
अक्टूबर की शुरुआत होते ही यूपी के हर चीनी मिल क्षेत्र में बीज बुकिंग केंद्रों पर किसानों की भीड़ बढ़ जाती है। एक तरफ काउंटर पर लिखा होता है — को.शा. 19231, सीओ 15023, सीओ 0238, सीओएलके 94184, सीओ 0118… और दूसरी तरफ किसान सोच में पड़ा है कि इस बार कौन सी किस्म लगाऊं, जिससे न सिर्फ इस साल बंपर उपज मिले, बल्कि पेड़ी फसल में भी दम बना रहे।
यह सवाल छोटा नहीं है। गन्ने की सही किस्म का चुनाव आपकी एक हेक्टेयर की कमाई का आधा फैसला अकेले तय कर देता है। अच्छी किस्म और खराब किस्म के बीच का अंतर प्रति हेक्टेयर 20 से 30 टन उपज का हो सकता है — यानी लाखों रुपये का फर्क। इसलिए इस गाइड में हमने 2026-27 सीजन की शरदकालीन बुवाई के लिए गन्ने की 8 उन्नत किस्मों की पूरी तुलना तैयार की है: कौन सी किस्म कितनी उपज देती है, चीनी का प्रतिशत कितना है, किस क्षेत्र के लिए उपयुक्त है, और रेड रॉट जैसे रोगों से कितनी सुरक्षित है। सबसे बड़ी बात — शाहजहांपुर के गन्ना शोध परिषद की नई अगेती किस्म को.शा. 19231 में प्रति हेक्टेयर लगभग 1000 क्विंटल तक उपज की क्षमता बताई गई है।
किस्म का चुनाव आपकी कमाई का आधा फैसला क्यों है
गन्ने में लागत लगभग हर किसान की एक जैसी होती है — जुताई, बीज, खाद, सिंचाई और कटाई। फर्क पड़ता है तो सिर्फ दो चीजों से: उपज (कितने टन गन्ना निकला) और चीनी प्रतिशत (मिल को कितनी रिकवरी मिली)। और ये दोनों चीजें सबसे ज्यादा निर्भर करती हैं बीज की किस्म पर।
एक सरल हिसाब समझिए। मान लीजिए एक किस्म से 80 टन प्रति हेक्टेयर उपज मिलती है और दूसरी उन्नत किस्म से 100 टन। 20 टन का अंतर, SAP 2025-26 के अगेती भाव ₹400 प्रति क्विंटल के हिसाब से, प्रति हेक्टेयर ₹80,000 का सीधा फर्क डालता है। (नोट: 2026-27 सीजन के SAP की घोषणा अभी बाकी है, इसलिए यहां पिछले सीजन का घोषित भाव उदाहरण के लिए दिया गया है।) ऊपर से अच्छी किस्म की पेड़ी फसल भी दमदार होती है, यानी दूसरे साल बिना दोबारा बुवाई के खर्च के फिर अच्छी कमाई।
इसीलिए शरदकालीन बुवाई — जो अक्टूबर-नवंबर में होती है और जिसे गन्ने की बुवाई का सबसे अच्छा समय माना जाता है — में किस्म का चुनाव सोच-समझकर करना चाहिए। शरदकालीन फसल को बढ़ने के लिए लंबा समय मिलता है, इसलिए इसकी उपज वसंतकालीन बुवाई से 20 से 25 प्रतिशत तक अधिक होती है। अच्छी किस्म + सही समय = दोगुना फायदा।
एक नज़र में: 2026-27 की 8 उन्नत किस्मों की तुलना
| किस्म | पकने का समय | उपज (टन/हे.) | चीनी % | रोग प्रतिरोध | पेड़ी क्षमता | उपयुक्त क्षेत्र |
|---|---|---|---|---|---|---|
| को.शा. 19231 | अगेती (10-11 माह) | 90-100 | 18-20 | अच्छी | बहुत अच्छी | समस्त यूपी |
| सीओ 15023 | अगेती (10-11 माह) | 85-100 | 18-20 | अच्छी | अच्छी | पश्चिमी व मध्य यूपी |
| सीओ 0238 | मध्य-देर (11-12 माह) | 80-120 | 18-20 | रेड रॉट संवेदनशील | अच्छी | पश्चिमी यूपी |
| सीओ 0239 | अगेती-मध्य | 90-130 | 18-21 | बेहतर | अच्छी | नई बुवाई हेतु |
| सीओएलके 94184 | मध्य (11 माह) | 85-110 | 18-20 | प्रतिरोधी | अच्छी | पूर्वी यूपी |
| सीओ 0118 | मध्य | 75-100 | 17-19 | सहनशील | बहुत अच्छी | सभी क्षेत्र |
| सीओएसई 98231 | मध्य | 70-90 | 17-19 | प्रतिरोधी | ठीक | कम सिंचाई वाले क्षेत्र |
| सीओएस 13235 | अगेती | 75-95 | 17-19 | अच्छी | अच्छी | पश्चिमी व तराई क्षेत्र |
(उपज के आंकड़े शोध संस्थानों के परीक्षणों और क्षेत्रीय अनुभव पर आधारित औसत अनुमान हैं; वास्तविक उपज आपकी मिट्टी, सिंचाई और देखभाल पर निर्भर करेगी।)
1. को.शा. 19231 — शाहजहांपुर की नई अगेती किस्म
यह इस समय सबसे चर्चित किस्म है। उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद, शाहजहांपुर ने इसे विशेष रूप से वसंत और शरदकालीन बुवाई के लिए विकसित किया है। संस्थान के अनुसार इसमें प्रति हेक्टेयर लगभग 1000 क्विंटल तक उत्पादन की क्षमता है, और इसकी जमाव क्षमता व टिलरिंग (कल्ले निकलना) बहुत शानदार है।
इसकी सबसे बड़ी खूबी है जल्दी पकना — नवंबर में ही इसमें चीनी का प्रतिशत 11 से अधिक रहता है, जो आगे चलकर और बढ़ता है। यानी मिल जल्दी चलें तो आपका गन्ना जल्दी तुलकर अच्छा भाव दिला सकता है। पेड़ी फसल लेने की क्षमता भी बहुत बढ़िया बताई गई है, जिससे दूसरे साल भी अच्छा मुनाफा मिलता है। सिंगल बड तकनीक से पौध तैयार करके बीज को कई गुना बढ़ाया जा सकता है, जिससे बीज की लागत भी घटती है। जो किसान पुरानी किस्मों से हटकर कुछ नया आजमाना चाहते हैं, उनके लिए यह 2026-27 की सबसे मजबूत दावेदार है।
2. सीओ 15023 — करनाल की अगेती किस्म, अब यूपी के लिए स्वीकृत
गन्ना प्रजनन संस्थान के क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र, करनाल से विकसित यह अगेती किस्म अब उत्तर प्रदेश के लिए भी स्वीकृत हो चुकी है, और शाहजहांपुर स्थित गन्ना शोध परिषद से शरदकालीन बुवाई हेतु इसका बीज भी उपलब्ध होने लगा है।
इस किस्म की खास बात है सीओ 0238 से अधिक चीनी परता (सुक्रोज) — यानी जूस में मिठास ज्यादा, जिससे मिलों को बेहतर रिकवरी मिलती है। जल्दी पकने वाली होने से मिलें नवंबर के बजाय अक्टूबर से ही चलाई जा सकती हैं, और किसान का गन्ना समय से तुल जाता है। पश्चिमी और मध्य यूपी के किसान, जो अगेती बुवाई करके जल्दी पेराई कराना चाहते हैं, उनके लिए यह बेहतरीन विकल्प है।
3. सीओ 0238 — पुरानी भरोसेमंद, लेकिन अब सावधानी जरूरी
सीओ 0238 पश्चिमी यूपी में वर्षों से सबसे लोकप्रिय किस्म रही है। अच्छी उपज (80 से 120 टन प्रति हेक्टेयर) और उच्च चीनी प्रतिशत (18 से 20) इसके मजबूत पक्ष हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इसमें रेड रॉट (लाल सड़न रोग) की समस्या तेजी से बढ़ी है।
रेड रॉट एक फंगल रोग है — गन्ने को काटने पर अंदर लाल-सफेद धब्बे दिखते हैं और सड़े हुए गन्ने से शराब जैसी बदबू आती है। एक बार खेत में फैल जाए तो पूरी फसल बर्बाद हो सकती है। इसलिए अगर आप 2026-27 में सीओ 0238 लगा रहे हैं तो बीज सिर्फ रोगमुक्त, प्रमाणित स्रोत से लें, और बीज उपचार जरूर करें। जिन क्षेत्रों में रेड रॉट का प्रकोप ज्यादा है, वहां सीओ 0239 या सीओएलके 94184 जैसे अधिक प्रतिरोधी विकल्पों पर विचार करना समझदारी होगी।
4. सीओ 0239 — सीओ 0238 का बेहतर उत्तराधिकारी
जो किसान सीओ 0238 की उपज और मिठास के आदी हैं लेकिन रेड रॉट से परेशान हैं, उनके लिए सीओ 0239 एक संतुलित विकल्प है। इसमें 90 से 130 टन प्रति हेक्टेयर तक उपज की क्षमता और 18 से 21 प्रतिशत तक चीनी बताई जाती है, साथ ही रोगों के प्रति बेहतर सहनशीलता है। पेड़ी फसल भी अच्छी होती है। नई बुवाई के लिए यह किस्म तेजी से किसानों की पसंद बन रही है।
5. सीओएलके 94184 — पूर्वी यूपी के लिए खास
पूर्वी उत्तर प्रदेश की मिट्टी और जलवायु के हिसाब से विकसित यह किस्म वहां के किसानों के बीच काफी लोकप्रिय है। 85 से 110 टन प्रति हेक्टेयर उपज, 18 से 20 प्रतिशत चीनी और रेड रॉट के प्रति अच्छी प्रतिरोधक क्षमता — यह संयोजन इसे पूर्वांचल के लिए भरोसेमंद बनाता है। पेड़ी क्षमता भी अच्छी है, यानी रटून फसल में भी निराशा नहीं होती।
6. सीओ 0118 — हर क्षेत्र के लिए सुरक्षित विकल्प
अगर आप प्रयोग के मूड में नहीं हैं और एक ऐसी किस्म चाहते हैं जो लगभग हर क्षेत्र में स्थिर प्रदर्शन दे, तो सीओ 0118 देखिए। 75 से 100 टन प्रति हेक्टेयर उपज, रोगों के प्रति सहनशीलता और बहुत अच्छी पेड़ी क्षमता — यह किस्म उन किसानों के लिए है जो जोखिम कम रखना चाहते हैं। सभी क्षेत्रों के लिए उपयुक्त होने से बीज की उपलब्धता भी आमतौर पर आसान रहती है।
7. सीओएसई 98231 — कम पानी वाले क्षेत्रों के लिए
जिन क्षेत्रों में सिंचाई की सुविधा सीमित है या नहर का पानी अनियमित मिलता है, वहां सीओएसई 98231 एक व्यावहारिक विकल्प है। उपज 70 से 90 टन प्रति हेक्टेयर रहती है, लेकिन रोग प्रतिरोध अच्छा है और कम पानी में भी फसल संभल जाती है। कम संसाधन में स्थिरता चाहने वाले किसानों के लिए यह किस्म उपयुक्त है।
8. सीओएस 13235 — तराई और पश्चिमी क्षेत्र की अगेती पसंद
अगेती पकने वाली यह किस्म पश्चिमी यूपी और तराई क्षेत्र में अच्छी मानी जाती है। 75 से 95 टन प्रति हेक्टेयर उपज और अच्छी पेड़ी क्षमता के साथ यह उन किसानों के लिए है जो जल्दी बुवाई-जल्दी कटाई का चक्र अपनाते हैं और खेत जल्दी खाली करके अगली फसल लेना चाहते हैं।
अपने क्षेत्र के हिसाब से किस्म चुनें
- पश्चिमी यूपी (मेरठ, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, बिजनौर): को.शा. 19231, सीओ 15023, सीओ 0239 — अगेती किस्मों से जल्दी पेराई का फायदा। सीओ 0238 सिर्फ रोगमुक्त बीज के साथ।
- मध्य यूपी (लखनऊ, सीतापुर, हरदोई, शाहजहांपुर): को.शा. 19231, सीओ 0118, सीओ 0239 — संतुलित विकल्प।
- पूर्वी यूपी (गोरखपुर, देवरिया, बस्ती, आजमगढ़): सीओएलके 94184, सीओ 0118 — स्थानीय जलवायु के अनुकूल।
- तराई क्षेत्र (लखीमपुर, पीलीभीत, बहराइच): सीओएस 13235, को.शा. 19231।
- कम सिंचाई वाले क्षेत्र: सीओएसई 98231।
ध्यान रहे, यह सामान्य मार्गदर्शन है। आपके गांव के कृषि विज्ञान केंद्र या गन्ना विकास परिषद की स्थानीय संस्तुति को सबसे अधिक महत्व दें, क्योंकि वही आपके क्षेत्र की मिट्टी और रोग-दबाव को सबसे अच्छे से जानते हैं।
शरदकालीन बुवाई में किस्म चुनते समय इन 6 बातों का ध्यान रखें
1. पकने का समय मिल की पेराई से मिलाएं। अगेती किस्म (10-11 महीने) का फायदा तभी है जब आपकी मिल अक्टूबर-नवंबर में चल जाए। अगर मिल दिसंबर में चलती है तो मध्य या देर से पकने वाली किस्म भी ठीक रहेगी।
2. पेड़ी क्षमता को नजरअंदाज न करें। गन्ने की असली कमाई अक्सर पेड़ी फसल से होती है, क्योंकि उसमें बुवाई का खर्च नहीं लगता। को.शा. 19231, सीओ 0118 जैसी अच्छी रटून क्षमता वाली किस्में दो साल का हिसाब बेहतर बनाती हैं।
3. रोग इतिहास देखें। अगर आपके क्षेत्र में पिछले 2-3 सालों में रेड रॉट या टॉप बोरर का प्रकोप रहा है, तो प्रतिरोधी किस्म चुनें। सीओ 0238 जैसे संवेदनशील विकल्प से बचें या पूरी सावधानी बरतें।
4. बीज की उपलब्धता पहले पक्की करें। नई किस्मों (को.शा. 19231, सीओ 15023) का बीज सीमित मात्रा में आता है। बुवाई से 1-2 महीने पहले ही गन्ना शोध परिषद, गन्ना विकास परिषद या अधिकृत बीज केंद्र से बुकिंग करा लें।
5. एक ही किस्म पर पूरा खेत न लगाएं। अनुभवी किसान 2-3 किस्मों में खेत बांटते हैं — एक मुख्य अगेती, एक मध्य अवधि की। इससे रोग या मौसम की मार एक साथ पूरी फसल पर नहीं पड़ती।
6. चीनी प्रतिशत को भी तौलिए। सिर्फ टन भार देखकर किस्म न चुनें। मिल को अधिक चीनी देने वाली किस्म से समय पर भुगतान और बेहतर संबंध — दोनों मिलते हैं।
बीज कहां से लें और कैसे जांचें
बीज हमेशा प्रमाणित स्रोत से लें — उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद (शाहजहांपुर), क्षेत्रीय गन्ना विकास परिषद, या सरकार से अधिकृत बीज उत्पादन केंद्र। बाजार से अनजान स्रोत का बीज सस्ता लग सकता है, लेकिन उसी में रोग छिपा होता है जो पूरे खेत को बर्बाद कर देता है।
बीज लेते समय गन्ने के टुकड़ों को काटकर देखिए — अंदर का गूदा सफेद-हरा और ठोस होना चाहिए। लाल धब्बे, सड़न या बदबू दिखे तो वह बीज न लें। बुवाई से पहले बीज का शोधन (फफूंदनाशक घोल में डुबोना) जरूर करें। मात्रा और विधि के लिए कृषि विशेषज्ञ या कृषि विज्ञान केंद्र से सलाह लें।
जवाब जानिए
सवाल: शरदकालीन बुवाई के लिए सबसे अच्छी किस्म कौन सी है? जवाब: कोई एक “सबसे अच्छी” किस्म नहीं होती — यह आपके क्षेत्र, मिल की पेराई तिथि और सिंचाई पर निर्भर करता है। 2026-27 में को.शा. 19231 (नई, अधिक उपज क्षमता), सीओ 15023 (अगेती, अधिक चीनी) और सीओ 0239 (संतुलित, रोग सहनशील) सबसे मजबूत दावेदार हैं।
सवाल: क्या सीओ 0238 अब नहीं लगाना चाहिए? जवाब: सीओ 0238 बुरी किस्म नहीं है, लेकिन इसमें रेड रॉट का खतरा बढ़ गया है। अगर आपके क्षेत्र में रोग का दबाव कम है और बीज पूरी तरह रोगमुक्त व प्रमाणित है, तो लगा सकते हैं। ज्यादा जोखिम वाले क्षेत्रों में सीओ 0239 या सीओएलके 94184 बेहतर रहेंगे।
सवाल: नई किस्म का बीज कहां मिलेगा? जवाब: को.शा. 19231 और सीओ 15023 का बीज उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद (शाहजहांपुर) और क्षेत्रीय गन्ना विकास परिषदों से मिलता है। बुवाई से पहले बुकिंग कराना जरूरी है क्योंकि नई किस्मों का बीज सीमित होता है।
सवाल: अगेती और मध्य अवधि की किस्म में क्या अंतर है? जवाब: अगेती किस्म 10-11 महीने में पक जाती है और अक्टूबर-नवंबर में कटाई योग्य हो जाती है — जल्दी पेराई और जल्दी भुगतान का फायदा। मध्य अवधि की किस्म 11-12 महीने लेती है। अगेती का फायदा तभी जब मिल समय से चल जाए।
सवाल: क्या एक ही खेत में दो किस्में लगा सकते हैं? जवाब: बिल्कुल, और यही समझदारी है। अलग-अलग प्लॉट में 2-3 किस्में लगाएं ताकि रोग या मौसम का जोखिम बंट जाए। बस किस्मों को मिलाएं नहीं — हर प्लॉट में एक ही किस्म रखें ताकि पकने का समय एक जैसा रहे।
सवाल: पेड़ी फसल के लिए कौन सी किस्म सबसे अच्छी है? जवाब: को.शा. 19231 और सीओ 0118 की पेड़ी क्षमता बहुत अच्छी बताई जाती है। सामान्य नियम है — जिस किस्म की टिलरिंग (कल्ले) मजबूत हो, उसकी पेड़ी भी दमदार होती है। पेड़ी में समय पर गुड़ाई और संतुलित खाद देना न भूलें।
शरदकालीन बुवाई का समय अक्टूबर-नवंबर में सीमित होता है, इसलिए किस्म का फैसला अभी कर लीजिए और बीज की बुकिंग समय से करा लीजिए। सही किस्म, रोगमुक्त बीज और समय पर बुवाई — यही तीन चीजें 2026-27 सीजन की बंपर उपज की नींव हैं।
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