्व सोखने में असमर्थ होते हैं, तो पत्तियों पर स्प्रे करना 5 गुना अधिक तेज और असरदार साबित होता है।
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गन्ना फसल सम्पूर्ण माइक्रोन्यूट्रिएंट्स स्प्रे चार्ट
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स्प्रे 1 (बुवाई के 45-50 दिन बाद) ---> चिलेटेड जिंक (12%) + यूरिया घोल (फुटाव और बढ़वार)
स्प्रे 2 (बुवाई के 80-90 दिन बाद) ---> फेरस सल्फेट + 19:19:19 + मैग्नीशियम (हरापन व कल्ले)
स्प्रे 3 (मानसून से ठीक पहले - जून) ---> बोरॉन (20%) + 00:52:34 + स्टीकर (तने की मोटाई)
स्प्रे 4 (मानसून के बाद - सितंबर) ---> पोटेशियम शोरा (13:0:45) + बोरॉन (चीनी रिकवरी व वजन)
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विस्तृत स्प्रे फॉर्मूलेशन (प्रति एकड़ 200 लीटर पानी हेतु)
स्प्रे 1: कल्ले फूटते समय (Tiller Initiation Stage — 45 से 50 दिन)
- चिलेटेड जिंक (Chelated Zinc EDTA 12%): 200 ग्राम
- दानेदार यूरिया (Urea): 2 किलोग्राम
- विधि: 200 लीटर पानी में दोनों को अच्छी तरह घोलकर तेज धूप निकलने से पहले (सुबह 8 से 11 बजे) छिड़काव करें। यूरिया पत्तियों के रंध्र (Stomata) खोल देता है जिससे जिंक तुरंत सोख लिया जाता है।
स्प्रे 2: मुख्य वानस्पतिक बढ़वार (Grand Growth Stage — 85 से 95 दिन)
- फेरस सल्फेट (Green Vitriol 19%): 500 ग्राम
- एनपीके 19:19:19 (Water Soluble): 1 किलोग्राम
- साइट्रिक एसिड (नींबू का सत): 50 ग्राम (पानी का पीएच कम करने हेतु ताकि लोहा अघुलनशील न हो)
- विधि: पत्तियों का पीलापन मिटाने और तने की गांठों को लंबा व मजबूत बनाने के लिए सर्वोत्तम।
स्प्रे 3: पोरियों की मोटाई एवं मजबूती (Cane Elongation Stage — जून माह)
- बोरॉन 20% (Disodium Octaborate Tetrahydrate): 200 ग्राम
- एनपीके 00:52:34 (मोनो पोटेशियम फॉस्फेट): 1.5 किलोग्राम
- सिलिकॉन स्टीकर (Silicon Spreader): 50 मिली
- फायदा: गन्ने का तना अंदर से ठोस बनता है, बोरॉन तने को चटकने (Cracking) से रोकता है और सूखा सहने की क्षमता 40% बढ़ाता है।
स्प्रे 4: चीनी रिकवरी और वजन संवर्धन (Pre-Harvest Ripening — सितंबर-अक्टूबर)
- पोटेशियम नाइट्रेट (NPK 13:00:45): 2.0 किलोग्राम
- बोरॉन 20%: 150 ग्राम
- फायदा: पेराई सत्र से ठीक पहले यह स्प्रे पत्तियों में बनी सारी शर्करा को गन्ने के रस में गाढ़ा कर देता है। इससे गन्ने की तौल में प्रति ट्रॉली 3 से 4 क्विंटल का सीधा वजन बढ़ जाता है।
3 गलतियां जो किसान अक्सर स्प्रे करते समय करते हैं
- कड़े और खारे पानी का प्रयोग: यदि आपके ट्यूबवेल का पानी बहुत खारा (TDS 800 से अधिक) है, तो दवाएं पानी में फट जाती हैं। स्प्रे के पानी में थोड़ा सा सिरका या साइट्रिक एसिड मिलाकर पीएच 6.0 से 6.5 पर लाएं।
- दोपहर की तेज धूप में छिड़काव: 35 डिग्री से अधिक तापमान में स्प्रे करने से घोल पत्तियों पर तुरंत सूख जाता है और पत्तियों के किनारे जल जाते हैं। हमेशा सुबह या शाम 3:30 बजे के बाद ही स्प्रे करें।
- चिपकने वाले पदार्थ (Spreader/Sticker) की अनदेखी: गन्ने की पत्तियों पर मोम (Wax) की प्राकृतिक परत होती है, जिससे पानी की बूंदें फिसलकर नीचे गिर जाती हैं। घोल में हमेशा 50 मिली सिलिकॉन सुपर स्प्रेडर अवश्य मिलाएं।
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