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गन्ने की फसल में रेड रॉट रोग से 40% तक उपज का नुकसान — 2026-27 सीजन में बचाव के 7 पक्के तरीके

Aamir Raza Aamir Raza • Oct 24, 2026 • 11 min read
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गन्ने की फसल में रेड रॉट रोग से 40% तक उपज का नुकसान — 2026-27 सीजन में बचाव के 7 पक्के तरीके
अंतिम अपडेट: October 24, 2026 8:26 AM IST — यह आर्टिकल नियमित रूप से अपडेट किया जाता है।

गन्ने की फसल में रेड रॉट रोग को कृषि विशेषज्ञ “गन्ने का कैंसर” कहते हैं — और यह नाम बेवजह नहीं मिला है। एक बार यह फफूंदी रोग खेत में जड़ जमा ले, तो रोगग्रस्त पौधों का कोई इलाज नहीं बचता; किसान को बस नुकसान रोकने के तरीके बचते हैं। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, गंभीर प्रकोप की स्थिति में यह रोग गन्ने की उपज में 10 से 40 प्रतिशत तक की कमी और रस में चीनी की मात्रा (रिकवरी) में भारी गिरावट ला सकता है। कुछ मामलों में तो समय पर पहचान न हो तो पूरी की पूरी फसल बर्बाद हो जाती है।

2026-27 सीजन के लिए यह समय इसलिए अहम है क्योंकि अक्टूबर-नवंबर का दौरा शरदकालीन बुवाई और बीज चयन का होता है। रेड रॉट सबसे ज्यादा संक्रमित बीज (गन्ने के टुकड़ों) के जरिए फैलता है — मतलब जो बीज आज बोया जा रहा है, वही अगले साल की फसल का भाग्य तय करेगा। अगर बुवाई के समय बीज की सही जांच और उपचार कर लिया जाए, तो इस रोग से 90 प्रतिशत से ज्यादा बचाव संभव है। इस गाइड में आप जानेंगे कि रेड रॉट की पहचान कैसे करें, यह फैलता कैसे है, और 2026-27 सीजन में अपनी फसल को इससे बचाने के 7 पक्के तरीके क्या हैं।

रेड रॉट रोग क्या है और यह क्यों इतना खतरनाक है

रेड रॉट एक फफूंदी जनित रोग है, जो कोलेटोट्राइकम फेलकेटम (Colletotrichum falcatum) नामक फफूंद से होता है। यह गन्ने के तने, पत्तियों, कलियों और जड़ों — सभी हिस्सों को प्रभावित कर सकता है, लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान तने के अंदर की गिरी (पिथ) को पहुंचता है। फफूंद तने के अंदर लाल रंग का धब्बेदार संक्रमण फैलाती है, जिससे गन्ने का रस खट्टा हो जाता है और मिठास घट जाती है।

यह रोग हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश और ओडिशा में गन्ने को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाता है। उत्तर प्रदेश के पूर्वी और मध्य क्षेत्रों में तो यह रोग महामारी के रूप में भी फैल चुका है। इसका सबसे खतरनाक पहलू यह है कि यह बीज जनित रोग है — यानी रोगग्रस्त गन्ने से काटे गए बीज के टुकड़ों से अगली फसल में भी यह रोग पहुंच जाता है। किसान को अक्सर पता ही नहीं चलता कि उसका बीज संक्रमित है, और जब लक्षण दिखते हैं तब तक रोग पूरे खेत में फैल चुका होता है।

एक और चिंता की बात: उत्तर प्रदेश में लंबे समय से लोकप्रिय रही किस्म को 0238 रेड रॉट के प्रति संवेदनशील हो चुकी है। जिन क्षेत्रों में यह किस्म बड़े पैमाने पर बोई जाती है, वहां रेड रॉट का खतरा ज्यादा रहता है। इसलिए बीज और किस्म का चुनाव इस सीजन में पहले से कहीं ज्यादा सावधानी का विषय है।

रेड रॉट के लक्षण — खेत में पहचानने के 6 निशान

रेड रॉट की पहचान के लिए गन्ने को चीरकर देखना सबसे पक्का तरीका है। खेत में ये लक्षण दिखें तो सतर्क हो जाएं:

1. पत्तियों का ऊपर से सूखना: पहला बाहरी लक्षण आमतौर पर तीसरी या चौथी पत्ती पर दिखता है — पत्ती किनारों और नोक से मुरझाने लगती है। धीरे-धीरे ऊपर की पत्तियां भी पीली पड़कर सूखने लगती हैं।

2. तने के अंदर लाल रंग और सफेद धब्बे: गन्ने को लंबाई में चीरकर देखें — अंदर की गिरी में लाल रंग की धारियां और लाल पृष्ठभूमि पर आड़ी सफेद पट्टियां (cross-wise white patches) दिखती हैं। यह रेड रॉट की सबसे पक्की नैदानिक पहचान है।

3. सिरके जैसी खट्टी गंध: रोगग्रस्त गन्ने को चीरने पर सिरके या खट्टी शराब जैसी तेज गंध आती है। यह गंध रस में चीनी के किण्वन (फर्मेंटेशन) का संकेत है।

4. तने का खोखला होना: रोग बढ़ने पर गन्ने के अंदर की गिरी सिकुड़कर खोखली हो जाती है और तना ऊपर से नीचे तक सूखने लगता है।

5. छाल पर काले धब्बे: बाद की अवस्था में गन्ने की छाल पर छोटे काले, मखमली फलने वाले पिंड (acervuli) उभर आते हैं — ये फफूंद के बीजाणु होते हैं जो हवा से फैलते हैं।

6. पत्तियों पर लाल धब्बे: पत्तियों की ऊपरी सतह पर गहरे लाल रंग के छोटे घाव दिख सकते हैं, जिनका बीच का हिस्सा बाद में पुआल के रंग का हो जाता है। संक्रमित पत्तियां घाव के स्थान से टूटकर लटक सकती हैं।

सावधानी: ऊपर से पत्तियों का सूखना कई कारणों से हो सकता है (पानी की कमी, अन्य रोग, कीट)। पक्की पहचान के लिए गन्ना चीरकर अंदर का लाल रंग + सफेद पट्टियां + खट्टी गंध — तीनों निशान एक साथ देखें।

रेड रॉट फैलता कैसे है — संक्रमण के 5 रास्ते

रोग से बचाव के लिए यह जानना जरूरी है कि फफूंद खेत से खेत कैसे पहुंचती है:

संक्रमण का रास्ताकैसे फैलता है
संक्रमित बीजरोगग्रस्त गन्ने से काटे गए बीज के टुकड़े — सबसे बड़ा और सबसे आम रास्ता
बहता पानीबारिश या सिंचाई का पानी रोगग्रस्त खेत से स्वस्थ खेत में फफूंद ले जाता है
हवाछाल पर बने काले बीजाणु पिंडों से बीजाणु हवा में उड़कर फैलते हैं
मिट्टी और अवशेषकटाई के बाद खेत में बचे ठूंठ और पत्तियों में फफूंद जीवित रहती है
औजार और यंत्रसंक्रमित खेत में इस्तेमाल हुए गन्ना काटने के औजार बिना सफाई के दूसरे खेत में रोग ले जाते हैं

बारिश के मौसम में और बारिश के बाद यह रोग सबसे तेजी से फैलता है, क्योंकि नमी फफूंद के बीजाणुओं के अंकुरण के लिए आदर्श होती है। लगातार एक ही खेत में गन्ना बोना (मोनोकल्चर), बार-बार पेड़ी लेना और खेत में पानी का ठहराव — ये तीनों स्थितियां रोग को बढ़ावा देती हैं।

बचाव के 7 पक्के तरीके — 2026-27 सीजन की पूरी योजना

1. रोगमुक्त बीज का चुनाव — सबसे पहला और सबसे बड़ा कदम

बीज हमेशा रोगमुक्त खेत या रोगमुक्त क्षेत्र से लें। बीज के लिए गन्ना चुनते समय इन बातों का ध्यान रखें:

  • बीज के गन्ने को चीरकर अंदर देखें — गिरी सफेद और साफ होनी चाहिए, लाल धारियां या खट्टी गंध न हो।
  • बीज के लिए ऊपरी 2/3 हिस्से के स्वस्थ गन्ने चुनें; नीचे के पुराने और मोटे गन्ने बीज के लिए न लें।
  • दूसरे प्रदेशों या दूर के क्षेत्रों से बीज की किस्म लाने से पहले कृषि वैज्ञानिकों की संस्तुति जरूर लें।
  • बीज नर्सरी अलग से तैयार करना सबसे सुरक्षित तरीका है — नर्सरी से स्वस्थ बीज बुवाई के लिए इस्तेमाल करें।

2. बीज उपचार — बुवाई से पहले की सबसे अहम क्रिया

बुवाई से पहले बीज के टुकड़ों का उपचार रेड रॉट से बचाव का सबसे असरदार तरीका है। दो प्रमाणित तरीके हैं:

  • फफूंदनाशक घोल में भिगोना: बीज के टुकड़ों को फफूंदनाशक दवा (जैसे कार्बेन्डाजिम या ट्रायडेमेफॉन) के घोल में निर्धारित समय तक भिगोकर बोएं। यह बीज के ऊपर और सतह के अंदर मौजूद फफूंद को नष्ट करता है।
  • गर्म पानी से उपचार: 52 डिग्री सेल्सियस तापमान वाले गर्म पानी में बीज के टुकड़ों को उपचारित किया जाता है। यह विधि बीज के अंदर छिपी फफूंद को भी नष्ट करती है और रासायनिक दवा का इस्तेमाल नहीं होता।

जरूरी चेतावनी: फफूंदनाशक दवा की सही मात्रा, घोल की सांद्रता और भिगोने का समय जानने के लिए अपने क्षेत्र के कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें। गलत मात्रा से बीज को नुकसान हो सकता है या उपचार बेअसर रह सकता है।

3. रोग प्रतिरोधी किस्मों का चुनाव

रेड रॉट से बचाव का सबसे टिकाऊ तरीका है — ऐसी किस्म बोना जो इस रोग को झेल सके। अपने क्षेत्र के लिए कृषि विज्ञान केंद्र या चीनी मिल से पूछकर रेड रॉट प्रतिरोधी संस्तुत किस्मों की सूची लें और उसी के अनुसार बीज का इंतजाम करें। ध्यान रहे कि जो किस्म कुछ साल पहले प्रतिरोधी थी, वह नए फफूंद प्रजातियों के सामने संवेदनशील हो सकती है — इसलिए हर सीजन में ताजा संस्तुति लेना जरूरी है। जैसा कि ऊपर बताया, को 0238 जैसी लोकप्रिय किस्मों के प्रति रेड रॉट की संवेदनशीलता बढ़ी है, इसलिए बीज चयन में अतिरिक्त सावधानी बरतें।

4. फसल चक्र अपनाएं — एक ही खेत में बार-बार गन्ना न बोएं

लगातार गन्ना बोने से मिट्टी में फफूंद की मात्रा बढ़ती जाती है। विशेषज्ञों की सलाह है:

  • रेड रॉट से प्रभावित खेत में कम से कम एक सीजन तक गन्ना न बोएं — उस दौरान धान, गेहूं या हरी खाद की फसल लें।
  • धान और हरी खाद की फसलों को फसल चक्र में शामिल करने से मिट्टी में रोग के जीवाणु कम होते हैं।
  • एकल फसल (मोनोकल्चर) की बजाय अंतरवर्तीय फसलें भी मिट्टी के स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हैं।

5. खेत की सफाई और जल निकासी

  • कटाई के बाद खेत में बची सूखी पत्तियों, ठूंठों और फसल अवशेषों को जलाकर नष्ट कर दें — इनमें फफूंद अगले सीजन तक जीवित रहती है।
  • खेत में पानी का ठहराव न होने दें; जल निकासी के लिए नालियां बनाएं। रोगग्रस्त क्षेत्र का पानी स्वस्थ खेत में न जाने दें।
  • गन्ना काटने के औजारों को एक खेत से दूसरे खेत में ले जाने से पहले साफ करें।

6. रोगग्रस्त पौधों को तुरंत हटाएं

खेत में अगर कुछ पौधों में रेड रॉट के लक्षण दिखें तो:

  • प्रभावित पौधों के पूरे झुरमुट (clump) को जड़ सहित उखाड़कर जला दें — अधजले अवशेष खेत में न छोड़ें।
  • उखाड़े गए स्थान की मिट्टी में ब्लीचिंग पाउडर मिलाने की प्रथा कई क्षेत्रों में अपनाई जाती है; सही मात्रा के लिए कृषि विशेषज्ञ से सलाह लें।
  • रोग के शुरुआती लक्षण दिखने पर प्रभावित क्षेत्र से गन्ने की जल्दी कटाई कर लें — इससे उपज और चीनी की गुणवत्ता का और नुकसान रुकता है और रोग का फैलाव थमता है।

7. रोगग्रस्त फसल की पेड़ी (रटून) बिल्कुल न लें

यह नियम सबसे ज्यादा नजरअंदाज होता है और सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाता है। रेड रॉट से संक्रमित फसल की पेड़ी लेने से रोग अगले सीजन में और भी गंभीर रूप में लौटता है। विशेषज्ञों की स्पष्ट सलाह है: संक्रमित फसल की पेड़ी कभी न लें। अगर खेत में रोग का प्रकोप ज्यादा रहा है, तो उस खेत में अगले सीजन में गन्ने की बजाय कोई दूसरी फसल बोएं।

जैविक विकल्प — रसायन कम, सुरक्षा ज्यादा

जो किसान रासायनिक फफूंदनाशकों का कम इस्तेमाल करना चाहते हैं, उनके लिए जैविक विकल्प भी उपलब्ध हैं:

  • ट्राइकोडर्मा (Trichoderma viride / T. harzianum) जैसे जैविक फफूंदनाशकों से बीज उपचार और मिट्टी उपचार किया जा सकता है। शोध में इन्हें रेड रॉट के खिलाफ प्रभावी पाया गया है।
  • स्यूडोमोनास जैसे लाभकारी जीवाणु भी मिट्टी में रोग दबाने में मदद करते हैं।
  • नीम, लहसुन, अदरक और प्याज के अर्क को प्रयोगशाला परीक्षणों में इस फफूंद की वृद्धि रोकने वाला पाया गया है, हालांकि खेत स्तर पर इनका असर सीमित हो सकता है।

जैविक उपचारों को रासायनिक उपचार के साथ एकीकृत करके (एकीकृत रोग प्रबंधन) सबसे अच्छे नतीजे मिलते हैं।

2026-27 सीजन के लिए आपकी कार्य-सूची

अक्टूबर-नवंबर में बुवाई की तैयारी कर रहे किसान इस सूची को अपनाएं:

  1. बीज के गन्ने की चीरकर जांच करें — लाल गिरी वाला गन्ना बीज के लिए खारिज करें।
  2. रोगमुक्त क्षेत्र/नर्सरी से बीज का इंतजाम करें।
  3. बुवाई से पहले बीज उपचार (फफूंदनाशक घोल या गर्म पानी) अनिवार्य रूप से करें।
  4. क्षेत्रीय संस्तुति के अनुसार रेड रॉट प्रतिरोधी किस्म चुनें।
  5. पिछले सीजन में रोग वाले खेत में फसल चक्र अपनाएं, गन्ना न बोएं।
  6. कटाई के बाद अवशेष जलाएं और खेत की जल निकासी दुरुस्त करें।
  7. खेत में लक्षण दिखते ही प्रभावित पौधे उखाड़कर नष्ट करें।

पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न: क्या रेड रॉट लगे गन्ने को चीनी मिल में बेचा जा सकता है? उत्तर: हल्के संक्रमण वाले गन्ने को मिल ले सकती है, लेकिन ऐसे गन्ने में चीनी की रिकवरी कम होती है, इसलिए वजन के साथ-साथ भाव पर भी असर पड़ सकता है। गंभीर रूप से रोगग्रस्त, सूखे और खोखले गन्ने को मिलें अक्सर खारिज कर देती हैं। बेहतर है कि रोग के शुरुआती लक्षण दिखते ही फसल की जल्दी कटाई कर लें।

प्रश्न: क्या रेड रॉट का कोई स्प्रे इलाज है जो लगे हुए पौधे को ठीक कर दे? उत्तर: नहीं। एक बार फफूंद तने के अंदर फैल जाए तो कोई भी दवा पौधे को ठीक नहीं कर सकती। स्प्रे और दवाएं सिर्फ बचाव (बीज उपचार) और फैलाव रोकने (प्रभावित पौधे हटाना) में काम आती हैं। इसलिए रोकथाम ही असली इलाज है।

प्रश्न: बीज उपचार के लिए गर्म पानी का सही तापमान क्या है? उत्तर: शोध के अनुसार 52 डिग्री सेल्सियस तापमान पर उपचार प्रभावी माना जाता है। हालांकि, सही तापमान और समय (मिनट/घंटे) आपकी स्थिति के अनुसार कृषि विज्ञान केंद्र से पुष्टि कर लें, क्योंकि गलत तापमान से बीज की अंकुरण क्षमता प्रभावित हो सकती है।

प्रश्न: क्या पेड़ी की फसल में रेड रॉट ज्यादा होता है? उत्तर: हां। लगातार पेड़ी लेने से मिट्टी में फफूंद की मात्रा बढ़ती है और रोग का प्रकोप गंभीर होता जाता है। अगर पहली फसल में रेड रॉट दिखा था, तो उस खेत की पेड़ी बिल्कुल न लें।

प्रश्न: रेड रॉट और गन्ने के सूखने (wilt) में क्या अंतर है? उत्तर: रेड रॉट में तने के अंदर लाल रंग के साथ आड़ी सफेद पट्टियां और खट्टी गंध होती है, जबकि सूखा रोग (विल्ट) में अंदर हल्का बैंगनी-भूरा रंग और नाव के आकार की खोखली गुहाएं बनती हैं, खट्टी गंध नहीं आती। सही पहचान के लिए गन्ना चीरकर देखना जरूरी है — जरूरत हो तो कृषि विज्ञान केंद्र में नमूना जांच करवाएं।


यह गाइड कृषि अनुसंधान संस्थानों और कृषि विशेषज्ञों द्वारा प्रकाशित रेड रॉट प्रबंधन सिफारिशों पर आधारित है। दवाओं की मात्रा और उपचार विधि अपने क्षेत्र की स्थिति के अनुसार कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विशेषज्ञ से पुष्टि करके ही अपनाएं।

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Aamir Raza
लेखक एवं मुख्य संपादक

Aamir Raza

संस्थापक एवं प्रधान संपादक — CaneUp.xyz। उत्तर प्रदेश गन्ना उद्योग, पर्ची कैलेंडर, SAP/MSP मूल्य नीति, ई-गन्ना पोर्टल और किसान अधिकारों पर 10+ वर्षों का जमीनी अनुभव।

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