
गन्ने की खेती में सबसे बड़ा खर्च हर साल नई बुवाई का होता है — बीज, जुताई, बुवाई और शुरुआती देखभाल में प्रति हेक्टेयर 20 से 25 हजार रुपये तक लग जाते हैं। लेकिन अनुभवी किसान जानते हैं कि गन्ने की असली कमाई पेड़ी (रटून) फसल से होती है। पिछली फसल के कटे ठूंठों से उगने वाली यह फसल बिना बुवाई खर्च के 2 से 3 साल तक अच्छी पैदावार दे सकती है — बशर्ते उसका प्रबंधन सही तरीके से किया जाए।
उत्तर प्रदेश के लाखों गन्ना किसान हर साल पेड़ी फसल लेते हैं, लेकिन सही प्रबंधन न होने से उनकी पैदावार हर साल 10 से 15 प्रतिशत तक घटती जाती है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, अच्छी देखभाल से पेड़ी फसल की पैदावार पहली फसल के 85 से 90 प्रतिशत तक बनाए रखी जा सकती है। इस गाइड में हम पेड़ी फसल प्रबंधन के 7 प्रैक्टिकल उपाय विस्तार से बताएंगे, जिन्हें अपनाकर आप तीन साल तक लगातार अच्छी उपज ले सकते हैं।
पेड़ी (रटून) फसल क्या है और इसके फायदे
गन्ना एक बहुवर्षीय फसल है। जब पहली फसल (पौध फसल या प्लांट क्रॉप) की कटाई जमीन की सतह से की जाती है, तो जड़ों के पास बचे ठूंठों (स्टबल) की आंखों से नए कल्ले फूटते हैं। यही पेड़ी फसल कहलाती है। चूंकि जड़ तंत्र पहले से स्थापित होता है, इसलिए पेड़ी फसल पौध फसल की तुलना में 2 से 3 हफ्ते पहले पकती है और शुरुआती वृद्धि तेज होती है।
पेड़ी फसल के मुख्य फायदे
- बुवाई खर्च शून्य: बीज, जुताई और बुवाई का 20-25 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर खर्च बचता है।
- जल्दी पकाव: जड़ें पहले से तैयार होने से फसल 2-3 सप्ताह पहले तैयार हो जाती है, जिससे मिल में जल्दी पर्ची मिलने की संभावना बढ़ती है।
- मिट्टी की नमी का बेहतर उपयोग: स्थापित जड़ें गहराई से नमी खींचती हैं।
- समय की बचत: खेत खाली नहीं रहता, तुरंत अगली फसल शुरू हो जाती है।
लागत तुलना: पौध फसल बनाम पेड़ी फसल (प्रति हेक्टेयर, अनुमानित)
| खर्च का मद | पौध फसल | पेड़ी फसल |
|---|---|---|
| बीज गन्ना | ₹12,000–15,000 | ₹0 (गैप फिलिंग में ₹2,000–3,000) |
| जुताई व बुवाई | ₹8,000–10,000 | ₹0 |
| ठूंठ छंटाई व सफाई | ₹0 | ₹2,000–3,000 |
| खाद व उर्वरक | ₹10,000–12,000 | ₹10,000–12,000 |
| सिंचाई | ₹6,000–8,000 | ₹5,000–7,000 |
| कीट-रोग प्रबंधन | ₹4,000–5,000 | ₹4,000–6,000 |
| कुल अनुमानित खर्च | ₹40,000–50,000 | ₹23,000–31,000 |
यानी पेड़ी फसल में लगभग 35 से 40 प्रतिशत लागत बचती है। लेकिन यह बचत तभी फायदेमंद है जब पैदावार बनी रहे — और यहीं प्रबंधन की भूमिका आती है।
उपाय 1: कटाई के तुरंत बाद ठूंठों की छंटाई (स्टबल शेविंग)
पेड़ी फसल की सफलता की नींव कटाई के दिन ही पड़ती है। कटाई के समय गन्ना जमीन की सतह से काटना चाहिए — ऊंचे ठूंठ छोड़ने से कल्ले कमजोर और असमान निकलते हैं।
कटाई के 7 से 10 दिन के भीतर यह काम करें:
- बचे-खुचे ऊंचे ठूंठों को तेज हंसिया या दरांती से जमीन की सतह तक काटें। इसे स्टबल शेविंग कहते हैं। इससे सभी आंखों से एक समान कल्ले निकलते हैं।
- सूखे और सड़े ठूंठों को हटा दें। रोगग्रस्त ठूंठ पेड़ी में लाल सड़न (रेड रॉट) जैसे रोग फैला सकते हैं।
- खेत की सफाई करें — कटे पत्तों और कचरे को पंक्तियों के बीच इकट्ठा करें।
ध्यान दें: कटाई के बाद खेत में पड़ी सूखी पत्तियों (ट्रैश) को जलाएं नहीं। पराली जलाने से मिट्टी के लाभकारी जीवाणु और केंचुए मर जाते हैं और प्रदूषण होता है। इसके बजाय पत्तियों को पंक्तियों के बीच बिछाकर मल्च बना दें — इससे नमी बनी रहती है और खरपतवार दबते हैं।
उपाय 2: गैप फिलिंग — खाली जगहों को समय पर भरें
पेड़ी फसल में सबसे बड़ी पैदावार घटने का कारण है खाली जगहें (गैप्स)। कटाई, कीट या रोग से कुछ ठूंठ मर जाते हैं, जिससे खेत में खाली पैच बन जाते हैं। हर 10 प्रतिशत खाली जगह का मतलब लगभग उतनी ही पैदावार की हानि है।
गैप फिलिंग की सही विधि:
- कटाई के 30 से 45 दिन के भीतर खाली जगहों की पहचान करें।
- स्वस्थ, रोगमुक्त गन्ने से 2 से 3 आंख वाले बीज टुकड़े तैयार करें (बीज गन्ना 8-10 महीने की स्वस्थ फसल से लें)।
- खाली जगह में 5 से 7 सेंटीमीटर गहरी नाली बनाकर टुकड़े लिटाकर लगाएं और हल्की मिट्टी से ढकें।
- लगाने के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करें।
गैप फिलिंग में देरी न करें — 45 दिन के बाद लगाए गए पौधे मुख्य फसल से पिछड़ जाते हैं और मिल में एक समान गन्ना नहीं मिलता।
उपाय 3: संतुलित खाद प्रबंधन — पेड़ी की सबसे बड़ी जरूरत
पेड़ी फसल में पैदावार घटने का दूसरा सबसे बड़ा कारण है अपर्याप्त खाद। कई किसान सोचते हैं कि जड़ें पुरानी हैं तो खाद कम लगेगी — यह गलत धारणा है। पेड़ी फसल को पौध फसल जितनी ही, बल्कि कुछ मामलों में ज्यादा पोषण चाहिए क्योंकि मिट्टी से पोषक तत्व पहले ही निकाले जा चुके हैं।
पेड़ी गन्ने के लिए मानक NPK सिफारिश (प्रति हेक्टेयर)
| पोषक तत्व | मात्रा (किग्रा/हेक्टेयर) | स्रोत (अनुमानित) |
|---|---|---|
| नाइट्रोजन (N) | 150 | यूरिया से |
| फॉस्फोरस (P₂O₅) | 60 | डीएपी/सिंगल सुपर फॉस्फेट से |
| पोटाश (K₂O) | 60 | म्यूरेट ऑफ पोटाश से |
खाद देने का सही समय (3 किस्तों में):
- पहली किस्त — कटाई के तुरंत बाद (ठूंठ छंटाई के साथ): कुल नाइट्रोजन का एक तिहाई + पूरा फॉस्फोरस + पूरा पोटाश। फॉस्फोरस और पोटाश जड़ों के पास डालें।
- दूसरी किस्त — 45 से 60 दिन बाद: नाइट्रोजन का दूसरा तिहाई, कल्ले निकलने के समय।
- तीसरी किस्त — मिट्टी चढ़ाते समय (90-120 दिन): बचा हुआ एक तिहाई नाइट्रोजन।
सूक्ष्म पोषक तत्व न भूलें
- जिंक: जिंक की कमी वाली मिट्टी में 25 किग्रा जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर पहली किस्त के साथ दें।
- गोबर की खाद/वर्मी कम्पोस्ट: प्रति हेक्टेयर 5 से 10 टन गोबर की सड़ी खाद या 2 से 3 टन वर्मी कम्पोस्ट पेड़ी की मिट्टी के स्वास्थ्य के लिए बहुत फायदेमंद है।
- मिट्टी परीक्षण: हर 2 से 3 साल में मिट्टी की जांच करवाकर ही खाद की मात्रा तय करें — अंधाधुंध यूरिया डालने से पैदावार नहीं, लागत बढ़ती है।
सावधानी: जहां रासायनिक कीटनाशक या खरपतवारनाशी के नाम दिए गए हैं, वहां मात्रा के लिए अपने क्षेत्र के कृषि विशेषज्ञ या कृषि विज्ञान केंद्र से सलाह अवश्य लें।
उपाय 4: सिंचाई प्रबंधन — नमी का सही संतुलन
पेड़ी फसल की जड़ें गहरी होती हैं, लेकिन शुरुआती 60 दिनों में नए कल्लों को नियमित नमी चाहिए।
- पहली सिंचाई: ठूंठ छंटाई और पहली खाद के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करें।
- अंतराल: गर्मियों में 12 से 15 दिन, सर्दियों में 20 से 25 दिन के अंतराल पर सिंचाई करें। मिट्टी की नमी देखकर तय करें — खेत में पानी भरने (जलभराव) से बचें।
- मानसून में: अधिक बारिश में खेत से अतिरिक्त पानी की निकासी का प्रबंध रखें। जलभराव से जड़ें सड़ती हैं और लाल सड़न का खतरा बढ़ता है।
- ड्रिप सिंचाई: जिन किसानों के पास ड्रिप है, वे पेड़ी में 30 से 40 प्रतिशत पानी बचा सकते हैं। ड्रिप में खाद भी पानी के साथ दी जा सकती है (फर्टिगेशन), जिससे पोषक तत्वों का उपयोग बेहतर होता है।
अक्टूबर-नवंबर में बोई गई शरदकालीन पेड़ी और फरवरी-मार्च की बसंतकालीन पेड़ी — दोनों में शुरुआती सिंचाई का समय पर होना सबसे अहम है।
उपाय 5: खरपतवार नियंत्रण — शुरुआती 90 दिन निर्णायक
पेड़ी फसल में शुरुआती 60 से 90 दिन खरपतवारों से सबसे ज्यादा नुकसान होता है। कटाई के बाद खेत खुला होने से खरपतवार तेजी से उगते हैं और नए कल्लों से नमी व पोषक तत्व छीन लेते हैं।
- पहली निराई-गुड़ाई: कटाई के 25 से 30 दिन बाद, कल्ले निकलने के समय।
- दूसरी निराई-गुड़ाई: 55 से 60 दिन बाद।
- तीसरी निराई (जरूरत पर): 90 दिन के आसपास, मिट्टी चढ़ाने से पहले।
मल्चिंग (पत्तियों को पंक्तियों के बीच बिछाना) खरपतवारों को प्राकृतिक रूप से दबाती है। रासायनिक खरपतवारनाशी का प्रयोग करना हो तो गन्ने के लिए अनुशंसित उत्पाद ही चुनें और मात्रा के लिए कृषि विशेषज्ञ/कृषि विज्ञान केंद्र से सलाह लें।
उपाय 6: कीट व रोग प्रबंधन — पुरानी फसल, पुराने दुश्मन
पेड़ी फसल में कीट और रोग पिछली फसल से ही आते हैं, इसलिए इनका प्रबंधन पहले से ज्यादा सतर्कता मांगता है।
पेड़ी में मुख्य कीट
- अगेता तना छेदक (अर्ली शूट बोरर): मार्च से मई तक नए कल्लों पर हमला करता है। मृत गोभ (डेड हार्ट) दिखे तो प्रभावित कल्ले निकालकर नष्ट करें। प्रकाश प्रपंच लगाकर वयस्क कीटों की निगरानी करें।
- दीमक: हल्की मिट्टी में पेड़ी के ठूंठों को नुकसान पहुंचाती है। खेत में नमी बनाए रखें और गंभीर प्रकोप पर विशेषज्ञ की सलाह से उपचार करें।
- शीर्ष छेदक (टॉप बोरर): मानसून के बाद सक्रिय होता है। ट्राइकोग्रामा कार्ड जैसे जैविक उपाय अपनाए जा सकते हैं।
पेड़ी में मुख्य रोग
- लाल सड़न (रेड रॉट): पेड़ी में सबसे खतरनाक। रोगग्रस्त ठूंठों से फैलता है — इसलिए उपाय 1 में रोगग्रस्त ठूंठ हटाना जरूरी है। गैप फिलिंग के लिए हमेशा रोगमुक्त स्वस्थ बीज ही इस्तेमाल करें।
- कंडुआ (स्मट) और उकठा (विल्ट): रोगग्रस्त पौधे दिखते ही उखाड़कर खेत से दूर नष्ट करें।
रासायनिक नियंत्रण तभी अपनाएं जब प्रकोप आर्थिक क्षति सीमा से ऊपर हो। मात्रा के लिए कृषि विशेषज्ञ/कृषि विज्ञान केंद्र से सलाह लें।
उपाय 7: मिट्टी चढ़ाना और बंधाई — पैदावार की गारंटी
पेड़ी फसल में मिट्टी चढ़ाना (अर्थिंग अप) सबसे उपेक्षित लेकिन सबसे फायदेमंद काम है।
- समय: फसल के 90 से 120 दिन की अवस्था में, जब कल्लों की ऊंचाई 60 से 90 सेंटीमीटर हो।
- विधि: पंक्तियों के दोनों ओर से 15 से 20 सेंटीमीटर मिट्टी पौधों की जड़ों पर चढ़ाएं।
- फायदे: नई जड़ें निकलती हैं, पौधे मजबूत होते हैं, आंधी में गिरने का खतरा कम होता है और कल्लों की संख्या बढ़ती है।
- बंधाई: मिट्टी चढ़ाने के बाद सूखी पत्तियों से 8-10 पौधों के गुच्छों को बांध दें, ताकि तेज हवा में गन्ना न गिरे।
कितने साल तक पेड़ी रखें? — घटती पैदावार का सच
अच्छे प्रबंधन के बावजूद हर पेड़ी चक्र में पैदावार थोड़ी घटती है। सामान्य नियम:
- पहली पेड़ी: पौध फसल की 85-90% पैदावार संभव।
- दूसरी पेड़ी: 75-85% पैदावार।
- तीसरी पेड़ी: 65-75% पैदावार।
तीन पेड़ी चक्र (कुल 4 साल: 1 पौध + 3 पेड़ी) के बाद खेत को नई किस्म से दोबारा बोना बेहतर होता है। पुरानी किस्मों (जैसे Co 0238 के पुराने खेत) में रेड रॉट का दबाव बढ़ने पर तो दूसरी पेड़ी के बाद ही नई बुवाई कर लेनी चाहिए। नई बुवाई के समय बीज बदलाव करें — नई अनुमोदित किस्में पुरानी से 10-15% अधिक पैदावार देती हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या पेड़ी फसल में भी पूरी खाद देनी चाहिए?
हां। पेड़ी को पौध फसल जितना ही पोषण चाहिए। खाद में कटौती पैदावार घटने का सबसे बड़ा कारण है। मानक सिफारिश 150:60:60 NPK किग्रा प्रति हेक्टेयर है, तीन किस्तों में दें।
पेड़ी फसल में गैप फिलिंग कब तक कर सकते हैं?
कटाई के 30 से 45 दिन के भीतर। इसके बाद लगाए गए पौधे मुख्य फसल से पिछड़ जाते हैं और फायदा नहीं होता।
क्या पेड़ी में ड्रिप सिंचाई फायदेमंद है?
बहुत फायदेमंद। ड्रिप से 30-40% पानी बचता है और फर्टिगेशन से खाद का उपयोग बेहतर होता है। पेड़ी की स्थापित जड़ें ड्रिप के साथ तेजी से बढ़ती हैं।
पेड़ी फसल कितने साल तक ले सकते हैं?
अच्छे प्रबंधन से 2 से 3 पेड़ी चक्र (कुल 3-4 साल) तक। इसके बाद पैदावार इतनी घट जाती है कि नई बुवाई करना ज्यादा फायदेमंद होता है।
पेड़ी में सबसे खतरनाक रोग कौन सा है?
लाल सड़न (रेड रॉट)। यह रोगग्रस्त ठूंठों और बीज से फैलता है। रोगग्रस्त ठूंठ हटाना और स्वस्थ बीज से गैप फिलिंग ही सबसे अच्छा बचाव है।
क्या पेड़ी फसल मिल में जल्दी जाती है?
हां, पेड़ी फसल पौध फसल से 2-3 सप्ताह पहले पकती है, इसलिए अगेती पर्ची मिलने की संभावना अधिक रहती है।
पेड़ी फसल गन्ना किसान की सबसे बड़ी ताकत है — बिना बुवाई खर्च के तीन साल तक कमाई। बस जरूरत है सही समय पर सही काम की: तुरंत ठूंठ छंटाई, समय पर गैप फिलिंग, पूरी संतुलित खाद, नियमित सिंचाई और मिट्टी चढ़ाना। इन 7 उपायों को अपनाइए और अपनी पेड़ी की पैदावार को पौध फसल के बराबर बनाए रखिए।
अपनी समस्या या सवाल दर्ज करें
गन्ना पर्ची, सट्टा संशोधन, सर्वे, ई-गन्ना ऐप या भुगतान में कोई भी दिक्कत हो, नीचे अपनी जानकारी भरें। हमारी टीम समाधान में आपकी पूरी मदद करेगी।
यह आर्टिकल कैसा लगा?


