
मिल चलने का सीजन खत्म होता है तो यूपी के किसान एक राहत की सांस लेते हैं — गन्ना कट गया, पर्ची पूरी हुई, भुगतान आ रहा है। लेकिन अगले दिन खेत में जो नज़ारा होता है, वही असली मौके का ठिकाना है। कटे हुए ठूंठों वाला खेत, किनारों पर बिखरी सूखी पत्तियां, और मिट्टी में दबे गन्ने की जड़ें — यही पेड़ी फसल है, जिससे बिना बुवाई का एक भी रुपया खर्च किए दोबारा गन्ना उगाया जा सकता है।
एक अंदाज़ा लगाइए: मुख्य फसल की बुवाई में खेत की तैयारी, जुताई, बीज और बुवाई पर जो बड़ा खर्च आता है, वह सब पेड़ी में बच जाता है। उत्तर प्रदेश गन्ना शोध संस्थान के प्रसार अधिकारियों के अनुसार सही प्रबंधन से पेड़ी की उपज मुख्य फसल के बराबर मिल सकती है। फर्क सिर्फ इतना है कि पेड़ी की देखभाल थोड़ी अलग तरीके से करनी होती है — और वही अंतर तय करता है कि आपकी पेड़ी बंपर उपज देगी या औसत।
इस गाइड में हम वही 7 काम विस्तार से बता रहे हैं, जिन्हें कटाई के बाद सही समय पर करना होता है। हर काम का समय, तरीका और सावधानी एक-एक करके समझिए।
पेड़ी की ताकत समझिए: खर्च आधा, कमाई पूरी
पेड़ी (रटून) फसल का सबसे बड़ा फायदा अर्थशास्त्र है। मुख्य फसल में प्रति हेक्टेयर बीज पर ही एक बड़ा खर्च बैठता है — ऊपर से खेत की गहरी जुताई, समतलीकरण और बुवाई का काम। पेड़ी में ये सब खर्च एक साथ बच जाता है। किसान को सिर्फ खाद, सिंचाई, निराई-गुड़ाई और कीट प्रबंधन पर ध्यान देना होता है। यही वजह है कि सही प्रबंधन वाली पेड़ी प्रति हेक्टेयर मुनाफा मुख्य फसल से भी बेहतर दे सकती है।
एक सीधी तुलना: जहां मुख्य फसल में बुवाई से लेकर कटाई तक पूरा चक्र महंगा पड़ता है, वहीं पेड़ी में बुवाई का पूरा खर्च शून्य हो जाता है। यही बचत छोटे और सीमांत किसानों के लिए सबसे बड़ा सहारा है। लेकिन ध्यान रहे — बचत का मतलब लापरवाही नहीं। पेड़ी को मुख्य फसल से 25 प्रतिशत तक अधिक नाइट्रोजन की जरूरत होती है, और शुरुआती 30 से 60 दिनों की देखभाल ही पूरी उपज तय करती है।
पहला काम: ठूंठों की सही छंटाई (पहले 7 दिनों में)
गन्ने की कटाई हमेशा जमीन की सतह से सटाकर करनी चाहिए। अगर कटाई थोड़ी ऊपर से हुई है और ठूंठ ऊपर रह गए हैं, तो धारदार गंडासे या हंसिए से ठूंठों को जमीन के बराबर छांट दें। यह सबसे पहला और सबसे सस्ता काम है, लेकिन इसका असर सबसे ज्यादा होता है।
जब ठूंठ जमीन के बराबर कटे होते हैं तो नए कल्ले मिट्टी के नीचे से निकलते हैं — और नीचे से निकले कल्ले मजबूत, सीधे और स्वस्थ होते हैं। ऊपर कटे ठूंठ से निकले कल्ले कमजोर होते हैं, जल्दी सूखते हैं और उनमें रोग का खतरा ज्यादा रहता है। इसलिए कटाई के पहले 7 दिनों में ठूंठ छंटाई पूरी कर लें। देरी करने पर कल्ले गलत दिशा में निकलने लगते हैं।
दूसरा काम: कटे ठूंठों पर फफूंद का इलाज
कटे हुए ठूंठों पर फफूंद का हमला होने का डर हमेशा रहता है। मिट्टी में मौजूद रोगजनक नए कल्लों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। उत्तर प्रदेश गन्ना शोध संस्थान के प्रसार अधिकारी डॉ. संजीव कुमार पाठक बताते हैं कि इसके बचाव के लिए कार्बेंडाजिम के घोल का ठूंठों पर छिड़काव करना चाहिए।
यह प्रक्रिया पेड़ी की शुरुआती बढ़त को सुरक्षित और स्वस्थ बनाती है, जिससे खेत में पौधों की संख्या बनी रहती है। छिड़काव का सही समय है कटाई और ठूंठ छंटाई के तुरंत बाद, जब तक मिट्टी में नमी मौजूद हो। दवा की सही मात्रा और घोल बनाने के तरीके के लिए कृषि विशेषज्ञ या अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र से सलाह लें।
तीसरा काम: रैटून मैनेजर मशीन से मिट्टी खोलें
पेड़ी फसल में मिट्टी अक्सर दब जाती है और पुरानी जड़ें मिट्टी को कड़ा कर देती हैं। ऐसे में जड़ों को हवा मिलना जरूरी है। इसके लिए ‘रैटून मैनेजर’ मशीन का उपयोग सबसे बेहतर माना जाता है।
यह मशीन एक साथ कई काम करती है: पुराने ठूंठों के किनारों को काटती है, कतारों के बीच की मिट्टी को हल्का करती है, और खाद को जड़ों के पास गहराई में पहुंचाने में मदद करती है। इससे पुरानी जड़ें कट जाती हैं और नई जड़ों का विकास तेजी से होता है। जिन किसानों के पास यह मशीन नहीं है, वे ट्रैक्टर चालित हल्के हल से कतारों के बीच गुड़ाई करके भी काम चला सकते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि मिट्टी हल्की हो और जड़ों तक हवा पहुंचे।
चौथा काम: खाद का सही फार्मूला — पेड़ी को चाहिए 25% ज्यादा नाइट्रोजन
यह पेड़ी प्रबंधन का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है। पेड़ी फसल को मुख्य फसल की तुलना में करीब 25 प्रतिशत अधिक नाइट्रोजन की जरूरत होती है, क्योंकि पुरानी जड़ प्रणाली को नए कल्लों को पोषण देना होता है और मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ की मांग भी अधिक होती है।
खाद देने का सही क्रम:
- बेसल खुराक: ठूंठ छंटाई और मिट्टी खोलने के तुरंत बाद यूरिया, डीएपी और पोटाश का मिश्रण जड़ों के पास दें। खाद को ऊपर से फेंकने के बजाय मिट्टी में दबाकर या जड़ों के पास गहराई में डालना चाहिए, ताकि पोषक तत्व सीधे जड़ों तक पहुंचें।
- यूरिया की खुराक बांटकर दें: पूरी यूरिया एक बार में देने के बजाय 2 से 3 भागों में बांटकर दें। पहली खुराक कल्ले निकलते समय, दूसरी खुराक बढ़वार की अवस्था में और तीसरी खुराक गन्ना बनने की अवस्था से पहले दें।
- पीलापन दूर करने के लिए: अगर पत्तियों में पीलापन दिखे तो जिंक सल्फेट और फेरस सल्फेट का पर्णीय छिड़काव बहुत प्रभावी होता है। यह पौधों की हरियाली बढ़ाता है और बढ़वार तेज करता है।
खाद की सही मात्रा आपकी मिट्टी की जांच पर निर्भर करती है। मिट्टी परीक्षण करवाकर संतुलित खाद देने से न सिर्फ खर्च घटता है, बल्कि उपज भी बढ़ती है। सही मात्रा और समय के लिए कृषि विज्ञान केंद्र से सलाह लें।
पांचवां काम: पत्तियां जलाना बंद करें — ट्रैश मल्चिंग से मुफ्त की खाद
कटाई के बाद खेत में सूखी पत्तियों का ढेर लग जाता है, और ज्यादातर किसान इसे जला देते हैं। यह आदत मिट्टी के लिए सबसे बड़ा नुकसान है। जलाने से न सिर्फ प्रदूषण फैलता है, बल्कि मिट्टी के पोषक तत्व भी नष्ट हो जाते हैं।
सही तरीका है ट्रैश मल्चिंग: सूखी पत्तियों को कतारों के बीच फैला दें, या ट्रैश मल्चर मशीन से उन्हें छोटे टुकड़ों में काटकर खेत में ही बिछा दें। इसके फायदे गिने नहीं जा सकते:
- पत्तियां धीरे-धीरे सड़कर जैविक खाद बन जाती हैं — मिट्टी को मुफ्त की कार्बनिक खाद मिलती है
- पत्तियों की परत मिट्टी की नमी बनाए रखती है, जिससे सिंचाई की जरूरत कम पड़ती है
- मल्चिंग से खरपतवार का उगना दब जाता है, जिससे निराई का खर्च और मेहनत घटती है
- मिट्टी में केंचुओं की संख्या बढ़ती है, जो मिट्टी को प्राकृतिक रूप से उपजाऊ बनाते हैं
जलाना छोड़िए, बिछाना शुरू कीजिए — यह एक फैसला आपकी मिट्टी की सेहत बदल सकता है।
छठा काम: खाली जगहें भरें — गैप फिलिंग न भूलें
कटाई के बाद खेत में कुछ जगहें खाली रह जाती हैं — कहीं ठूंठ सड़ गए, कहीं कल्ले नहीं निकले। अगर 60 सेंटीमीटर से ज्यादा की दूरी तक गन्ने के पौधे न हों, तो उसे गैप मानकर भरना चाहिए। खाली जगह छोड़ने का मतलब है उस हिस्से की उपज का सीधा नुकसान।
गैप फिलिंग का तरीका: जिन ठूंठों में कल्ले ज्यादा निकले हैं, उनमें से कुछ को उखाड़कर चार टुकड़ों में काट लें। इन्हें फफूंदनाशक और कीटनाशक के घोल में डुबोकर खाली जगहों में लगा दें और तुरंत हल्की सिंचाई कर दें। नर्सरी में तैयार किए गए पौधों से भी गैप भर सकते हैं। यह छोटा सा काम प्रति हेक्टेयर हजारों रुपये की उपज बचा सकता है।
सातवां काम: पहले 30-60 दिन — सिंचाई और निराई की सबसे नाजुक अवधि
पेड़ी फसल में खरपतवार मुख्य फसल से भी तेजी से उगते हैं, क्योंकि खेत खुला होता है और धूप सीधे मिट्टी तक पहुंचती है। इसलिए शुरुआती 30 से 60 दिनों में निराई-गुड़ाई जरूर करें। पहली निराई कल्ले निकलते समय और दूसरी निराई बढ़वार की अवस्था में करें।
सिंचाई का नियम सरल है: कल्ले निकलते समय और गर्मियों में खेत में नमी कम न होने दें। हल्की सिंचाई 10 से 15 दिनों के अंतराल पर करें। भारी पानी एक बार में देने के बजाय बार-बार हल्की सिंचाई पेड़ी के लिए बेहतर होती है, क्योंकि इससे जड़ों तक हवा बनी रहती है और कल्ले मजबूत निकलते हैं। बरसात के मौसम में जल निकासी का भी ध्यान रखें — खेत में पानी ठहरने से ठूंठ सड़ने का खतरा बढ़ जाता है।
कीटों पर नजर: कंसुआ और दीमक से बचाव
पेड़ी फसल में दो कीट सबसे ज्यादा नुकसान करते हैं — कंसुआ (तना छेदक) और दीमक। कंसुआ तने के अंदर छेद करके कल्लों को सुखा देता है, और दीमक जड़ों को काटकर पौधों को कमजोर करता है।
इनसे बचाव के लिए पहली सिंचाई के समय उचित कीटनाशक का प्रयोग कृषि विशेषज्ञ की सलाह पर किया जा सकता है। खेत की नियमित निगरानी जरूरी है — अगर कहीं सूखते कल्ले दिखें तो तुरंत कारण पता करें। दवा का नाम, मात्रा और छिड़काव की विधि के लिए अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र से सलाह लें।
एक नज़र में: पेड़ी प्रबंधन का समय-सारिणी
| समय | काम | मुख्य सावधानी |
|---|---|---|
| कटाई के 0-7 दिन | ठूंठ छंटाई + कार्बेंडाजिम छिड़काव | ठूंठ जमीन के बराबर काटें |
| कटाई के 7-15 दिन | रैटून मैनेजर से मिट्टी खोलना + बेसल खाद | खाद जड़ों के पास गहराई में डालें |
| कटाई के 15-30 दिन | ट्रैश मल्चिंग + पहली निराई | पत्तियां न जलाएं, बिछाएं |
| कटाई के 30-60 दिन | गैप फिलिंग + दूसरी निराई + यूरिया की दूसरी खुराक | 60 सेमी से बड़े गैप जरूर भरें |
| बढ़वार की अवस्था | हल्की सिंचाई हर 10-15 दिन में | खेत में पानी न ठहरने दें |
इस समय-सारिणी को अपने खेत के कैलेंडर में नोट कर लीजिए। समय पर किया गया हर काम आपकी पेड़ी को मुख्य फसल के बराबर उपज की ओर ले जाता है। और याद रखिए — 2026-27 सीजन के SAP की घोषणा अभी बाकी है, इसलिए अपनी उपज का हिसाब-किताब हमेशा घोषित भाव पर ही करें।
आपके सवाल
पेड़ी फसल से कितने साल तक उपज ली जा सकती है? गन्ने की एक बुवाई से आम तौर पर 2 से 3 साल तक उपज ली जा सकती है — पहली मुख्य फसल और उसके बाद 1 से 2 पेड़ी फसलें। पहली पेड़ी की उपज सबसे अच्छी मिलती है। इसके बाद उपज धीरे-धीरे घटने लगती है, इसलिए 2 से 3 चक्र के बाद नई बुवाई करना बेहतर होता है।
पेड़ी में खाद मुख्य फसल से कितनी अलग दें? पेड़ी को मुख्य फसल की तुलना में करीब 25 प्रतिशत अधिक नाइट्रोजन की जरूरत होती है। यूरिया को 2 से 3 भागों में बांटकर दें और डीएपी-पोटाश बेसल खुराक के रूप में जड़ों के पास डालें। सटीक मात्रा के लिए मिट्टी परीक्षण करवाकर कृषि विज्ञान केंद्र से सलाह लें।
कटाई के बाद ठूंठ सड़ रहे हैं, क्या करें? यह फफूंद का हमला या खेत में पानी ठहरने का संकेत हो सकता है। कटे ठूंठों पर कार्बेंडाजिम के घोल का छिड़काव करें और खेत की जल निकासी सुधारें। खेत में पानी ठहरने न दें। अगर समस्या बनी रहे तो कृषि विशेषज्ञ से खेत दिखाकर सलाह लें।
सूखी पत्तियां जलानी चाहिए या नहीं? बिल्कुल नहीं जलानी चाहिए। पत्तियों को कतारों के बीच बिछा दें (ट्रैश मल्चिंग) — ये सड़कर मुफ्त की जैविक खाद बनती हैं, मिट्टी की नमी बचाती हैं और खरपतवार दबाती हैं। जलाने से पोषक तत्व नष्ट होते हैं और प्रदूषण फैलता है।
पेड़ी में सिंचाई कब-कब करनी चाहिए? कल्ले निकलते समय और गर्मियों में खेत में नमी बनी रहनी चाहिए। हल्की सिंचाई 10 से 15 दिनों के अंतराल पर करें। बरसात में जल निकासी का ध्यान रखें — ठहरे पानी से ठूंठ सड़ते हैं।
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